मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर जारी विरोध के बीच वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्ष को अदालत जाने की सलाह दी है। उधर, महाराष्ट्र में वोटरों के नाम हटने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।
नई दिल्ली: देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्षी दलों को जवाब दिया है। सोमवार, 26 अक्टूबर को उन्होंने कहा कि जिन लोगों को इस प्रक्रिया से शिकायत है, वे अदालत जाकर अपनी बात रख सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष को शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से बाहर होने के मामले में केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।
SIR को लेकर विपक्ष से क्या बोलीं निर्मला सीतारमण?
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विरोध कर रहे राजनीतिक दलों से न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेने को कहा है। तिरुचिरापल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान उनसे विपक्ष के लगातार विरोध-प्रदर्शनों और चुनाव आयोग के खिलाफ उठ रही मांगों को लेकर सवाल पूछा गया था।
जवाब में सीतारमण ने कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आई शिकायतों पर अदालतों ने ध्यान दिया है। सुप्रीम कोर्ट भी इससे जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को SIR की प्रक्रिया पर आपत्ति है, वे अदालत में अपना पक्ष रख सकते हैं और कानूनी तरीके से राहत मांग सकते हैं। कई लोग पहले से ऐसा कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्षी दल राजनीतिक स्तर पर अपना विरोध जारी रखने के लिए भी स्वतंत्र हैं।
महाराष्ट्र में 2.07 करोड़ वोटरों के नाम का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा
वित्त मंत्री का बयान ऐसे समय आया है, जब महाराष्ट्र में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दाखिल हुई है। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के आंकड़ों के मुताबिक, SIR शुरू होने से पहले राज्य में कुल 9,78,54,049 पंजीकृत मतदाता थे। पुनरीक्षण के बाद जारी मसौदा सूची में 7,71,65,562 नाम शामिल किए गए, जबकि 2,06,88,487 नाम इसमें शामिल नहीं हो सके।
यह संख्या राज्य के पहले से पंजीकृत मतदाताओं की करीब 21.14 फीसदी है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जो सत्यापन के दौरान अपने पते पर नहीं मिले, दूसरी जगह चले गए, जिनकी मृत्यु हो गई या जिनकी प्रविष्टियां दोहराई गई थीं। हालांकि, यह मसौदा मतदाता सूची का आंकड़ा है। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी 2.07 करोड़ लोगों के नाम अंतिम रूप से हटा दिए गए हैं।
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मुंबई और पुणे में मकान बदलने वालों को लेकर उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका चार्टर्ड अकाउंटेंट और पत्रकार अरुण आनंदगिरि ने दाखिल की है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने अदालत में दलीलें पेश कीं। दातार ने कहा कि मुंबई और पुणे में बड़ी संख्या में इमारतों का पुनर्विकास हो रहा है। पुराने मकानों को तोड़कर नई इमारतें बनाने के कारण कई परिवार कुछ समय के लिए दूसरी जगह रहने चले गए हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि ऐसे मतदाताओं को पुराने पते पर नहीं मिलने के कारण सूची से बाहर कर दिया गया। याचिका में करीब 1.22 करोड़ अन्य प्रविष्टियों को तार्किक विसंगतियों के आधार पर हटाए जाने का भी दावा किया गया है। हालांकि, इस अतिरिक्त संख्या और संबंधित आरोपों की न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस
सोमवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल रहीं। अदालत ने केंद्र सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर 2026 को होगी।
याचिका में मांग की गई है कि मामले पर अंतिम फैसला आने तक महाराष्ट्र में SIR की प्रक्रिया रोकी जाए। इसके अलावा पुनरीक्षण से पहले मतदाता सूची में मौजूद लोगों के नाम हटाने पर रोक लगाने की मांग भी की गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल SIR पर रोक लगाने या दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने का अंतरिम आदेश नहीं दिया है। अदालत ने चुनाव आयोग का पक्ष सुनने के बाद आगे विचार करने की बात कही है।









