Sonia Gandhi Voter List Case: नागरिकता से पहले वोटर लिस्ट में नाम का दावा, राऊज एवेन्यू कोर्ट 29 अगस्त को सुनाएगा फैसला

Sonia Gandhi Voter List Case: नागरिकता मिलने से पहले वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने के दावे से जुड़े मामले पर राऊज एवेन्यू कोर्ट 29 अगस्त को फैसला सुनाएगा।

बिना भारतीय नागरिकता हासिल किए मतदाता सूची में नाम शामिल होने के आरोप से जुड़े मामले में Sonia Gandhi सोनिया गांधी के खिलाफ दाखिल रिवीजन पिटीशन पर अदालत का फैसला टल गया है। मामले में अब 29 अगस्त को फैसला सुनाया जाएगा।

नई दिल्ली: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से जुड़े मतदाता सूची विवाद में दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट अब 29 अगस्त 2026 को अपना फैसला सुना सकती है। मामला इस आरोप से जुड़ा है कि सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता मिलने से पहले ही उनका नाम नई दिल्ली की मतदाता सूची में दर्ज था। इस मामले में दाखिल रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा था। अब अगली तारीख 29 अगस्त तय की गई है।

यह मामला राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें 1980 की मतदाता सूची में सोनिया गांधी के नाम की मौजूदगी और उनकी भारतीय नागरिकता की तारीख के बीच कथित अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आरोप याचिका में लगाए गए हैं और अदालत ने अभी इन आरोपों को सही ठहराने वाला अंतिम फैसला नहीं दिया है।

क्या है पूरा विवाद?

मामले में याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज था, जबकि उन्हें भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। इसी आधार पर याचिका में पूछा गया है कि भारतीय नागरिक बने बिना उनका नाम मतदाता सूची में किस प्रक्रिया और किस दस्तावेज के आधार पर दर्ज किया गया।

इस मामले को लेकर शिकायतकर्ता ने संबंधित रिकॉर्ड और चुनावी दस्तावेजों की जांच की मांग की है। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि यदि नाम 1980 में दर्ज हुआ था, तो उसके लिए पात्रता किस आधार पर तय की गई थी।

1982 में नाम हटाए जाने का भी दावा

याचिका में यह दावा भी किया गया है कि सोनिया गांधी का नाम बाद में 1982 में मतदाता सूची से हटा दिया गया था। शिकायतकर्ता ने अदालत के सामने सवाल रखा है कि नाम हटाने के पीछे क्या वजह थी और इसके लिए किस प्रक्रिया का पालन किया गया। याचिका में आगे यह भी पूछा गया है कि यदि नाम हटाए जाने के बाद 1983 में फिर से दर्ज किया गया, तो उस समय इस्तेमाल किए गए दस्तावेज क्या थे। मामले के समर्थकों का तर्क है कि इन घटनाक्रमों की आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर विस्तृत जांच होनी चाहिए।

हालांकि, इस पूरे विवाद में किसी भी कथित फर्जी दस्तावेज या अनियमितता को अदालत द्वारा अभी साबित नहीं माना गया है। इसलिए आरोपों और स्थापित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

मामला अदालत तक कैसे पहुंचा?

यह विवाद तब न्यायिक प्रक्रिया में आया जब अधिवक्ता विकास त्रिपाठी ने सोनिया गांधी के खिलाफ पुलिस जांच और प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की। निचली अदालत से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने रिवीजन पिटीशन के जरिए राऊज एवेन्यू कोर्ट का रुख किया। बाद में अदालत ने मामले में संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगे।

रिपोर्टों के अनुसार, याचिका में आरोप लगाया गया कि मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं हुआ। शिकायतकर्ता ने पुलिस जांच के जरिए पुराने चुनावी रिकॉर्ड, दस्तावेजों और नाम दर्ज करने की प्रक्रिया की सत्यता सामने लाने की मांग की।

नागरिकता और मतदाता बनने का सवाल क्यों अहम?

भारत में मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए भारतीय नागरिक होना एक बुनियादी कानूनी शर्त है। इसी वजह से याचिका में 1980 की मतदाता सूची और 1983 में नागरिकता मिलने की तारीख के बीच संबंध पर जोर दिया गया है। हालांकि, 40 साल से अधिक पुराने चुनावी रिकॉर्ड से जुड़े मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अदालत के सामने पेश दस्तावेजों की प्रामाणिकता, रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया और उस समय लागू चुनावी नियमों की व्याख्या कैसे की जाती है।

29 अगस्त पर सबकी नजर

राऊज एवेन्यू कोर्ट का आगामी फैसला यह स्पष्ट कर सकता है कि याचिका में उठाए गए आरोपों पर आगे किसी जांच या कानूनी कार्रवाई की जरूरत है या नहीं। अदालत के फैसले से यह भी तय होगा कि शिकायतकर्ता की मांगों को किस हद तक स्वीकार किया जाता है। मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि सोनिया गांधी देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की वरिष्ठ नेता हैं। ऐसे में अदालत का फैसला कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ राजनीतिक बहस को भी प्रभावित कर सकता है।

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