नोएडा श्रमिक हिंसा में 3 की जमानत याचिका खारिज, श्रमिकों को भड़काने और आंदोलन से जुड़े लोगों के संपर्क में रहने का आरोप

नोएडा सेक्टर-84 श्रमिक हिंसा मामले में तीन आरोपियों की अग्रिम जमानत खारिज हुई। अभियोजन ने आंदोलन से जुड़े लोगों के संपर्क और श्रमिकों को भड़काने का आरोप लगाया।
नोएडा श्रमिक हिंसा में 3 की जमानत याचिका खारिज, श्रमिकों को भड़काने और आंदोलन से जुड़े लोगों के संपर्क में रहने का आरोप
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ग्रेटर नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिक आंदोलन और उसके दौरान हुई हिंसा के मामले में जिला अदालत ने तीन आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है। सेक्टर-84 स्थित मदरसन कंपनी परिसर के पास 13 अप्रैल को हुई हिंसा के मामले में प्रियंवदा शर्मा, प्रेरित लोधा और शिवानी कौल की ओर से अग्रिम जमानत के लिए अदालत में अर्जी दाखिल की गई थी। सुनवाई के बाद सत्र न्यायाधीश की अदालत ने तीनों की याचिकाएं खारिज कर दीं। अभियोजन पक्ष ने अदालत में आरोप लगाया कि तीनों आरोपी आंदोलन से जुड़े लोगों के संपर्क में थे और श्रमिकों को आंदोलन के लिए भड़काने में उनकी भूमिका सामने आई है।

पुलिस और अभियोजन की ओर से अदालत के सामने रखे गए मामले के मुताबिक, 13 अप्रैल को मदरसन कंपनी के पास बड़ी संख्या में श्रमिक वेतन बढ़ाने, ओवरटाइम और बोनस जैसी मांगों को लेकर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के दौरान सड़क पर जाम की स्थिति बन गई। आरोप है कि कुछ समय बाद प्रदर्शन कर रही भीड़ उग्र हो गई और पुलिस बल पर पथराव तथा लाठी-डंडों से हमला किया गया। पुलिस के अनुसार, घटना में कई पुलिसकर्मी घायल हुए और आगजनी भी हुई। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने इस पूरी घटना में करीब 450 से 500 अज्ञात लोगों के शामिल होने और घटना को कथित तौर पर पूर्व नियोजित साजिश के तहत अंजाम दिए जाने का आरोप लगाया।

इस मामले में अब जिन तीन लोगों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज हुई है, उनके खिलाफ अभियोजन ने सीधे तौर पर आंदोलन से संपर्क और श्रमिकों को प्रभावित करने के आरोप लगाए। अदालत को बताया गया कि केस डायरी में शामिल सह आरोपियों मनीषा, रिचा, आकृति और अन्य के व्हाट्सऐप चैट तथा ऑडियो-वीडियो विश्लेषण में इन तीनों के बारे में जानकारी सामने आई। अभियोजन के मुताबिक, प्रियंवदा शर्मा, प्रेरित लोधा और शिवानी कौल आंदोलन से जुड़े फोटो और वीडियो प्राप्त कर रहे थे तथा श्रमिकों को भड़काने में उनकी भूमिका थी।

पुलिस ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि जांच के दौरान डिजिटल माध्यमों से जुटाई गई सामग्री को देखा गया है। अभियोजन का दावा है कि आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच व्हाट्सऐप और अन्य माध्यमों से लगातार संपर्क था और इसी नेटवर्क के जरिए प्रदर्शन से जुड़ी सामग्री तथा संदेश साझा किए जा रहे थे। शिवानी कौल के संबंध में अभियोजन ने यह भी दावा किया कि वह टेलीग्राम पर बने बिगुल मीडिया ग्रुप की सक्रिय सदस्य थीं। हालांकि ये सभी बातें अभियोजन और पुलिस की ओर से लगाए गए आरोप हैं, जिनका अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर होगा।

दूसरी ओर, आरोपियों की ओर से अदालत में इन आरोपों का विरोध किया गया। बचाव पक्ष ने दलील दी कि तीनों घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं थे और उन्हें पुलिस की कार्रवाई तथा पुलिस के कथित मनमाने रवैये को सोशल मीडिया पर सामने रखने की वजह से मामले में फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने आरोपों को गलत बताते हुए अग्रिम जमानत देने की मांग की थी। अदालत ने अभियोजन की ओर से पेश दस्तावेजों और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद तीनों को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।

नोएडा का यह श्रमिक आंदोलन अप्रैल 2026 में वेतन और काम से जुड़ी मांगों को लेकर शुरू हुआ था। अलग-अलग कंपनियों के कर्मचारियों ने वेतन बढ़ाने, ओवरटाइम और अन्य सुविधाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किया था। शुरुआती दौर में आंदोलन श्रमिक मांगों पर केंद्रित रहा, लेकिन 13 अप्रैल को कई स्थानों पर स्थिति बिगड़ने के बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ। इसके बाद पुलिस ने हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और अन्य गंभीर धाराओं में अलग-अलग थानों में मुकदमे दर्ज कर कार्रवाई शुरू की।

इस आंदोलन से जुड़े मामलों में पुलिस की कार्रवाई और अदालतों में जमानत की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है। अगस्त 2026 में प्रकाशित एक जांच रिपोर्ट में 106 मामलों से जुड़े अदालत के 222 जमानत आदेशों का विश्लेषण किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, कई मामलों में अदालतों ने यह देखा कि केवल भीड़ में मौजूद होना किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत आपराधिक भूमिका साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। वहीं जिन आरोपियों के खिलाफ आंदोलन को संगठित करने, लोगों को उकसाने या हिंसा में सक्रिय भूमिका से जुड़े विशेष साक्ष्य पेश किए गए, उनके मामलों में अदालतों ने अलग तरीके से विचार किया।

इसी व्यापक मामले में इससे पहले कुछ आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत भी कार्रवाई की गई थी। मई 2026 में पुलिस ने पत्रकार सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर NSA लगाने की जानकारी दी थी और पुलिस ने आरोप लगाया था कि दोनों ने हिंसा तथा अव्यवस्था फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में सितंबर 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत रद्द करते हुए, यदि किसी अन्य मामले में उनकी आवश्यकता न हो, तो रिहाई का निर्देश दिया। इससे स्पष्ट है कि श्रमिक आंदोलन से जुड़े अलग-अलग आरोपियों के मामलों में अदालतों के सामने अलग-अलग तथ्य और कानूनी परिस्थितियां रही हैं।

श्रमिक हिंसा के इसी मामले में पत्रकार सत्यम वर्मा से जुड़ी जमानत कार्यवाही भी इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच चुकी है। सितंबर में हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान एक मामले में उनकी जमानत पर तत्काल राहत नहीं मिली थी और अगली सुनवाई की तारीख 23 सितंबर तय की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, सत्यम वर्मा के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज होने की वजह से किसी एक मामले में जमानत मिलने के बावजूद उनकी रिहाई अलग कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर हो सकती है।

ताजा मामले में प्रियंवदा शर्मा, प्रेरित लोधा और शिवानी कौल की अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अब मामले की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी। अदालत के सामने फिलहाल अभियोजन ने डिजिटल चैट, फोटो-वीडियो और अन्य जांच सामग्री के आधार पर तीनों की कथित भूमिका का उल्लेख किया है, जबकि बचाव पक्ष ने आरोपों को गलत बताते हुए अपने मुवक्किलों को घटनास्थल से अलग बताया है। इन आरोपों की अंतिम पुष्टि या खंडन अदालत में होने वाली आगे की कार्यवाही और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगा।

नोएडा के इस श्रमिक आंदोलन का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक ओर श्रमिकों की वेतन और रोजगार से जुड़ी मांगें थीं, वहीं दूसरी ओर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा के बाद पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज किए। अदालतों में चल रही जमानत कार्यवाही में प्रत्येक आरोपी की कथित भूमिका और उपलब्ध साक्ष्यों को अलग-अलग देखा जा रहा है। ताजा आदेश में तीन आरोपियों को अग्रिम जमानत न मिलने के बाद इस मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी

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