वेदांता समूह के चेयरमैन और अरबपति उद्योगपति अनिल अग्रवाल ने पहली बार अपने उस सफर के बारे में बताया, जिसमें पटना के एक स्क्रैप डीलर से लेकर दुनिया के अरबपतियों की फोर्ब्स सूची में जगह बनाने तक का सफर शामिल है।
नई दिल्ली: वेदांता ग्रुप के चेयरमैन और अरबपति कारोबारी अनिल अग्रवाल ने अपने संघर्ष, कारोबार के विस्तार और लंदन में पहचान बनाने की कहानी साझा की है। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि छोटे स्तर से शुरू हुआ उनका सफर किस तरह वैश्विक कारोबार तक पहुंचा। उन्होंने यह भी बताया कि बड़े कारोबारी माहौल में अपनी पहचान बनाने के लिए प्रस्तुति, सही समय पर फैसला और जोखिम उठाने की क्षमता कितनी जरूरी होती है।
अनिल अग्रवाल ने बातचीत के दौरान भारत के प्राकृतिक संसाधनों, युवाओं के रोजगार और अपने कारोबारी अनुभवों पर भी खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक क्षमता बढ़ाने में प्राकृतिक संसाधनों और मानव संसाधन की अहम भूमिका हो सकती है।
लंदन में नहीं मिलती थी पहचान, फिर बदली रणनीति
अनिल अग्रवाल ने अपने लंदन के अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि शुरुआत में उन्हें वहां के कारोबारी और सामाजिक सर्किल में सहज स्वीकार्यता नहीं मिली। मुंबई में एक फैक्ट्री खरीदने के बाद वह लंदन चले गए और करीब डेढ़ दशक वहां रहे। उनके मुताबिक, बड़े लोगों के बीच खुद को स्थापित करना उनके लिए आसान नहीं था और कई बार उन्हें हीन भावना भी महसूस होती थी।
उन्होंने बताया कि इस स्थिति से निकलने के लिए उन्होंने अपने लिए एक अलग पहचान गढ़ने का तरीका अपनाया। मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने कार्ड पर ‘महाराजा अनिल कुमार’ लिखवाया। उनका मानना था कि वहां ‘महाराजा’ शब्द अपने आप में एक खास प्रभाव पैदा करता है। अग्रवाल के मुताबिक, शुरुआत में उनकी पत्नी को भी यह विचार अजीब लगा, लेकिन उन्होंने इस रणनीति को गंभीरता से आगे बढ़ाया। इस दौरान उन्होंने भारतीय कंपनी को लंदन में सूचीबद्ध कराने की दिशा में काम किया और कारोबार को बड़े पैमाने पर विस्तार दिया।
'कहानी बनाइए, लेकिन झूठ मत बोलिए'
अनिल अग्रवाल ने कारोबार में ब्रांड और पहचान की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि लोगों तक अपनी कहानी पहुंचाना बेहद जरूरी है। उनके मुताबिक, एक कारोबारी सिर्फ उत्पाद या कंपनी नहीं बनाता, बल्कि उसके साथ एक पहचान और कहानी भी तैयार होती है। उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि आगे बढ़ने के लिए अपनी कहानी गढ़ना जरूरी है, लेकिन उसमें झूठ नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति या कंपनी की यात्रा को प्रभावशाली तरीके से पेश करना सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

BALCO डील से मिली कारोबार को नई दिशा
अनिल अग्रवाल ने 2001 में BALCO के अधिग्रहण का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में उनकी कंपनी स्टरलाइट ने भारत एल्युमिनियम कंपनी को करीब 550 करोड़ रुपये में खरीदा था। उन्होंने बताया कि उस समय कंपनी के पास बैंक में बहुत सीमित रकम थी, लेकिन उन्होंने भरोसे के साथ वित्तीय संस्थानों से संपर्क किया।
उनकी रणनीति के बाद कई बैंकों की ओर से अपेक्षा से कहीं बड़े कर्ज प्रस्ताव मिले। उन्होंने इस सौदे को अपने कारोबारी जीवन के अहम पड़ावों में से एक बताया। अग्रवाल ने यह भी कहा कि तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें सरकार के सामने अपनी योजना रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
सेमीकंडक्टर कारोबार से पीछे हटने की वजह
सेमीकंडक्टर क्षेत्र को लेकर उन्होंने कहा कि वे अब अपने कोर बिजनेस पर ज्यादा ध्यान देना चाहते हैं। वेदांता का मुख्य काम तेल, गैस और धातु जैसे क्षेत्रों से जुड़ा है। उनके मुताबिक, कंपनी की विशेषज्ञता जिन क्षेत्रों में लंबे समय से है, उसी में संसाधन और ऊर्जा लगाना ज्यादा व्यावहारिक है। उन्होंने संकेत दिया कि सेमीकंडक्टर जैसी नई तकनीकी परियोजनाओं में रुचि जरूर रही, लेकिन आगे की रणनीति में मुख्य फोकस कंपनी के पारंपरिक और मजबूत कारोबारी क्षेत्रों पर रहेगा।
बिहार के लिए निवेश और स्टेडियम की योजना
बिहार से अपने संबंधों का जिक्र करते हुए अनिल अग्रवाल ने राज्य में फैक्ट्री लगाने के संभावित प्रस्तावों पर विचार करने की बात कही। उन्होंने बिहार में एक स्टेडियम बनाने की इच्छा भी जताई और राज्य के खिलाड़ियों के लिए बेहतर अवसरों की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिहार जैसे राज्यों से प्रतिभाएं लगातार सामने आ रही हैं और खेल के क्षेत्र में उन्हें बेहतर मंच दिया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने बिहार के लिए आईपीएल टीम होने की इच्छा भी व्यक्त की।










