Tata Steel का बड़ा कारनामा: चिमनियों में जलने वाली गैस से अब बनेगा ग्रीन स्टील जमशेदपुर प्लांट में नई तकनीक से घटेगा कार्बन उत्सर्जन

जमशेदपुर में Tata Steel कोक-ओवन गैस से ग्रीन स्टील बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। EASyMelt तकनीक से CO2 उत्सर्जन घटाने की तैयारी है।
Tata Steel का बड़ा कारनामा: चिमनियों में जलने वाली गैस से अब बनेगा ग्रीन स्टील जमशेदपुर प्लांट में नई तकनीक से घटेगा कार्बन उत्सर्जन
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जमशेदपुर स्थित टाटा स्टील प्लांट से स्टील उद्योग के लिए बड़ी और महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। कंपनी ने स्टील उत्पादन को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में एक नई तकनीकी पहल शुरू की है, जिसके तहत कोक-ओवन से निकलने वाली गैस यानी Coke Oven Gas (COG) का इस्तेमाल ब्लास्ट फर्नेस में किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य कोयले और कोक पर निर्भरता कम करना तथा स्टील उत्पादन के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को घटाना है। टाटा स्टील ने इस दिशा में SMS Group के साथ मिलकर EASyMelt तकनीक को जमशेदपुर वर्क्स में लागू करने की योजना बनाई है। कंपनी के मुताबिक जमशेदपुर का ‘E’ ब्लास्ट फर्नेस दुनिया में इस तकनीक के औद्योगिक प्रदर्शन के लिए पहला संयंत्र होगा।

स्टील उद्योग में कार्बन उत्सर्जन कम करना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस आधारित स्टील उत्पादन में कोक और कोयले का महत्वपूर्ण इस्तेमाल होता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। ऐसे में दुनिया भर की स्टील कंपनियां ऐसी तकनीकों पर काम कर रही हैं जिनसे मौजूदा उत्पादन व्यवस्था को पूरी तरह बंद किए बिना ही उत्सर्जन कम किया जा सके। टाटा स्टील का जमशेदपुर में कोक-ओवन गैस के इस्तेमाल का प्रयोग इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कोक-ओवन गैस स्टील प्लांट में कोयले से कोक तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न होती है। सामान्य तौर पर इस गैस का उपयोग ऊर्जा के लिए किया जाता है, लेकिन अब इसे स्टील बनाने की प्रक्रिया में एक वैकल्पिक रिड्यूसेंट के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में काम किया जा रहा है। टाटा स्टील की योजना EASyMelt तकनीक के माध्यम से Coke Oven Gas को ब्लास्ट फर्नेस में इंजेक्ट करने की है। कंपनी की रिपोर्ट के अनुसार इस तकनीक का उद्देश्य कोक की खपत कम करना और कार्बन उत्सर्जन घटाना है।

EASyMelt यानी Electrically Assisted Syngas Smelter तकनीक को स्टील निर्माण के डीकार्बोनाइजेशन के लिए विकसित किया गया है। टाटा स्टील ने अप्रैल 2026 में SMS Group की कंपनी Paul Wurth के साथ इस तकनीक को लेकर समझौता किया था। कंपनी के अनुसार जमशेदपुर के ‘E’ ब्लास्ट फर्नेस में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। इस परियोजना से बेसलाइन ब्लास्ट फर्नेस संचालन की तुलना में CO2 उत्सर्जन को 50 प्रतिशत से अधिक कम करने की क्षमता बताई गई है।

इस तकनीक की खासियत यह है कि यह मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस सिस्टम को पूरी तरह बदलने के बजाय उसमें नई तकनीकी व्यवस्था जोड़कर डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार करती है। इससे स्टील उत्पादन करने वाली कंपनियों के लिए यह मॉडल महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि मौजूदा बड़े औद्योगिक संयंत्रों को एक साथ पूरी तरह नई तकनीक में बदलना बेहद महंगा और जटिल होता है। पुराने सिस्टम में चरणबद्ध तरीके से नई तकनीक जोड़कर उत्सर्जन कम करना व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है।

टाटा स्टील की यह पहल कंपनी की व्यापक नेट-जीरो रणनीति का हिस्सा है। कंपनी ने वर्ष 2045 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए जमशेदपुर सहित विभिन्न संयंत्रों में वैकल्पिक ईंधन, ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन कैप्चर और नई आयरनमेकिंग तकनीकों पर काम किया जा रहा है। कंपनी की हालिया जलवायु रिपोर्ट में कोक-ओवन गैस इंजेक्शन, बायोचार, हाइड्रोजन और EASyMelt जैसी तकनीकों को डीकार्बोनाइजेशन रणनीति का हिस्सा बताया गया है।

जमशेदपुर प्लांट में इससे पहले भी कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कई प्रयोग किए जा चुके हैं। कंपनी ने ब्लास्ट फर्नेस में हाइड्रोजन इंजेक्शन का बड़े स्तर पर परीक्षण किया है और बायोचार के इस्तेमाल पर भी काम किया है। टाटा स्टील की रिपोर्ट के मुताबिक जमशेदपुर में कोल बेड मीथेन यानी CBM को ब्लास्ट फर्नेस में इंजेक्ट करने का ट्रायल भी किया गया है। इन प्रयासों का उद्देश्य पारंपरिक जीवाश्म ईंधन और कोक की निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।

ग्रीन स्टील की दिशा में कंपनी का एक और महत्वपूर्ण प्रयास वेस्ट हीट रिकवरी से जुड़ा है। जमशेदपुर के सिंटर प्लांट नंबर-3 में टाटा स्टील और जर्मन कंपनी Kraftblock ने थर्मल एनर्जी स्टोरेज सिस्टम पर काम किया है। इस व्यवस्था में सिंटरिंग प्रक्रिया से निकलने वाली उच्च ताप वाली अपशिष्ट गर्मी को वातावरण में जाने देने के बजाय संग्रहित किया जाता है और बाद में प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कंपनी ने बताया है कि इस पायलट से ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है तथा सालाना करीब 22,000 टन CO2 उत्सर्जन कम करने की क्षमता हासिल हुई है।

अब कोक-ओवन गैस के इस्तेमाल की पहल को इस पूरी प्रक्रिया में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है। स्टील उत्पादन में कोक की खपत कम होने का सीधा असर कार्बन उत्सर्जन पर पड़ सकता है। यदि इस तकनीक का औद्योगिक स्तर पर प्रदर्शन सफल रहता है तो भविष्य में इसे बड़े पैमाने पर अपनाने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे मौजूदा स्टील संयंत्रों को कम कार्बन वाली उत्पादन प्रणाली की ओर ले जाने में मदद मिल सकती है।

टाटा स्टील के लिए जमशेदपुर प्लांट का महत्व केवल उत्पादन क्षमता के कारण नहीं है। यह कंपनी का ऐतिहासिक संयंत्र है और यहां लंबे समय से तकनीकी नवाचारों को अपनाया जाता रहा है। कंपनी लगातार पुराने सिस्टम को आधुनिक तकनीक से बदलने और उत्पादन प्रक्रिया को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने पर काम कर रही है। हाल के वर्षों में जमशेदपुर में नए कोक प्लांट और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन सुविधाओं को लेकर भी निवेश किया गया है।

ग्रीन स्टील की वैश्विक मांग भी लगातार बढ़ रही है। दुनिया के कई देशों में ऑटोमोबाइल, निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां अपने सप्लाई चेन से कार्बन उत्सर्जन कम करने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में कम कार्बन उत्सर्जन के साथ तैयार किया गया स्टील भविष्य में उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण उत्पाद बन सकता है। हालांकि ग्रीन स्टील के उत्पादन की लागत अभी पारंपरिक स्टील की तुलना में अधिक हो सकती है, इसलिए तकनीक को बड़े पैमाने पर किफायती बनाना भी बड़ी चुनौती है।

भारत में स्टील उद्योग के लिए डीकार्बोनाइजेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश दुनिया के सबसे बड़े स्टील उत्पादकों में शामिल है। उत्पादन बढ़ने के साथ ऊर्जा की जरूरत और कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता है। इसलिए अगर मौजूदा संयंत्रों में ही उत्सर्जन कम करने की तकनीक सफलतापूर्वक लागू की जाती है तो इसका व्यापक प्रभाव हो सकता है।

टाटा स्टील की नई पहल का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें केवल नई ऊर्जा का इस्तेमाल करने पर निर्भर रहने के बजाय मौजूदा औद्योगिक प्रक्रिया से निकलने वाले संसाधन का बेहतर इस्तेमाल किया जा रहा है। कोक-ओवन गैस को एक उपयोगी इनपुट के रूप में इस्तेमाल करने से एक तरफ गैस का बेहतर उपयोग होगा और दूसरी तरफ कोक की आवश्यकता कम करने का प्रयास होगा। इस तरह औद्योगिक प्रक्रिया के भीतर ही संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल की दिशा मजबूत हो सकती है।

हालांकि यह समझना जरूरी है कि कोक-ओवन गैस के इस्तेमाल से स्टील तुरंत पूरी तरह शून्य-कार्बन यानी शत-प्रतिशत ग्रीन नहीं हो जाएगा। ग्रीन स्टील की ओर बढ़ना एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें उत्पादन की पूरी वैल्यू चेन में उत्सर्जन कम करना पड़ता है। टाटा स्टील का EASyMelt प्रोजेक्ट इसी व्यापक डीकार्बोनाइजेशन यात्रा का हिस्सा है। कंपनी स्वयं इसे कार्बन उत्सर्जन घटाने की तकनीकी पहल के रूप में देख रही है।

जमशेदपुर में इस तकनीक के औद्योगिक प्रदर्शन का सफल होना इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि इससे यह पता चलेगा कि कोक-ओवन गैस आधारित डीकार्बोनाइजेशन को बड़े पैमाने पर किस तरह लागू किया जा सकता है। औद्योगिक स्तर पर तकनीक की स्थिरता, उत्पादन क्षमता, लागत और उत्सर्जन में वास्तविक कमी जैसे कई पहलुओं का मूल्यांकन किया जाएगा। सफल परिणाम मिलने पर भविष्य में ऐसी तकनीकों को दूसरे संयंत्रों में भी अपनाने की संभावना बन सकती है।

टाटा स्टील की दीर्घकालिक रणनीति में केवल कोक-ओवन गैस ही शामिल नहीं है। कंपनी की जलवायु रिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा, बायोचार, हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, HIsarna और EASyMelt जैसी अलग-अलग तकनीकों को शामिल किया गया है। कंपनी का लक्ष्य एक ही तकनीक पर निर्भर रहने के बजाय कई विकल्पों के जरिए उत्सर्जन कम करना है।

कंपनी की हालिया योजनाओं से यह भी संकेत मिलता है कि जमशेदपुर प्लांट को भविष्य के कम-कार्बन स्टील उत्पादन के लिए तैयार करने पर जोर है। सितंबर 2026 की रिपोर्टों के मुताबिक टाटा स्टील जमशेदपुर में पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन और आधुनिक तकनीक के लिए बड़े निवेश की दिशा में आगे बढ़ रही है और 2045 तक नेट-जीरो का लक्ष्य रखा गया है।

स्टील उद्योग के लिए यह बदलाव केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं है। आने वाले वर्षों में कार्बन उत्सर्जन से जुड़े नियम, कार्बन टैक्स और अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग कंपनियों के कारोबार को प्रभावित कर सकती है। कम कार्बन वाला स्टील तैयार करने की क्षमता भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में भी मदद कर सकती है। यूरोप सहित कई बाजारों में स्टील के कार्बन फुटप्रिंट को लेकर नियम लगातार कड़े हो रहे हैं।

ऐसे में जमशेदपुर में EASyMelt जैसी तकनीक का प्रयोग टाटा स्टील के लिए भविष्य की तैयारी के रूप में भी देखा जा सकता है। यदि कंपनी मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस में ही कोक की खपत और CO2 उत्सर्जन को बड़े स्तर पर कम करने में सफल होती है तो इससे उत्पादन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण तैयार हो सकता है।

कुल मिलाकर टाटा स्टील का कोक-ओवन गैस को ब्लास्ट फर्नेस में इस्तेमाल करने का प्रयोग जमशेदपुर को ग्रीन स्टील की दिशा में आगे ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम है। कंपनी ने SMS Group के साथ मिलकर EASyMelt तकनीक के जरिए उत्सर्जन कम करने की योजना बनाई है और जमशेदपुर का ‘E’ ब्लास्ट फर्नेस इस तकनीक के पहले औद्योगिक प्रदर्शन का केंद्र बनने जा रहा है। कंपनी का दावा है कि इससे बेसलाइन संचालन की तुलना में CO2 उत्सर्जन 50 प्रतिशत से अधिक कम करने की क्षमता है।

आने वाले समय में इस परियोजना के परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि कोक-ओवन गैस जैसी वैकल्पिक गैसों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कम-कार्बन स्टील उत्पादन में कितना प्रभावी साबित होता है। टाटा स्टील का 2045 तक नेट-जीरो का लक्ष्य और जमशेदपुर में लगातार किए जा रहे तकनीकी प्रयोग यह दिखाते हैं कि कंपनी पारंपरिक स्टील उत्पादन से कम-कार्बन उत्पादन प्रणाली की ओर चरणबद्ध बदलाव की तैयारी कर रही है।

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