हाई कोर्ट का बड़ा फैसला 22 साल की दैनिक वेतन सेवा भी पेंशन में जुड़ेगी, यूपी सरकार की अपील खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दैनिक वेतन पर 22 साल की सेवा को पेंशन योग्य माना है। यूपी सरकार की अपील खारिज कर कर्मचारी की पेंशन फिर तय करने का आदेश दिया।
हाई कोर्ट का बड़ा फैसला 22 साल की दैनिक वेतन सेवा भी पेंशन में जुड़ेगी, यूपी सरकार की अपील खारिज
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प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी ने नियमित होने से पहले यदि लंबे समय तक लगातार दैनिक वेतन पर सेवा की है तो केवल इस आधार पर उस अवधि को पेंशन योग्य सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि 22 साल तक लगातार किसी कर्मचारी का काम करना महज कैजुअल या अस्थायी सेवा मानना उचित नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष अपील को खारिज करते हुए दैनिक वेतन पर की गई लंबी सेवा को पेंशन के लिए गिने जाने का रास्ता साफ कर दिया।

यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्होंने अपनी नौकरी की शुरुआत दैनिक वेतन पर की, वर्षों तक लगातार विभाग या स्थानीय निकाय में काम किया और बाद में उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा मिला। ऐसे कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के समय अक्सर विवाद इस बात को लेकर सामने आता रहा है कि नियमितीकरण से पहले की सेवा को पेंशन की गणना में शामिल किया जाए या नहीं। ताजा मामले में हाई कोर्ट ने लंबी और निरंतर सेवा की वास्तविकता को महत्व देते हुए राज्य सरकार की उस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया, जिसमें दैनिक वेतन की अवधि को पेंशन योग्य सेवा नहीं माना गया था।

मामला कुशीनगर नगर पालिका के कर्मचारी राम प्रसाद यादव से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक यादव की नियुक्ति 31 मार्च 1989 को दैनिक वेतन के आधार पर हुई थी। इसके बाद उन्होंने करीब 22 वर्षों तक लगातार इसी व्यवस्था के तहत काम किया और एक सितंबर 2011 को उन्हें क्लर्क पद पर नियमित किया गया। बाद में सेवानिवृत्ति के बाद नगर पालिका की ओर से उनकी पेंशन रोक दी गई। 31 अक्टूबर 2020 को जारी आदेश में यह आधार लिया गया कि दैनिक वेतन भोगी के तौर पर की गई उनकी सेवा पेंशन योग्य नहीं है। इस फैसले के खिलाफ मामला अदालत तक पहुंचा।

इससे पहले एकल पीठ ने मार्च 2022 में राम प्रसाद यादव के पक्ष में फैसला सुनाया था। एकल पीठ ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए पेंशन का लाभ देने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अपील दाखिल की। सरकार की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि दैनिक वेतन पर की गई सेवा को स्थायी स्थापना पर मौलिक पद पर की गई सेवा के बराबर नहीं माना जा सकता और संबंधित नियमों के तहत पेंशन योग्य सेवा के लिए स्थायी एवं मौलिक पद पर सेवा की शर्त लागू होती है।

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने की। खंडपीठ ने राज्य सरकार की दलीलों पर विचार करने के बाद विशेष अपील को खारिज कर दिया और एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखा। कोर्ट ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि कर्मचारी ने महज कुछ दिनों या कुछ महीनों तक दैनिक वेतन पर काम नहीं किया था, बल्कि लगभग 22 वर्षों तक लगातार सेवा दी थी। अदालत के अनुसार इतने लंबे समय तक जारी सेवा को केवल कैजुअल या अस्थायी बताकर उसके पेंशन संबंधी अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राज्य सरकार यह साबित नहीं कर पाती कि कर्मचारी ने 240 दिन की सेवा का मानक पूरा नहीं किया था, तो केवल दैनिक वेतन पर नियुक्ति होने के आधार पर कर्मचारी को पेंशन के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि लंबे समय तक दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों की सेवा को लेकर अलग-अलग स्तर पर विवाद सामने आते रहे हैं। अदालत ने सेवा की वास्तविक निरंतरता और उसकी अवधि को महत्त्वपूर्ण आधार माना है।

सरकार की ओर से उत्तर प्रदेश नगर पालिका (गैर-केंद्रीकृत) सेवा सेवानिवृत्ति लाभ विनियमावली 1984 के प्रावधानों और सिविल सर्विस रेगुलेशन के अनुच्छेद 368 का हवाला दिया गया था। सरकार का कहना था कि पेंशन योग्य पद की प्रकृति और उस पर की गई सेवा के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी है। हालांकि खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 2019 के प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का संदर्भ लेते हुए राज्य सरकार की दलील को स्वीकार नहीं किया।

अदालत के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण था कि किसी कर्मचारी को पहले वर्षों तक काम कराया जाए, उसके बाद नियमित किया जाए और फिर सेवानिवृत्ति के समय शुरुआती सेवा को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाए तो क्या यह उचित होगा। कोर्ट के फैसले का मूल आधार यही रहा कि लंबे समय तक की गई निरंतर सेवा को केवल नियुक्ति के शुरुआती स्वरूप के आधार पर पेंशन की गणना से बाहर नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब कर्मचारी बाद में नियमित सेवा में शामिल हो चुका हो और उसने विभाग के लिए लंबे समय तक काम किया हो।

हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया, जिसमें गैर-पेंशन योग्य, वर्कचार्ज या कंटिंजेंसी जैसी सेवा की अवधि को पेंशन योग्य सेवा में शामिल नहीं करने के प्रावधानों को कुछ परिस्थितियों में भेदभावपूर्ण और अतार्किक माना गया है। इसी न्यायिक दृष्टिकोण को देखते हुए खंडपीठ ने माना कि मामले में एकल पीठ ने सही कानूनी स्थिति को लागू किया था।

फैसले के बाद अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि राम प्रसाद यादव की 1989 से 2011 तक की दैनिक वेतन सेवा को पेंशन योग्य सेवा में जोड़कर उनकी पेंशन का दोबारा निर्धारण किया जाए। अदालत ने इसके लिए तीन महीने की समयसीमा तय की है। इसके साथ ही पेंशन से संबंधित बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश भी दिया गया है। यानी कर्मचारी की नियमित नियुक्ति से पहले की लगभग 22 वर्ष की सेवा अब पेंशन निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

इस फैसले का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे कर्मचारी रहे हैं जिन्होंने वर्षों तक दैनिक वेतन, वर्कचार्ज या अन्य अस्थायी व्यवस्थाओं के तहत काम किया और बाद में नियमित हुए। पेंशन निर्धारण के समय उनकी शुरुआती सेवा को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस फैसले का लाभ हर दैनिक वेतन कर्मचारी को स्वतः और बिना किसी शर्त के मिलने का अर्थ नहीं है। संबंधित कर्मचारी की सेवा की प्रकृति, निरंतरता, नियमितीकरण, लागू सेवा नियम और मामले के तथ्यों के आधार पर कानूनी स्थिति अलग हो सकती है।

दैनिक वेतन सेवा को पेंशन के लिए गिने जाने का मुद्दा केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। मार्च 2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी एक मामले में नियमितीकरण से पहले की लगातार दैनिक वेतन या पार्ट टाइम सेवा को पेंशन योग्य सेवा में शामिल करने का निर्देश दिया था। अदालत ने वहां भी माना था कि नियमितीकरण के बाद की सेवा के साथ पहले की लंबी सेवा को पेंशन के उद्देश्य से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर जब काम की प्रकृति स्थायी या लगातार चलने वाली हो।

हालांकि अलग-अलग राज्यों के सेवा नियम अलग होते हैं, इसलिए किसी एक राज्य के फैसले को दूसरे राज्य के कर्मचारियों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद न्यायालयों में सामने आए ऐसे फैसले यह संकेत देते हैं कि कर्मचारियों की वास्तविक और लंबे समय तक चली सेवा को पेंशन संबंधी अधिकारों पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना जा सकता है। मार्च 2026 के एक अन्य पंजाब मामले में भी हाई कोर्ट ने 1995 से चली आ रही सेवा और बाद में नियमितीकरण के आधार पर पुरानी पेंशन योजना से संबंधित दावे पर विचार किया था।

उत्तर प्रदेश के मौजूदा मामले में सबसे अहम बात यह है कि कर्मचारी ने 1989 से 2011 तक करीब 22 साल दैनिक वेतन पर सेवा की और उसके बाद नियमित हुआ। हाई कोर्ट ने इतनी लंबी अवधि को महज आकस्मिक या अस्थायी सेवा मानने से इनकार किया। अदालत की टिप्पणी का सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी की कुल पेंशन योग्य सेवा कैसे तय की जाएगी। लंबे समय तक विभाग में काम करने के बाद नियमित हुए कर्मचारियों के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उनके शुरुआती सेवाकाल को पूरी तरह नजरअंदाज किए जाने की संभावना कम होती है।

फैसले के अनुसार सरकार को अब संबंधित कर्मचारी की सेवा अवधि को जोड़कर पेंशन का पुनर्निर्धारण करना होगा और निर्धारित अवधि के भीतर बकाया भुगतान करना होगा। इससे कर्मचारी को न सिर्फ भविष्य में मिलने वाली पेंशन की गणना में फायदा होगा, बल्कि पिछली अवधि के बकाये का भी निर्धारण किया जाएगा। अदालत का आदेश प्रशासन के लिए यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि लंबे समय तक जारी रही सेवा को केवल नियुक्ति के शुरुआती स्वरूप के आधार पर पेंशन संबंधी लाभ से अलग नहीं किया जा सकता, जब मामले के तथ्य और लागू कानून कर्मचारी के पक्ष में हों।

इस फैसले को दैनिक वेतन कर्मचारियों के लिए राहत देने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है। खासकर ऐसे कर्मचारी जिन्होंने अपनी नौकरी के शुरुआती वर्षों में कम वेतन और अस्थायी दर्जे के बावजूद लंबे समय तक सरकारी या स्थानीय निकाय की सेवाएं दीं और बाद में नियमित हुए, उनके लिए पेंशन की गणना में उस सेवा अवधि का महत्व बढ़ सकता है। हालांकि प्रत्येक कर्मचारी के मामले में संबंधित नियुक्ति आदेश, सेवा की निरंतरता, नियमितीकरण का आदेश और लागू पेंशन नियमों को अलग से देखना जरूरी होगा।

कुल मिलाकर इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि कर्मचारी की सेवा को केवल उसके शुरुआती नियुक्ति दर्जे के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक अवधि और निरंतरता को ध्यान में रखकर भी देखा जाना चाहिए। राम प्रसाद यादव के मामले में करीब 22 साल की दैनिक वेतन सेवा के बाद नियमितीकरण हुआ था। अदालत ने इस लंबी अवधि को पेंशन निर्धारण से बाहर रखने के फैसले को उचित नहीं माना और राज्य सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए कर्मचारी के पक्ष में पहले दिए गए आदेश को बरकरार रखा। अब संबंधित विभाग को तीन महीने के भीतर पेंशन की गणना दोबारा कर बकाया राशि का भुगतान करना होगा।

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