सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में दोषी गैंगस्टर अबू सलेम को बड़ा झटका देते हुए उसकी समय से पहले रिहाई की याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के अप्रैल 2026 के फैसले को बरकरार रखा।
नई दिल्ली: 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने सलेम की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उसने सजा में मिली छूट यानी remission को जोड़कर 25 साल की कैद पूरी होने का दावा करते हुए समय से पहले रिहाई की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने गुरुवार को मामले पर अपना फैसला सुनाया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई को अबू सलेम की याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। शीर्ष अदालत के फैसले के बाद फिलहाल सलेम की समयपूर्व रिहाई की मांग पर विराम लग गया है।
अबू सलेम ने क्या दलील दी थी?
अबू सलेम की ओर से अदालत में मुख्य दलील यह थी कि जेल में बिताई गई अवधि और सजा में मिलने वाली remission को जोड़ने पर उसकी 25 साल की अवधि पूरी हो चुकी है। इसी आधार पर उसने रिहाई की मांग की थी। सलेम ने यह भी तर्क दिया था कि पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किए जाने के समय दोनों देशों के बीच तय शर्तों का उसकी सजा पर प्रभाव पड़ता है। उसके अनुसार प्रत्यर्पण की शर्तों के तहत भारत में उसे मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता था और उसकी कैद की अवधि 25 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए।
हालांकि, अदालतों ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अप्रैल में सलेम की याचिका को समय से पहले दाखिल माना था। हाई कोर्ट के मुताबिक उसकी 25 वर्ष की अवधि 2030 में पूरी होगी। इसके बाद अबू सलेम ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
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सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के रुख को बरकरार रखते हुए अबू सलेम की याचिका खारिज कर दी। इसका सीधा अर्थ है कि अदालत ने इस स्तर पर उसे समय से पहले रिहा करने का आधार नहीं माना। इससे पहले भी फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट अबू सलेम की रिहाई से जुड़ी एक अन्य याचिका खारिज कर चुका है। लगातार अदालतों में राहत नहीं मिलने के बाद सलेम की कानूनी चुनौती को एक और झटका लगा है।
अबू सलेम को वर्ष 2005 में पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। उसके प्रत्यर्पण के दौरान भारत और पुर्तगाल के बीच कुछ शर्तें तय की गई थीं। सलेम ने इन्हीं शर्तों का हवाला देते हुए अपनी अधिकतम जेल अवधि को 25 वर्ष तक सीमित मानने की दलील दी। हालांकि, सजा की गणना और remission को लेकर अदालतों ने उसकी व्याख्या को स्वीकार नहीं किया।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि 25 वर्ष की अवधि 2030 में पूरी होगी और इस आधार पर तत्काल रिहाई की मांग करना समय से पहले है। सुप्रीम कोर्ट ने अब इसी निष्कर्ष को कायम रखा है।
क्या है 1993 का मुंबई सीरियल ब्लास्ट केस?
12 मार्च 1993 को मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। शहर के अलग-अलग हिस्सों में हुए 12 धमाकों में 250 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए थे। यह मामला देश के सबसे गंभीर आतंकी हमलों में शामिल रहा है और इसकी जांच तथा सुनवाई कई वर्षों तक चली। अबू सलेम को इस मामले में उसकी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया और अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।
पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के बाद सलेम के खिलाफ भारत में कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ी। उसकी सजा और प्रत्यर्पण की शर्तों को लेकर समय-समय पर अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं।









