Mamata Banerjee की पार्टी All India Trinamool Congress से 20 सांसदों के कथित अलग होने की खबर ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है।
नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में दल-बदल और संसदीय नैतिकता को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों के एक गुट द्वारा कथित रूप से अलग होकर एक नई राजनीतिक पहचान अपनाने और नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी (NCPI) में विलय के दावे के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है।
इसी घटनाक्रम पर राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इस पूरे प्रकरण को “लोकतंत्र का मज़ाक” बताया और संबंधित सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है।
कपिल सिब्बल ने क्या कहा?
कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए कहा कि TMC के बागी सांसदों द्वारा किसी अन्य राजनीतिक दल में एकतरफा विलय करना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने लिखा कि कोई भी गुट तब तक किसी दूसरी पार्टी में विलय नहीं कर सकता जब तक मूल पार्टी यानी TMC इसकी सहमति न दे।
सिब्बल के अनुसार, यह कदम दल-बदल कानून और संसदीय परंपराओं की भावना के खिलाफ है। उन्होंने अपने बयान में सख्त लहजे में कहा, “उन्हें अयोग्य घोषित किया जाए।”
क्या है पूरा विवाद?
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सिब्बल ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाला बताते हुए कहा कि भारतीय राजनीति में इस तरह की घटनाएं संसदीय मर्यादाओं को कमजोर करती हैं। उनका कहना है कि सांसदों का किसी दल से अलग होकर नई पार्टी में शामिल होना तभी वैध माना जा सकता है जब यह प्रक्रिया संविधान और दल-बदल कानून के दायरे में हो।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 सांसदों के एक समूह ने अलग राजनीतिक रुख अपनाने का दावा किया और नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ जुड़ने की घोषणा की।
इसके बाद इस समूह ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर संसद में अलग बैठने की मांग की। सांसदों का कहना है कि यह समूह उनकी कुल संख्या का दो-तिहाई से अधिक है, इसलिए इसे वैध विलय माना जाना चाहिए। सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि यह गुट अब NCPI के साथ मिलकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के साथ काम करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
दल-बदल कानून पर फिर शुरू हुई बहस
इस पूरे मामले ने एक बार फिर भारत के Anti-Defection Law (दल-बदल विरोधी कानून) को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यह कानून उन सांसदों और विधायकों पर लागू होता है जो अपनी मूल पार्टी छोड़कर किसी अन्य दल में शामिल होते हैं या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ वोट करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी समूह के “विलय” को मान्यता देने का अंतिम अधिकार संसद और संवैधानिक प्रक्रियाओं के पास होता है, न कि केवल राजनीतिक घोषणाओं के आधार पर।
बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक पत्र सौंपकर सदन में अलग बैठने की अनुमति मांगी है। उनका तर्क है कि चूंकि एक बड़ा समूह अलग हो चुका है, इसलिए उन्हें अलग राजनीतिक इकाई के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। हालांकि, इस पर अंतिम निर्णय संसदीय नियमों और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही लिया जाएगा।











