सिलीगुड़ी युवा सम्मेलन: RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- 'जो स्वयं को हिंदू नहीं मानते, वे भी हिंदू पूर्वजों के ही वंशज हैं'

सिलीगुड़ी युवा सम्मेलन में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि जो स्वयं को हिंदू नहीं मानते, वे भी हिंदू पूर्वजों के वंशज हैं। जानें पूरा बयान और चर्चा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित एक विशाल युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए राष्ट्र, संस्कृति और युवाओं की भूमिका को लेकर कई अहम विचार रखे। 

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों पश्चिम बंगाल के दौरे पर हैं। उन्होंने सिलीगुड़ी में आयोजित एक युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए अहम बयान दिया। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि आज जो लोग स्वयं को ‘हिन्दू’ नहीं मानते, वे भी हिन्दू पूर्वजों के ही वंशज हैं। उन्होंने कहा कि पूजा-पद्धति और खान-पान भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हम सभी एक ही राष्ट्र और एक ही संस्कृति के अंग हैं।

हम एक राष्ट्र और एक संस्कृति के अंग हैं - मोहन भागवत

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि आज जो लोग स्वयं को हिंदू नहीं मानते, वे भी हिंदू पूर्वजों के ही वंशज हैं। पूजा-पद्धति, खान-पान और जीवनशैली अलग हो सकती है, लेकिन राष्ट्र और सांस्कृतिक मूल एक हैं। उन्होंने कहा कि विविधताओं का सम्मान करना ही हिंदू संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। भागवत के अनुसार, “जिसके हृदय में भारत-भक्ति नहीं है, वह हिंदू नहीं हो सकता।” उन्होंने इस विचार के माध्यम से हिंदू संस्कृति को संकीर्ण धार्मिक पहचान से ऊपर बताते हुए उसे एक व्यापक सांस्कृतिक अवधारणा के रूप में प्रस्तुत किया।

RSS प्रमुख ने युवाओं से आह्वान करते हुए कहा कि भविष्य की जिम्मेदारी अंततः युवाओं के कंधों पर ही आएगी, चाहे वे इसे स्वेच्छा से स्वीकार करें या नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि व्यक्ति केवल अपने और अपने परिवार के लिए काम करे, तो क्या संकट के समय समाज और देश सुरक्षित रह पाएंगे? इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब-जब देश पर संकट आया है, तब समाज ने संगठित होकर उसका सामना किया—चाहे वह शक, हूण, मुगल, पठान या अंग्रेजों का दौर रहा हो।

सिलीगुड़ी युवा सम्मेलन: RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा- 'जो स्वयं को हिंदू नहीं मानते, वे भी हिंदू पूर्वजों के ही वंशज हैं'

समाज सुधार और आत्मबोध की परंपरा

मोहन भागवत ने समाज सुधार आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने आत्मबोध को पुनर्जीवित करने का कार्य किया। उन्होंने RSS के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (डॉक्टर जी) के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि किशोर अवस्था में ही उन्होंने नागपुर में ‘वंदे मातरम्’ आंदोलन का नेतृत्व किया था।

उन्होंने कहा कि वीर सावरकर, सुभाषचंद्र बोस और लोकमान्य तिलक की तरह डॉ. हेडगेवार का भी मानना था कि समाज निर्माण के बिना राष्ट्रोद्धार संभव नहीं है। इसी सोच के साथ उन्होंने व्यक्ति-निर्माण को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला बनाया।

“विविधता ही एकता की खोज है” - भागवत

भागवत ने रवींद्रनाथ ठाकुर के निबंध ‘स्वदेशी समाज’ का उल्लेख करते हुए नेतृत्व की अवधारणा पर बात की और कहा कि संघ भारतीय महापुरुषों के विचारों को व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया है। उन्होंने कहा, “हम कहते हैं—विविधता ही एकता की खोज है।” भारत का प्रत्येक नागरिक भारत के लिए जिए, भारत को जाने और भारत को माने—यही संघ का संदेश है।

अपने संबोधन के अंत में RSS प्रमुख ने युवाओं से आग्रह किया कि वे संविधान की संक्षिप्त प्रति अपने घर में रखें और उसका अध्ययन करें। साथ ही उन्होंने कहा कि संघ में आइए, उसे परखिए और यदि उचित लगे तो उसके सामाजिक कार्यों से जुड़िए।
उन्होंने युवाओं को राष्ट्रोत्थान के इस अभियान में सहभागी बनने का आह्वान किया।

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