कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने सोमवार को SIR और मताधिकार को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट से संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हस्तक्षेप की उम्मीद जताई।
P Chidambaram on SIR: चुनावी मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि शीर्ष अदालत संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए इस मामले में हस्तक्षेप करेगी। चिदंबरम ने अपने बयान में मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्जल भुइयां और पूर्व जज जस्टिस रोहिंटन एफ. नरिमन की हालिया टिप्पणियों का भी उल्लेख किया।
चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर क्या कहा?
राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने लोगों से राजकोट में जस्टिस रोहिंटन नरिमन और हैदराबाद में जस्टिस उज्जल भुइयां की ओर से की गई हालिया टिप्पणियों को पढ़ने की अपील की। चिदंबरम ने अपने 22 मार्च 2026 को प्रकाशित लेख ‘Millions of Citizen Non-voters’ का भी संदर्भ दिया। इस लेख में उन्होंने मतदाता सूची के पुनरीक्षण और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकार से बाहर होने की संभावनाओं को लेकर चिंता जताई थी।
उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद है कि वह संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी भूमिका निभाएगा। अपने पोस्ट में चिदंबरम ने राजनीतिक विरोधियों पर भी टिप्पणी की और उन्हें इस मुद्दे पर चुप रहने की सलाह दी।
SIR को लेकर क्या है विवाद?

Special Intensive Revision (SIR) चुनावी मतदाता सूचियों की व्यापक समीक्षा की प्रक्रिया है। इसके तहत मतदाता सूची में दर्ज नामों और मतदाताओं की पात्रता से संबंधित विवरणों की जांच की जाती है। इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद सामने आए हैं। विपक्षी दलों की ओर से आशंका जताई जा रही है कि समीक्षा के दौरान बड़ी संख्या में पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। दूसरी ओर, चुनावी सूची को अधिक सटीक और अद्यतन करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया जाता रहा है।
इसी विवाद से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का कार्यक्रम भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चिदंबरम की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग से संबंधित याचिकाओं पर शीर्ष अदालत में सुनवाई होनी है।
जस्टिस उज्जल भुइयां ने क्या कहा?
4 अक्टूबर को एक कार्यक्रम में जस्टिस उज्जल भुइयां ने मतदान के अधिकार और नागरिकता से जुड़े मुद्दे पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि यदि किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो जाते हैं और उन्हें प्रभावी रूप से मतदान के अधिकार से बाहर कर दिया जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।
उन्होंने इस तरह की स्थिति को मनमाना करार देते हुए कहा था कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवालों को दूसरे मुद्दों की ओर ध्यान भटकाकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके मुताबिक, मताधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल तत्वों में शामिल है।
जस्टिस नरिमन ने भी जताई चिंता
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रोहिंटन एफ. नरिमन ने भी 4 अक्टूबर को राजकोट में एक कार्यक्रम के दौरान मतदाता सूची और मतदान के अधिकार को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची से कथित तौर पर बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के संदर्भ में कहा कि मतदान का अधिकार लोकतंत्र के केंद्र में है। उन्होंने चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए।











