दलित संगठनों का महाजुटान, 65% आरक्षण की मांग: गांधी मैदान से लोकभवन तक जाएंगे; बोले- IAS-IPS बनने के बाद भी जाति के नाम पर होता है टॉर्चर

पटना में दलित संगठनों का महाजुटान, 65% आरक्षण की मांग। गांधी मैदान से लोकभवन तक मार्च की तैयारी, न्यायपालिका और निजी क्षेत्र में कोटा की भी मांग।
दलित संगठनों का महाजुटान, 65% आरक्षण की मांग: गांधी मैदान से लोकभवन तक जाएंगे; बोले- IAS-IPS बनने के बाद भी जाति के नाम पर होता है टॉर्चर
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पटना में मंगलवार को दलित और आदिवासी संगठनों का बड़ा महाजुटान आयोजित किया जा रहा है। आरक्षण बढ़ाओ, संविधान बचाओ संघर्ष समिति के आह्वान पर आयोजित इस आंदोलन में बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के लोगों के जुटने का दावा किया गया है। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग बिहार में आरक्षण का दायरा बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की है। इसके साथ ही न्यायपालिका और निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने, आरक्षण कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने और दलित-आदिवासी समाज के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर रोक लगाने जैसी मांगें भी उठाई जा रही हैं।

आंदोलन को लेकर दलित संगठनों की ओर से पहले ही घोषणा की गई थी कि 8 सितंबर को पटना में आरक्षण के समर्थन और वंचित वर्गों के अधिकारों की मांग को लेकर बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा। समिति के संयोजक अमर आजाद पासवान और अन्य प्रतिनिधियों ने प्रेस वार्ता में आंदोलन की रूपरेखा और मांगों की जानकारी दी थी। संगठनों का कहना है कि आरक्षण केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और सामाजिक प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा विषय है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि बिहार में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की आबादी और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए आरक्षण की सीमा बढ़ाई जानी चाहिए। इसी आधार पर 65 प्रतिशत आरक्षण की मांग की जा रही है। संगठनों का आरोप है कि मौजूदा व्यवस्था में वंचित समुदायों को उनकी आबादी और जरूरत के अनुपात में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है।

महाजुटान में शामिल नेताओं ने जातिगत भेदभाव का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। आंदोलन से जुड़े नेताओं का आरोप है कि दलित समाज के लोग उच्च प्रशासनिक पदों तक पहुंचने के बाद भी जाति आधारित भेदभाव और प्रताड़ना का सामना करते हैं। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के IAS या IPS बनने के बाद भी उसकी सामाजिक पहचान को लेकर भेदभाव की शिकायतें सामने आती हैं। आंदोलनकारियों ने इसे सामाजिक न्याय के लिए गंभीर चुनौती बताया है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य केवल नौकरी उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि उन समुदायों को बराबर अवसर देना भी है, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि जब तक सरकारी संस्थानों के साथ-साथ न्यायपालिका और निजी क्षेत्र में भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक सामाजिक समानता का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता।

दलित संगठनों की ओर से न्यायपालिका में आरक्षण लागू करने की मांग भी उठाई जा रही है। आंदोलनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट समेत न्यायपालिका में आरक्षण व्यवस्था लागू करने की मांग रखी है। इसके अलावा न्यायाधीशों की नियुक्ति में कॉलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने की मांग भी की गई है। संगठनों का तर्क है कि न्यायपालिका में भी सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

आरक्षण कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी आंदोलन का अहम हिस्सा है। संगठनों का कहना है कि बिहार में आरक्षण से जुड़े प्रावधानों को संवैधानिक संरक्षण दिया जाना चाहिए, ताकि उन्हें कानूनी चुनौतियों से सुरक्षा मिल सके। आंदोलनकारियों ने राज्य में आरक्षण के विस्तार को सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की है।

इसके अलावा सरकारी ठेकेदारी में 59 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग भी रखी गई है। संगठनों का कहना है कि सरकारी योजनाओं और निर्माण कार्यों से जुड़े ठेकों में भी वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़नी चाहिए। इससे रोजगार और आर्थिक अवसरों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

दलित और आदिवासी समाज के खिलाफ होने वाले अपराधों और हत्याओं का मुद्दा भी महाजुटान में उठाया जा रहा है। आंदोलनकारी संगठनों ने ऐसी घटनाओं पर तत्काल रोक लगाने और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की है। उनका कहना है कि सामाजिक भेदभाव और अत्याचार की घटनाओं के खिलाफ प्रशासन को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

एससी-एसटी कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण की मांग भी आंदोलन में शामिल है। संगठनों का कहना है कि नौकरी मिलने के बाद भी पदोन्नति में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। उनका तर्क है कि यदि उच्च पदों पर भी सामाजिक प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो प्रशासनिक व्यवस्था में समान भागीदारी का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा।

पटना में होने वाले महाजुटान को देखते हुए गांधी मैदान और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना है। आंदोलनकारियों की ओर से गांधी मैदान से लोकभवन तक जाने की बात कही गई है। इसके चलते शहर की यातायात व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। प्रशासन के लिए भीड़ को नियंत्रित करना और यातायात व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

आंदोलन के दौरान वक्ताओं की ओर से सरकार की आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी जाएगी। संगठनों ने स्पष्ट किया है कि उनकी लड़ाई आरक्षण का दायरा बढ़ाने के साथ-साथ दलित और आदिवासी समाज के अधिकारों से जुड़े व्यापक मुद्दों को लेकर है।

यह महाजुटान ऐसे समय हो रहा है जब बिहार में आरक्षण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा लगातार जारी है। आरक्षण की सीमा बढ़ाने का मुद्दा राज्य की राजनीति में पहले भी प्रमुख रहा है। अब दलित संगठनों के इस आंदोलन से एक बार फिर यह विषय चर्चा के केंद्र में आ गया है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मांगों को केवल राजनीतिक नारे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनका दावा है कि यह सामाजिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। संगठनों ने सरकार से बातचीत कर उनकी मांगों पर ठोस निर्णय लेने की अपील की है।

महाजुटान में शामिल होने वाले लोगों के बीच भी आरक्षण और सामाजिक न्याय को लेकर काफी चर्चा है। संगठन अपने समर्थकों से बड़ी संख्या में पटना पहुंचने की अपील कर चुके हैं। आंदोलन को लेकर कई दलित और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकजुटता दिखाई है।

फिलहाल आंदोलनकारियों की सबसे प्रमुख मांग बिहार में 65 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की है। इसके अलावा निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण, सरकारी ठेकेदारी में 59 प्रतिशत कोटा, प्रमोशन में आरक्षण, दलितों के खिलाफ अपराधों पर रोक और आरक्षण कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने जैसी मांगें भी उठाई जा रही हैं।

महाजुटान के दौरान सरकार तक अपनी मांग पहुंचाने और व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश की जाएगी। आंदोलनकारियों ने कहा है कि सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर उनकी आवाज आगे भी उठती रहेगी। अब इस प्रदर्शन के दौरान सरकार और प्रशासन की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर सभी की नजर रहेगी।

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