प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की पीठ ने अपने आदेश में ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे की प्रकृति पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इस तरह के नारे की तुलना ‘जय श्रीराम’, ‘हर हर महादेव’, ‘सत श्री अकाल’ या ‘अल्लाहु-अकबर’ जैसे धार्मिक उद्घोषों से नहीं की जा सकती। कोर्ट के मुताबिक इन धार्मिक नारों का उद्देश्य संबंधित भगवान या गुरु के प्रति सम्मान और आस्था व्यक्त करना है, जबकि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कानून के शासन और भारत की संप्रभुता व अखंडता को चुनौती देने वाला है।
हाईकोर्ट ने तौकीर रजा की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस नारे का इस्तेमाल लोगों को हिंसा और कानून के खिलाफ उकसाने वाला माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की भाषा को धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति बताकर दूसरे धार्मिक नारों के बराबर नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने तौकीर रजा को इस चरण में जमानत देने से इनकार कर दिया। मामले में उनके करीबी बताए गए डॉ. नफीस खान की जमानत याचिका भी खारिज किए जाने की जानकारी सामने आई है।
यह मामला सितंबर 2025 में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है। हिंसा से पहले ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर को लेकर विवाद और प्रदर्शन की स्थिति बनी थी। पुलिस और प्रशासन के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की कोशिश के दौरान स्थिति बिगड़ गई थी। पुलिस का आरोप है कि भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर पथराव किया, पेट्रोल बम फेंके और गोलीबारी भी की। घटना में पुलिसकर्मियों के घायल होने तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने की बात अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने रखी।
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि 19 सितंबर 2025 को एक बैठक के दौरान लोगों से इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान में एकत्र होने और कथित अत्याचारों व मुकदमों के विरोध में प्रदर्शन करने की अपील की गई थी। इसके बाद प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 163 के तहत सार्वजनिक स्थान पर पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगा दी थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, प्रतिबंध के बावजूद करीब 200 से 250 लोग मैदान की ओर बढ़े।
पुलिस और सरकार की ओर से आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश के दौरान स्थिति हिंसक हो गई। भीड़ की ओर से कथित तौर पर पथराव और पेट्रोल बम फेंके गए तथा पुलिस पर गोली चलाने की बात भी अदालत में रखी गई। इस दौरान कई पुलिसकर्मियों के घायल होने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने का आरोप है। इसी घटनाक्रम के आधार पर तौकीर रजा को मामले में मुख्य आरोपी और कथित साजिशकर्ता के तौर पर नामजद किया गया।
तौकीर रजा की ओर से अदालत में इन आरोपों को खारिज किया गया। उनके वकील ने दलील दी कि उन्हें राजनीतिक दुर्भावना के तहत मामले में फंसाया गया है। बचाव पक्ष का कहना था कि तौकीर रजा ने हिंसा का आह्वान नहीं किया था और घटना के समय वह मौके पर मौजूद भी नहीं थे। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि 26 सितंबर को सुबह करीब 10 बजे उन्हें नजरबंद कर दिया गया था, इसलिए हिंसा के दौरान उनकी प्रत्यक्ष मौजूदगी नहीं थी।
बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह भी तर्क रखा कि प्रशासन की ओर से अनुमति नहीं मिलने और धारा 163 लागू किए जाने के बाद प्रदर्शन के लिए लोगों को एकत्र होने का आह्वान वापस ले लिया गया था। वकील का कहना था कि तौकीर रजा ने न तो कोई ऐसा भाषण दिया और न ही ऐसी अपील की, जिसे हिंसा, अव्यवस्था या सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए उकसाने वाला माना जा सके। हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट के आदेश में ‘सर तन से जुदा’ नारे को लेकर की गई टिप्पणी इस मामले का सबसे अहम हिस्सा रही। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘जय श्रीराम’, ‘हर हर महादेव’, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु-अकबर’ जैसे नारों का स्वरूप अलग है। कोर्ट के अनुसार, ये नारे धार्मिक आस्था और संबंधित भगवान या गुरु के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति का सिर काटने की बात वाला नारा हिंसा और दंडात्मक कार्रवाई की धमकी का अर्थ रखता है।
अदालत ने यह भी कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कानून के अधिकार के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती के रूप में देखा जा सकता है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने इसे लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने वाला बताया और कहा कि ऐसा आचरण कानून के तहत दंडनीय है।
हाईकोर्ट ने केवल घटना के दौरान की गतिविधियों पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि घटना के बाद तौकीर रजा के कथित व्यवहार का भी उल्लेख किया। अदालत ने रिकॉर्ड में मौजूद उस पहलू पर गौर किया जिसमें आरोप है कि घटना के बाद उन्होंने अपनी अपील पर लोगों की प्रतिक्रिया के लिए उन्हें धन्यवाद दिया और उनके कार्यों की सराहना की। अदालत ने इस व्यवहार को भी स्वीकार्य नहीं माना।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह भी आया कि बड़ी संख्या में लोगों को एकत्र होने के लिए स्थानीय प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। बचाव पक्ष ने बाद में आह्वान वापस लेने की बात कही, लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि इसके बावजूद लोग इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान की ओर बढ़े। पुलिस के रोकने पर कथित तौर पर हिंसा हुई और कानून-व्यवस्था बिगड़ी।
बरेली हिंसा मामले में तौकीर रजा की भूमिका को लेकर पुलिस और बचाव पक्ष के दावे अलग-अलग हैं। पुलिस ने उन्हें मामले का मुख्य सूत्रधार बताया है, जबकि तौकीर रजा की ओर से लगातार यह कहा गया है कि उन्हें राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया। जमानत पर सुनवाई के दौरान अदालत ने इन्हीं आरोपों और केस डायरी में उपलब्ध सामग्री को देखते हुए यह तय किया कि इस स्तर पर आरोपी को जमानत देना उचित नहीं है।
तौकीर रजा इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल से जुड़े हैं और सितंबर 2025 की बरेली हिंसा के बाद से यह मामला लगातार चर्चा में रहा है। अलग-अलग रिपोर्टों में उनकी हिरासत की तारीख को लेकर अंतर दिखाई देता है, लेकिन ताजा हाईकोर्ट रिपोर्टों में यह स्पष्ट है कि वह बरेली हिंसा से जुड़े मामले में जेल में हैं और अदालत ने उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने धार्मिक नारों और हिंसा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले नारे के बीच अंतर को स्पष्ट करने की कोशिश की है। अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि धार्मिक आस्था व्यक्त करने वाले उद्घोष और किसी व्यक्ति या समूह के खिलाफ हिंसा की धमकी देने वाली भाषा को समान श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी अंतर को अदालत ने जमानत याचिका पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।
बरेली हिंसा का यह मामला उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और धार्मिक विवादों से जुड़े मामलों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह संकेत दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कानून-व्यवस्था और हिंसा के लिए उकसाने वाली गतिविधियों को संरक्षण नहीं देता। अदालत के सामने मामला जमानत का था, इसलिए इस स्तर पर कोर्ट का आदेश अंतिम दोषसिद्धि नहीं है। आरोपों की अंतिम पुष्टि ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगी।
फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले से तौकीर रजा को जमानत नहीं मिल सकी है। अदालत ने ‘सर तन से जुदा’ नारे को धार्मिक उद्घोष के रूप में स्वीकार करने से इनकार करते हुए इसे कानून के शासन और देश की संप्रभुता व अखंडता के संदर्भ में गंभीर माना। वहीं, बचाव पक्ष के पास आगे उपलब्ध कानूनी विकल्प खुले रहेंगे। बरेली हिंसा मामले में अब आगे की न्यायिक प्रक्रिया यह तय करेगी कि अभियोजन की ओर से लगाए गए आरोप और प्रस्तुत किए गए साक्ष्य अदालत के सामने किस तरह साबित होते हैं।










