अरुणाचल प्रदेश की प्रस्तावित सियांग जलविद्युत परियोजना को लेकर विरोध बढ़ रहा है। मानवाधिकार संगठन HRA ने गृह मंत्री अमित शाह से स्वतंत्र जांच की मांग की है। संगठन ने स्थानीय लोगों की सहमति, पुनर्वास और मुआवजे पर सवाल उठाए हैं।
ईटानगर: अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स ऑफ अरुणाचल (HRA) ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। संगठन ने मंगलवार को भेजे अपने ज्ञापन में परियोजना की स्वतंत्र समीक्षा कराने और इसके लिए बनाई गई हाई पावर कमेटी के कामकाज की जांच की मांग उठाई। HRA का कहना है कि सियांग और अपर सियांग जिलों के प्रभावित लोगों को परियोजना से जुड़ी पूरी जानकारी और अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
अमित शाह से हाई पावर कमेटी की जांच कराने की मांग
HRA ने अपने ज्ञापन में राज्य मंत्री ओजिंग तासिंग की अध्यक्षता वाली हाई पावर कमेटी पर सवाल उठाए हैं। संगठन का आरोप है कि स्थानीय लोगों की शिकायतों और आशंकाओं का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया। तासिंग ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज, परिवहन और सहकारिता विभागों से जुड़े मंत्री हैं। उन्हें सियांग परियोजना के प्रारंभिक सर्वे की निगरानी करने वाली उच्चस्तरीय समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।
संगठन चाहता है कि केंद्र सरकार समिति के अब तक के काम की निष्पक्ष समीक्षा कराए। यदि जांच में गंभीर लापरवाही, भ्रामक जानकारी देने या जिम्मेदारी निभाने में विफलता के प्रमाण मिलते हैं, तो समिति के अध्यक्ष को पद से हटाया जाए। HRA ने मंत्री की जवाबदेही से जुड़े मामले को कानून के अनुसार सक्षम अधिकारियों के पास भेजने की मांग भी की है। फिलहाल ये संगठन की मांगें हैं; समिति या उसके अध्यक्ष के खिलाफ अनियमितताएं साबित नहीं हुई हैं।
स्थानीय लोगों की सहमति पर जोर
संगठन का कहना है कि सियांग नदी के किनारे बसे आदिवासी समुदायों की आजीविका, खेती, संस्कृति और परंपराएं इस नदी से जुड़ी हैं। इसलिए परियोजना का फैसला केवल बिजली उत्पादन के आधार पर नहीं होना चाहिए। HRA के मुताबिक, प्रभावित गांवों में सर्वे करने या अधिकारियों की बैठक आयोजित करने भर से जनभागीदारी की कानूनी जरूरत पूरी नहीं हो जाती।
संगठन ने मांग की है कि परियोजना के बारे में स्थानीय लोगों को स्पष्ट जानकारी दी जाए। उनकी शिकायतें सुनी जाएं और जहां कानून के तहत सहमति जरूरी है, वहां निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाए। परियोजना के विरोध में पहले भी स्थानीय संगठनों ने विस्थापन, पर्यावरण और आजीविका को लेकर चिंता जताई है।
प्रभावित परिवारों को नौकरी और पुनर्वास की मांग
HRA ने परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों के लिए पारदर्शी पुनर्वास नीति बनाने पर जोर दिया है। संगठन ने जलविद्युत परियोजनाओं में ग्रुप बी, सी और डी की नौकरियों में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण की मांग रखी है। इसके अलावा जमीन प्रभावित प्रत्येक परिवार के एक पात्र सदस्य को रोजगार देने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
युवाओं के लिए कौशल विकास और अप्रेंटिसशिप की व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की गई है। संगठन चाहता है कि मुआवजे की राशि, पुनर्वास की योजना और प्रभावित परिवारों को मिलने वाले लाभ सार्वजनिक किए जाएं, ताकि लोगों को अपने अधिकारों की जानकारी मिल सके।
परियोजना की स्वतंत्र पर्यावरणीय समीक्षा हो
HRA ने केंद्र से प्रस्तावित बांध के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों की स्वतंत्र जांच कराने को कहा है। संगठन ने प्राकृतिक आपदाओं से बचाव की तैयारियों, संभावित विस्थापन और नदी के आसपास रहने वाले समुदायों पर पड़ने वाले असर का विस्तृत आकलन मांगा है।
इसके साथ परियोजना के वैकल्पिक मॉडल पर भी विचार करने की अपील की गई है। संगठन चाहता है कि विशेषज्ञों की रिपोर्ट और परियोजना से जुड़े आकलन सार्वजनिक हों। शिकायतों के समाधान के लिए स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था बनाने की मांग भी की गई है।
गांवों और विशेषज्ञों के साथ गोलमेज बैठक का सुझाव
HRA ने राज्य सरकार को प्रभावित गांवों के प्रतिनिधियों, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और स्वतंत्र विशेषज्ञों की संयुक्त बैठक कराने का निर्देश देने की मांग की है। संगठन का कहना है कि ऐसी बातचीत में लोगों को खुलकर सवाल पूछने और अपनी आपत्तियां रखने का अवसर मिलना चाहिए। उसके अनुसार, इससे परियोजना से जुड़े मतभेद समझने और आगे का रास्ता निकालने में मदद मिल सकती है।
सरकार ने परियोजना को क्यों बताया जरूरी?
अरुणाचल प्रदेश सरकार ने सितंबर 2026 में परियोजना के प्रारंभिक व्यवहार्यता सर्वे की निगरानी के लिए उच्चस्तरीय समिति बनाई थी। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित परियोजना से बिजली उत्पादन, जल सुरक्षा, बाढ़ नियंत्रण और स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
समिति के अध्यक्ष ओजिंग तासिंग ने 26 सितंबर की बैठक में कहा था कि शुरुआती सर्वे का उद्देश्य परियोजना की व्यवहार्यता जांचना है। केवल सर्वे होने का अर्थ निर्माण की अंतिम मंजूरी मिलना नहीं है। उन्होंने अधिकारियों से स्थानीय लोगों के साथ लगातार संवाद करने और उनकी शिकायतें दर्ज करने को कहा था।
सियांग बांध को लेकर विरोध क्यों हो रहा है?
सियांग नदी पर प्रस्तावित इस बड़ी जलविद्युत परियोजना को लेकर स्थानीय समुदाय लंबे समय से चिंता जता रहे हैं। उन्हें आशंका है कि बांध बनने से गांवों, खेती की जमीन और पारंपरिक आजीविका पर असर पड़ेगा। दूसरी तरफ सरकार इसे ऊर्जा और जल सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मानती है। चीन की ओर से नदी के ऊपरी हिस्से में प्रस्तावित विशाल बांध के कारण भी सियांग परियोजना का रणनीतिक महत्व बढ़ा है।
HRA ने अपने ज्ञापन के अंत में स्पष्ट किया है कि विकास योजनाओं में प्रभावित लोगों की सार्थक भागीदारी और जरूरी सहमति को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने संगठन की नई मांगों पर क्या कार्रवाई करने का फैसला लिया है, इसकी आधिकारिक जानकारी फिलहाल उपलब्ध नहीं है।










