गांधी जयंती से ठीक पहले राजधानी पटना से महात्मा गांधी की प्रतिमाओं की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सार्वजनिक स्थलों की देखरेख और स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। पटना सिटी की अलग-अलग सड़कों और चौक-चौराहों पर लगी गांधीजी की प्रतिमाएं कहीं कचरे से घिरी मिलीं, कहीं उनके सामने जानवरों का चारा रखने वाली बोरियां पड़ी थीं तो कहीं नीला ड्रम प्रतिमा के सामने रखा दिखाई दिया। एक जगह फूलों की दुकान ने प्रतिमा को इस तरह ढक रखा था कि सड़क से गुजरने वाले लोगों को बापू की प्रतिमा नजर तक नहीं आती थी। वहीं एक अन्य स्थान पर गांधीजी की प्रतिमा करीब ढाई साल से क्षतिग्रस्त बताई जा रही है और अब तक उसकी मरम्मत नहीं हो सकी है।
पटना सिटी की इन तस्वीरों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि गांधीजी की प्रतिमाएं शहर के सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद होने के बावजूद उनकी नियमित साफ-सफाई और देखरेख को लेकर सवाल सामने आ रहे हैं। गांधी जयंती के मौके पर देशभर में महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी जाती है, उनके विचारों को याद किया जाता है और स्वच्छता से जुड़े अभियानों की चर्चा होती है। लेकिन इसी अवसर से पहले शहर की सड़कों पर लगी उनकी प्रतिमाओं के आसपास कचरे और अव्यवस्था की स्थिति दिखाई देना स्थानीय व्यवस्था के लिए एक गंभीर सवाल बन गया है।
पटना सिटी के खाजेकलां थाना क्षेत्र में लिंक पथ पर लगी गांधीजी की प्रतिमा के सामने पत्ता गोभी के छिलके और अन्य कचरा पड़ा मिला। रिपोर्ट के मुताबिक यह स्थान खाजेकलां थाने से महज करीब 50 फीट की दूरी पर है। प्रतिमा के आसपास मौजूद लोगों ने बताया कि यहां अक्सर कूड़ा फेंक दिया जाता है। खास बात यह है कि इस रास्ते से पुलिसकर्मियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में आम लोग भी रोज गुजरते हैं, लेकिन प्रतिमा के आसपास जमा कचरे की स्थिति लंबे समय तक बनी रहना सफाई व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
इसी स्थान के आसपास फूल-माला बेचने वाली महिला की दुकान भी बताई गई है। यानी जिस प्रतिमा के पास श्रद्धालु या आम लोग फूल-माला लेकर पहुंच सकते हैं, उसके सामने ही सब्जियों और अन्य कचरे के अवशेष पड़े नजर आए। रिपोर्ट के अनुसार आसपास फूलों की बिक्री होती रही, लेकिन गांधीजी की प्रतिमा पर कोई माला दिखाई नहीं दी। यह दृश्य अपने आप में शहर के सार्वजनिक स्मारकों की देखभाल और नागरिक जिम्मेदारी के बीच अंतर को सामने लाता है।
पटना सिटी के दीवान मोहल्ला हमाम स्थित गांधी चौक पर भी प्रतिमा के सामने अलग तरह की अव्यवस्था दिखाई दी। यहां गांधीजी की प्रतिमा के सामने जानवरों का चारा रखने वाली बोरियां रखी मिलीं। आसपास गोबर जमा होने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है। स्थानीय लोगों के अनुसार प्रतिमा और उसके आसपास नियमित देखरेख नहीं होने के कारण धूल जमती रहती है। बारिश के दौरान कुछ सफाई हो जाती है, लेकिन नियमित रूप से प्रतिमा स्थल की साफ-सफाई नहीं होने से स्थिति फिर खराब हो जाती है।
गांधी चौक जैसे सार्वजनिक स्थल पर प्रतिमा का उद्देश्य केवल एक स्मारक के रूप में मौजूद रहना नहीं है। ऐसी प्रतिमाएं शहर की ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान का हिस्सा होती हैं। इन स्थानों से स्थानीय लोग रोज गुजरते हैं और नई पीढ़ी भी इनसे महात्मा गांधी के बारे में जानती है। ऐसे में प्रतिमा के सामने चारा रखने की बोरियां, गंदगी या गोबर जमा होना उस स्थल की गरिमा को प्रभावित करता है।
गुरहट्टा मोड़ पर भी गांधीजी की प्रतिमा के सामने नीला ड्रम रखा मिला। रिपोर्ट के अनुसार यह ड्रम सड़क पर बिछाए जाने वाले कोलतार से संबंधित था। प्रतिमा के चबूतरे के सामने ड्रम रखे होने से गांधीजी की प्रतिमा का दृश्य प्रभावित हो रहा था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि रात के समय ड्रम से निकलने वाले धुएं के कारण आसपास का वातावरण प्रभावित होता है।
किसी सार्वजनिक प्रतिमा के चबूतरे का इस्तेमाल निर्माण सामग्री या अन्य सामान रखने के लिए किया जाना केवल सौंदर्य से जुड़ा मामला नहीं है। इससे प्रतिमा तक लोगों की पहुंच और उसकी दृश्यता भी प्रभावित हो सकती है। अगर किसी चौराहे या सड़क किनारे लगी प्रतिमा के सामने लगातार सामान रखा रहे तो धीरे-धीरे वह जगह अपने मूल उद्देश्य से अलग उपयोग में आने लगती है।
बौली मोड़ पर स्थिति कुछ अलग लेकिन उतनी ही परेशान करने वाली दिखाई दी। यहां गांधीजी की प्रतिमा के सामने फूलों की दुकान लगी होने के कारण प्रतिमा का बड़ा हिस्सा ढक गया था। सड़क से गुजरने वाले लोगों को प्रतिमा देखने के लिए ध्यान से देखना पड़ता था। सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि प्रतिमा के सामने फूल-मालाएं बिक रही थीं और लोग उन्हें खरीदकर जा रहे थे, लेकिन प्रतिमा पर एक माला तक दिखाई नहीं दी।
यह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गांधीजी की प्रतिमाओं पर अक्सर राष्ट्रीय पर्व और गांधी जयंती जैसे अवसरों पर माल्यार्पण किया जाता है। लेकिन साल के बाकी दिनों में इन स्मारकों की स्थिति कैसी रहती है, इस पर अपेक्षाकृत कम ध्यान जाता है। पटना सिटी में सामने आई तस्वीरें इसी अंतर को दिखाती हैं कि किसी स्मारक को एक दिन सम्मान देना और पूरे वर्ष उसकी नियमित देखभाल करना दो अलग-अलग बातें हैं।
सबसे गंभीर स्थिति मंगल तालाब स्थित मनोज कमलिया स्टेडियम की गांधी प्रतिमा की बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह प्रतिमा करीब ढाई वर्ष पहले क्षतिग्रस्त हो गई थी। नशेड़ियों द्वारा प्रतिमा का सिर और धड़ तोड़े जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता संजीव यादव ने क्षतिग्रस्त हिस्सों को पाटलिपुत्र परिषद में रखवाया था, लेकिन करीब ढाई साल गुजर जाने के बावजूद प्रतिमा की मरम्मत नहीं हो सकी।
गांधी जयंती के मौके पर जब देश और राज्य में महात्मा गांधी की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, उसी समय किसी प्रतिमा का वर्षों तक टूटा रहना व्यवस्था के लिए सवाल खड़ा करता है। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की प्रतिमा क्षतिग्रस्त होने के बाद उसकी मरम्मत में इतना लंबा समय क्यों लगा, इसकी जिम्मेदारी किसकी है और उसे ठीक कराने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए—इन सवालों का जवाब स्थानीय प्रशासन और संबंधित संस्थाओं से अपेक्षित है।
पटना नगर निगम की वेबसाइट के अनुसार राजधानी में महात्मा गांधी से जुड़े कई महत्वपूर्ण स्मारक और सार्वजनिक स्थल मौजूद हैं। गांधी मैदान में स्थित गांधी प्रतिमा को नगर निगम ने शहर के प्रमुख सार्वजनिक स्मारकों में शामिल किया है। गांधी मैदान की प्रतिमा 2013 में स्थापित की गई थी और इसकी ऊंचाई बेस सहित 72 फीट बताई गई है।
पटना में महात्मा गांधी से जुड़ी विरासत केवल प्रतिमाओं तक सीमित नहीं है। पटना जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार गांधी संग्रहालय का निर्माण 1967 में हुआ था और वहां महात्मा गांधी के जीवन, उनके विचारों तथा बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका से संबंधित सामग्री प्रदर्शित की जाती है।
यही वजह है कि शहर की सड़कों पर लगी गांधी प्रतिमाओं की देखरेख का महत्व और बढ़ जाता है। ये प्रतिमाएं केवल पत्थर, धातु या किसी अन्य सामग्री से बनी आकृतियां नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति को बनाए रखने का माध्यम भी हैं। इनके आसपास गंदगी या अतिक्रमण होने पर केवल एक प्रतिमा प्रभावित नहीं होती, बल्कि उस सार्वजनिक स्थल की पहचान भी कमजोर होती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि गांधी जयंती या पुण्यतिथि के मौके पर माल्यार्पण और कार्यक्रमों के साथ-साथ पूरे वर्ष प्रतिमाओं की नियमित सफाई की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रतिमा के आसपास कूड़ा न जमा हो, वहां किसी तरह का अनधिकृत सामान न रखा जाए और क्षतिग्रस्त प्रतिमाओं की समय पर मरम्मत कराई जाए, इसके लिए स्पष्ट जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
सार्वजनिक स्थलों की देखरेख में केवल नगर निगम या प्रशासन की भूमिका नहीं होती। स्थानीय दुकानदारों और आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी होती है कि वे प्रतिमाओं के आसपास कचरा न डालें और सार्वजनिक स्मारकों की जगह को निजी उपयोग के लिए न घेरें। यदि किसी प्रतिमा के सामने फूल की दुकान, चारे की बोरी या निर्माण सामग्री रखी जाती है, तो संबंधित व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि स्मारक की दृश्यता और पहुंच प्रभावित न हो।
पटना में सफाई व्यवस्था को लेकर पहले भी अलग-अलग क्षेत्रों से शिकायतें और रिपोर्ट सामने आती रही हैं। शहर में सफाई व्यवस्था और कचरा उठाव को लेकर नगर निगम की ओर से अलग-अलग व्यवस्थाएं संचालित की जाती हैं। अप्रैल 2026 में पटना के कई गंगा घाटों पर कचरे के ढेर और सफाई व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें भी सामने आई थीं, जबकि नगर निगम ने नियमित सफाई और कचरा उठाव का दावा किया था।
इस पृष्ठभूमि में गांधी प्रतिमाओं के आसपास की स्थिति को केवल एक दिन की सफाई से ठीक नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि प्रतिमा स्थलों की नियमित निगरानी हो और जहां भी कचरा या अतिक्रमण नजर आए, वहां तत्काल कार्रवाई की जाए। खासकर उन प्रतिमाओं की सूची तैयार की जा सकती है जो शहर के प्रमुख चौराहों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर लगी हैं और उनकी नियमित सफाई व रखरखाव की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
गांधी जयंती के मौके पर प्रतिमाओं पर फूल चढ़ाना और माल्यार्पण करना एक परंपरा है, लेकिन गांधीजी के विचारों में स्वच्छता और सार्वजनिक जिम्मेदारी का भी विशेष स्थान रहा है। इसलिए यदि उनकी प्रतिमा के आसपास कचरा पड़ा हो, तो यह स्थिति समारोह की औपचारिकता से कहीं ज्यादा बड़े सवाल को सामने लाती है। सार्वजनिक स्थल को साफ रखना और स्मारकों की गरिमा बनाए रखना भी नागरिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
पटना सिटी में सामने आई अलग-अलग तस्वीरों में कहीं पत्ता गोभी का कचरा है, कहीं जानवरों के चारे की बोरियां, कहीं नीला ड्रम और कहीं फूलों की दुकान से ढकी प्रतिमा। एक स्थान पर तो प्रतिमा का सिर और धड़ ही करीब ढाई साल से गायब बताए जा रहे हैं। इन सभी घटनाओं को एक साथ देखने पर यह सवाल उठता है कि गांधीजी को याद करने की हमारी जिम्मेदारी क्या केवल गांधी जयंती तक सीमित रहनी चाहिए।
गांधी जयंती पर देशभर में स्वच्छता, सादगी और सार्वजनिक जिम्मेदारी की बातें होंगी। ऐसे में पटना सिटी की ये प्रतिमाएं भी शायद यही सवाल पूछती नजर आती हैं कि जिस शहर में बापू की प्रतिमाएं लगी हैं, वहां उनके आसपास का वातावरण पूरे साल कैसा रहना चाहिए। प्रतिमाओं को सम्मान देने का मतलब केवल विशेष अवसरों पर माल्यार्पण करना नहीं, बल्कि उनके आसपास साफ-सफाई, सुरक्षा और नियमित रखरखाव सुनिश्चित करना भी है।
अब स्थानीय लोगों की नजर इस बात पर है कि गांधी जयंती के बाद इन प्रतिमा स्थलों की स्थिति में कितना बदलाव आता है। क्या कचरा हटेगा, क्या बोरियां और ड्रम हटाए जाएंगे, क्या फूलों की दुकानों को व्यवस्थित किया जाएगा और क्या वर्षों से क्षतिग्रस्त प्रतिमा की मरम्मत होगी—इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में प्रशासनिक कार्रवाई से मिलेगा।












