नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामलों की तेज सुनवाई की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने अदालत को बताया कि 28 में से 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की जानकारी दी है।
नई दिल्ली: भारत में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान एक अहम रिपोर्ट सामने आई है। वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी विजय हंसारिया की ओर से अदालत में पेश की गई जानकारी के मुताबिक, देश के 28 राज्यों में से 14 राज्यों के मौजूदा मुख्यमंत्रियों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की है। इस सूची में तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी सबसे ऊपर हैं, जिनके खिलाफ 89 मामले लंबित बताए गए हैं।
रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है, जब सुप्रीम कोर्ट सांसदों और विधायकों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई में तेजी लाने और इन मुकदमों की प्रभावी निगरानी से जुड़े मुद्दे पर विचार कर रहा है। अदालत के सामने पेश की गई जानकारी ने भारतीय राजनीति में आपराधिक मामलों की मौजूदगी और लंबे समय तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया पर फिर बहस तेज कर दी है।
किन मुख्यमंत्रियों पर कितने मामले?
रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के खिलाफ 89 मामले हैं। उनके बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 मामले बताए गए हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ 19-19 मामले हैं, जबकि केरल के मुख्यमंत्री वीराम मंदिर चढ़ावा चोरी: SIT जांच में चंपत राय और अनिल मिश्रा को क्लीन चिट, टीम ने शासन को सौंपी रिपोर्टडी. सतीशन के खिलाफ 18 मामले दर्ज बताए गए हैं।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ पांच मामले बताए गए हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के खिलाफ चार-चार मामले हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ दो-दो मामले बताए गए हैं।
सिक्किम के मुख्यमंत्री पी.एस. तमांग, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के खिलाफ एक-एक मामले का उल्लेख रिपोर्ट में किया गया है। यहां यह समझना जरूरी है कि किसी नेता के खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होना अपने आप में दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। अंतिम अपराध सिद्धि या निर्दोषता का फैसला संबंधित अदालत ही करती है।

4,192 मामले अभी भी लंबित
विजय हंसारिया की 96 पन्नों की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 तक मौजूदा और पूर्व सांसदों तथा विधायकों के खिलाफ कुल 4,192 आपराधिक मामले सुनवाई के लिए लंबित थे। उत्तर प्रदेश में ऐसे मामलों की संख्या सबसे अधिक 1,171 बताई गई है।
रिपोर्ट में विधायकों और सांसदों के बीच गंभीर आपराधिक मामलों की स्थिति भी बताई गई है। पश्चिम बंगाल में 292 विधायकों में से 170 यानी करीब 58 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले बताए गए हैं। इसके बाद केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, ओडिशा, बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों का उल्लेख किया गया है।
लोकसभा और राज्यसभा में भी बड़ी संख्या
रिपोर्ट के मुताबिक, 543 लोकसभा सदस्यों में से 170 सांसदों यानी करीब 31 प्रतिशत के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित बताए गए हैं। राज्यसभा के 233 सदस्यों में से 75 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी दी गई है। इनमें 40 सदस्यों के मामले गंभीर अपराधों से जुड़े बताए गए हैं, जिनमें पांच साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि तेलंगाना, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों के लोकसभा सांसदों में गंभीर मामलों का अनुपात उल्लेखनीय है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या सुझाव रखे गए?
एमिकस क्यूरी की ओर से अदालत के सामने सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई तेज करने के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था मजबूत करने का सुझाव रखा गया है। साथ ही संबंधित हाई कोर्ट को ऐसे मामलों की प्रगति की नियमित निगरानी करने की जरूरत बताई गई है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह कार्यवाही इस व्यापक सवाल से जुड़ी है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई वर्षों तक लंबित न रहे। अदालत के सामने रखी गई ताजा जानकारी से साफ है कि यह समस्या केवल किसी एक राजनीतिक दल या राज्य तक सीमित नहीं है।












