पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में JAAC के आंदोलन को लेकर तनाव बढ़ा है। प्रदर्शनकारियों ने इंटरनेट बंदी, सुरक्षा कार्रवाई और जरूरी सामान की आपूर्ति प्रभावित होने का आरोप लगाया है। वहीं सरकार ने संगठन को प्रतिबंधित कर उस पर आतंकवाद और अराजकता फैलाने के आरोप लगाए हैं।
इस्लामाबाद: पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर (PoK) में Joint Awami Action Committee (JAAC) के नेतृत्व में चले आंदोलन ने जून 2026 में गंभीर राजनीतिक और मानवीय संकट का रूप ले लिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई, इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर रोक तथा आवाजाही में प्रतिबंधों से आम लोगों की जिंदगी प्रभावित हुई। पाकिस्तान-प्रशासित क्षेत्र की सरकार ने दूसरी ओर JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित करते हुए उस पर आतंकवाद और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप लगाए।
इंटरनेट बंद, स्कूल और कारोबार प्रभावित होने का दावा
JAAC के आंदोलन के दौरान मुजफ्फराबाद, रावलकोट, पुंछ और कोटली सहित कई इलाकों में संचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगाए जाने की रिपोर्ट सामने आईं। मानवाधिकार संगठनों ने इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं के बंद होने, गिरफ्तारियों तथा चिकित्सा सेवाओं तक पहुंच प्रभावित होने को लेकर चिंता जताई।
प्रदर्शनकारियों और स्थानीय लोगों का कहना है कि संचार व्यवस्था ठप होने से बाहरी दुनिया तक घटनाओं की जानकारी पहुंचाना मुश्किल हो गया। कुछ स्थानीय लोगों ने दावा किया कि चुनिंदा कार्यालयों और होटलों में सीमित या धीमा इंटरनेट उपलब्ध था, जिसके माध्यम से उन्होंने प्रदर्शन से जुड़े ऑडियो-वीडियो बाहर भेजे।
हालांकि, इन दावों में से प्रत्येक घटना की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना संचार प्रतिबंधों के कारण कठिन रहा। जून में ब्रिटिश संसद में भी पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंदी, गिरफ्तारियों और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए थे।
‘सेना ने इलाका घेर लिया’, प्रदर्शनकारी का दावा
कोटली निवासी आदिल हुसैन ने दावा किया कि पुंछ डिवीजन में स्थिति विशेष रूप से खराब रही। उनके मुताबिक इलाके में पुलिस और सुरक्षा बलों की बड़ी मौजूदगी थी और लोगों की आवाजाही पर निगरानी बढ़ गई थी।
हुसैन ने आरोप लगाया कि राशन और दवाइयों की आपूर्ति प्रभावित हुई और बाहर से आने वाले लोगों की तलाशी ली जा रही थी। उन्होंने पेट्रोल, डीजल और अन्य जरूरी सामान की उपलब्धता प्रभावित होने का भी दावा किया।
उनका कहना है कि क्षेत्र के लोग JAAC के साथ खड़े हैं और आंदोलन को अपने आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की लड़ाई मानते हैं।
इन दावों के समानांतर JAAC के मानवाधिकार प्रकोष्ठ ने भी जून में अपनी रिपोर्ट में खाद्य और दवा की आपूर्ति, चिकित्सा पहुंच, संचार सेवाओं और गिरफ्तारियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि यह रिपोर्ट स्वयं आंदोलन से जुड़े संगठन द्वारा तैयार की गई थी और इसमें शामिल सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
नेताओं की गिरफ्तारी और लापता होने का आरोप
मुजफ्फराबाद डिवीजन में आंदोलन से जुड़े ख्वाजा मुंतजिर ने आरोप लगाया कि JAAC से जुड़े कई नेता और कार्यकर्ता लंबे समय से हिरासत में हैं या उनके बारे में परिवारों को जानकारी नहीं मिल रही।
उन्होंने प्रदर्शनकारियों से सुरक्षा बलों की मौजूदगी से नहीं डरने और आंदोलन जारी रखने की अपील की। उनके अनुसार आंदोलन का उद्देश्य स्थानीय लोगों के राजनीतिक अधिकारों और शासन में उनकी भागीदारी से जुड़े मुद्दों को उठाना है।
JAAC ने जून में जारी अपने आधिकारिक बयान में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की रिहाई, संचार सेवाओं की बहाली, घायलों को चिकित्सा सुविधा और मौतों की स्वतंत्र जांच की मांग की थी।
‘भारत का एजेंट’ बताए जाने पर JAAC नेता का जवाब
आंदोलन के खिलाफ पाकिस्तान में एक प्रमुख आरोप यह रहा है कि प्रदर्शन को भारत समर्थित या पाकिस्तान विरोधी गतिविधि के रूप में देखा जा रहा है। रावलकोट से जुड़े JAAC नेता सरदान उमर नजीर कश्मीरी ने इस आरोप को खारिज किया।
उनका कहना है कि अगर आंदोलनकारी वास्तव में किसी विदेशी एजेंडे पर काम कर रहे थे, तो पाकिस्तान सरकार ने मई के अंत तक उनके साथ बातचीत क्यों की। उन्होंने दावा किया कि सरकार के प्रतिनिधियों और JAAC के बीच बातचीत के बाद अचानक प्रदर्शनकारियों को ‘भारतीय एजेंट’ बताने का नैरेटिव शुरू किया गया।
JAAC नेतृत्व का कहना है कि उसका आंदोलन स्थानीय राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है। दूसरी ओर, पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर सरकार ने संगठन को गंभीर सुरक्षा खतरा बताते हुए उस पर प्रतिबंध लगाया।
5 जून को JAAC पर प्रतिबंध
5 जून 2026 को पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर की सरकार ने Jammu Kashmir Joint Awami Action Committee (JKJAAC) को Anti-Terrorism Act, 2014 के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित किया। सरकारी अधिसूचना में संगठन पर आतंकवाद, सार्वजनिक शांति और सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने तथा अराजकता पैदा करने के आरोप लगाए गए।
यह फैसला JAAC द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा के बाद आया। संगठन ने 12 आरक्षित विधानसभा सीटों को समाप्त करने समेत राजनीतिक सुधारों की मांग को लेकर आंदोलन तेज किया था।
12 आरक्षित सीटें बनीं विवाद का केंद्र
JAAC की प्रमुख मांगों में पाकिस्तान में रहने वाले कश्मीरी शरणार्थियों के लिए पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करना शामिल है।
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि इन सीटों के जरिए ऐसे लोगों को क्षेत्र की राजनीति में प्रतिनिधित्व मिलता है जो वर्तमान में PoK में नहीं रहते। उनका मानना है कि विधानसभा में राजनीतिक प्रतिनिधित्व स्थानीय मतदाताओं की आबादी और हितों के अनुरूप होना चाहिए।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरक्षित सीटों का सवाल सीधे क्षेत्र की राजनीतिक संरचना से जुड़ा है। जून में AJK विधानसभा ने इन सीटों को बनाए रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था। वहीं, JAAC ने इन्हें खत्म करने की मांग जारी रखी।
2023 से शुरू हुआ आंदोलन
JAAC का गठन अचानक नहीं हुआ। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 2023 में रावलकोट में कारोबारी, नागरिक समाज के सदस्य, छात्र और कार्यकर्ता एक मंच पर आए। शुरुआती आंदोलनों में गेहूं और खाद्य वस्तुओं की कीमतों सहित आर्थिक मुद्दे प्रमुख थे।
2024 में आंदोलन का दायरा बढ़ा और प्रदर्शनकारियों तथा पुलिस के बीच टकराव हुआ। उस दौरान तीन प्रदर्शनकारियों और एक पुलिसकर्मी की मौत की रिपोर्ट सामने आई। बाद के वर्षों में आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों ने आंदोलन को और व्यापक बनाया।
2026 में 12 आरक्षित सीटों का मुद्दा आंदोलन के प्रमुख राजनीतिक एजेंडे में शामिल हो गया।
जून में हिंसा और मौतों पर अलग-अलग आंकड़े
जून 2026 में आंदोलन के दौरान हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की पुष्टि विभिन्न स्रोतों से हुई, लेकिन मौतों के आंकड़ों में अंतर रहा। 19 जून की Reuters रिपोर्ट में लगभग दो सप्ताह की अशांति के दौरान कम से कम 24 लोगों की मौत की बात कही गई थी।
प्रदर्शनकारी संगठनों और अन्य स्रोतों ने इससे अधिक संख्या का दावा किया। ब्रिटिश संसद में भी उस समय सरकारी और प्रदर्शनकारी समूहों के अलग-अलग मृत्यु आंकड़ों का उल्लेख हुआ था।
इसलिए ‘100 से अधिक मौतों’ जैसे आंकड़े को स्वतंत्र रूप से पुष्ट तथ्य के बजाय संबंधित प्रदर्शनकारियों के दावे के रूप में देखना जरूरी है।
बातचीत और टकराव के बीच फंसा क्षेत्र
जून में हिंसा बढ़ने के बावजूद AJK के प्रधानमंत्री फैसल मुमताज राठौर ने JAAC के साथ बातचीत फिर शुरू करने का आह्वान किया था। यह अपील उस समय सामने आई जब रावलकोट में झड़पों में लोगों की मौत हुई थी।
JAAC का कहना है कि राजनीतिक अधिकारों, आरक्षित सीटों और शासन व्यवस्था से जुड़े मुद्दों का समाधान बातचीत से होना चाहिए। सरकार का रुख रहा है कि संवैधानिक बदलाव निर्वाचित संस्थाओं की प्रक्रिया के जरिए ही किए जा सकते हैं।
PoK में JAAC आंदोलन अब केवल आर्थिक शिकायतों तक सीमित नहीं रह गया है। इंटरनेट बंदी, सुरक्षा कार्रवाई, गिरफ्तारियां, आरक्षित सीटों का विवाद और संगठन पर आतंकवाद कानून के तहत प्रतिबंध—इन सभी ने इसे पाकिस्तान-प्रशासित जम्मू-कश्मीर के सबसे गंभीर राजनीतिक और नागरिक अधिकार संकटों में शामिल कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इंटरनेट बंदी और बल प्रयोग को लेकर मानवाधिकार संबंधी सवाल उठे हैं।








