वाराणसी: असि नदी की टैपिंग और उसके स्वरूप को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने सवाल उठाया कि गंगा की सहायक नदी असि को आखिर किस आधार पर नाला घोषित कर दिया गया। इस मामले में NGT ने नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) के महानिदेशक को 13 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है। ट्रिब्यूनल के इस रुख के बाद असि नदी से जुड़े पुराने रिकॉर्ड, टैपिंग की प्रक्रिया और नदी की वास्तविक स्थिति को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।
असि नदी वाराणसी के लिए केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि शहर के इतिहास और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ी हुई मानी जाती है। असि घाट से लेकर गंगा में इसके संगम तक नदी का उल्लेख लंबे समय से वाराणसी के भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ में होता रहा है। ऐसे में इसे नाले के रूप में वर्गीकृत किए जाने पर NGT की आपत्ति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने यह जानना चाहा कि जिस जलधारा को गंगा की सहायक नदी माना जाता है, उसे नाले के रूप में घोषित करने का आधार क्या था। इसके साथ ही नदी की टैपिंग को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। NGT यह समझना चाहता है कि असि नदी की प्राकृतिक धारा, जलप्रवाह और पर्यावरणीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए संबंधित विभागों ने क्या निर्णय लिए।
असि नदी को लेकर लंबे समय से प्रदूषण और अतिक्रमण जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। शहर के विस्तार और बढ़ती आबादी के साथ नदी के प्राकृतिक स्वरूप पर दबाव बढ़ा है। कई स्थानों पर जलधारा संकरी हुई और गंदे पानी के प्रवाह को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। नदी को साफ करने और प्रदूषण रोकने के लिए अलग-अलग स्तर पर योजनाएं बनाई जाती रही हैं।
अब NGT की सुनवाई में नदी की पहचान और उसके साथ किए गए व्यवहार पर सवाल उठने के बाद मामला और गंभीर हो गया है। यदि किसी प्राकृतिक जलधारा को आधिकारिक रूप से नाला घोषित किया गया है तो उसके पीछे मौजूद दस्तावेज, सर्वे और प्रशासनिक निर्णयों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
ट्रिब्यूनल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए NMCG के महानिदेशक को तलब किया है। 13 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में संबंधित अधिकारी को मामले से जुड़े रिकॉर्ड और अब तक उठाए गए कदमों की जानकारी देनी होगी। इसके बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि असि नदी की टैपिंग और वर्गीकरण को लेकर प्रशासनिक स्तर पर क्या निर्णय लिए गए थे।
असि नदी की टैपिंग का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी की प्राकृतिक धारा में किसी भी तरह का हस्तक्षेप उसके पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़ा होता है। जलधारा को किसी संरचना के माध्यम से मोड़ना, ढकना या टैप करना नदी के प्रवाह, जैव विविधता और आसपास के पर्यावरण को प्रभावित कर सकता है।
पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि नदियों और प्राकृतिक जलधाराओं को केवल जलनिकासी के साधन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी नदी का प्राकृतिक प्रवाह और उसका जलग्रहण क्षेत्र पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ऐसे में असि नदी को नाला घोषित करने के आधार को लेकर NGT का सवाल पर्यावरणीय दृष्टि से भी अहम है।
वाराणसी में गंगा की सफाई को लेकर लंबे समय से कई योजनाएं चल रही हैं। गंगा में मिलने वाली सहायक नदियों और जलधाराओं को प्रदूषण मुक्त करना भी नदी संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि सहायक जलधारा में सीवेज या गंदा पानी पहुंचता है तो उसका असर अंततः गंगा के पानी पर भी पड़ सकता है।
असि नदी के मामले में भी प्रदूषण का मुद्दा लंबे समय से उठता रहा है। नदी में गिरने वाले नालों और सीवेज के कारण जलधारा की स्थिति प्रभावित हुई है। इसके समाधान के लिए सीवेज प्रबंधन और जलधारा के संरक्षण को साथ लेकर चलना जरूरी माना जाता है।
NGT की ओर से अधिकारियों से जवाब मांगे जाने के बाद अब प्रशासनिक रिकॉर्ड पर भी ध्यान केंद्रित होगा। यह देखा जाएगा कि असि नदी को नाला घोषित करने का फैसला कब लिया गया, किस विभाग ने लिया और इसके पीछे क्या तकनीकी या प्रशासनिक आधार था।
इसके अलावा टैपिंग से जुड़े कार्यों की भी जानकारी सामने आ सकती है। किन स्थानों पर टैपिंग की गई, इसका उद्देश्य क्या था, इससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर क्या प्रभाव पड़ा और इसके बाद जलधारा की स्थिति में क्या बदलाव आया—इन सभी सवालों पर जवाब की जरूरत होगी।
13 अक्टूबर की सुनवाई इस मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। NMCG महानिदेशक की मौजूदगी में ट्रिब्यूनल के सामने संबंधित दस्तावेज और स्थिति रिपोर्ट रखे जाने की संभावना है। इसके आधार पर NGT आगे के निर्देश जारी कर सकता है।
असि नदी से जुड़ा मामला केवल स्थानीय प्रशासन का विषय नहीं है। गंगा की सहायक नदी होने के कारण इसका सीधा संबंध गंगा संरक्षण से भी जुड़ता है। गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए उसकी सहायक नदियों और जलधाराओं की स्थिति सुधारना भी जरूरी है।
वाराणसी में असि नदी का नाम असि घाट के कारण भी देश-दुनिया में जाना जाता है। असि घाट गंगा किनारे स्थित प्रमुख घाटों में शामिल है और यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु तथा पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे में नदी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए इसके संरक्षण का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो जाता है।
स्थानीय स्तर पर नदी के प्राकृतिक स्वरूप को बचाने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है। पर्यावरण से जुड़े लोगों का तर्क रहा है कि किसी भी प्राकृतिक जलधारा को केवल नाला मानकर उसके साथ व्यवहार करने के बजाय उसके मूल स्वरूप और जलप्रवाह को समझना जरूरी है।
असि नदी की मौजूदा स्थिति कई वर्षों में हुए शहरी विकास का परिणाम भी है। शहर बढ़ने के साथ जलधारा के आसपास निर्माण, सीवेज और कचरे का दबाव बढ़ा। इसके कारण नदी का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हुआ। अब NGT की सुनवाई के बाद नदी संरक्षण के पुराने फैसलों की समीक्षा की दिशा में भी रास्ता खुल सकता है।
यदि जांच में यह सामने आता है कि नदी को नाला घोषित करने की प्रक्रिया में नियमों या पर्यावरणीय पहलुओं की अनदेखी हुई थी, तो आगे ट्रिब्यूनल की ओर से संबंधित विभागों को सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। हालांकि अंतिम स्थिति सुनवाई और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
इस मामले में NMCG की भूमिका भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संस्था का उद्देश्य गंगा और उसके बेसिन की स्वच्छता तथा संरक्षण से जुड़ा है। NGT ने महानिदेशक को व्यक्तिगत रूप से तलब करके यह संकेत दिया है कि ट्रिब्यूनल मामले को गंभीरता से देख रहा है।
अब 13 अक्टूबर की सुनवाई पर सभी की नजर रहेगी। इस दौरान असि नदी की स्थिति, उसे नाला घोषित किए जाने का आधार, टैपिंग से जुड़े काम और नदी संरक्षण के लिए उठाए गए कदमों पर विस्तृत जानकारी सामने आ सकती है।
असि नदी को लेकर NGT का सवाल भविष्य में वाराणसी की जलधाराओं के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि नदी की पहचान और प्राकृतिक स्वरूप को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश सामने आते हैं तो इससे नदी संरक्षण से जुड़ी योजनाओं को नई दिशा मिल सकती है।
फिलहाल NGT ने साफ तौर पर यह सवाल उठाया है कि गंगा की सहायक नदी को नाला कैसे घोषित किया गया। मामले में NMCG के महानिदेशक को 13 अक्टूबर को तलब किया गया है। अब सुनवाई के दौरान संबंधित दस्तावेज और सरकारी पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि असि नदी की टैपिंग और उसके वर्गीकरण के पीछे वास्तविक प्रक्रिया क्या रही और आगे नदी के संरक्षण को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं।







