बांग्लादेश चुनाव में BNP की जीत के बाद तारिक रहमान की सत्ता में वापसी हुई है। नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी। जमात बहुमत से दूर रहने के कारण भारत के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक अवसर उभरे हैं।
Dhaka: बांग्लादेश में हाल के संसदीय चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई है। इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। इस बदलाव ने दक्षिण एशिया की राजनीति में नई दिशा दी है। भारत इसे चुनौती से अधिक अवसर के रूप में देख रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को बधाई दी और द्विपक्षीय सहयोग पर जोर दिया।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह चुनाव न केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के रणनीतिक हितों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देता है। जमात-ए-इस्लामी के बहुमत से दूर रहने, बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक चुनौतियों और भारत की पूर्व संपर्क पहलों के कारण नई सरकार भारत के साथ संतुलित और सहयोगी संबंध बनाए रखने की संभावना रखती है।
1. जमात-ए-इस्लामी को बहुमत न मिलना
बीएनपी की पुरानी सरकारों में भारत के अनुभव हमेशा सुखद नहीं रहे हैं, लेकिन किसी भी स्थिति में तारिक रहमान की पार्टी जमात-ए-इस्लामी से बेहतर साबित होगी। जमात-ए-इस्लामी लंबे समय से पाकिस्तान समर्थक और कट्टरपंथी विचारधारा के करीब मानी जाती रही है। यदि इसे स्पष्ट बहुमत मिलता, तो भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं पर अस्थिरता, कट्टरपंथी नेटवर्क की सक्रियता और सीमा पार घुसपैठ जैसी चिंताएं बढ़ सकती थीं।

हालांकि इस चुनाव में जमात ने नरम रवैया अपनाया है, फिर भी इसका इतिहास भारत विरोधी रैलियों और भावनाओं को भड़काने का रहा है। बहुमत से दूर रहना यह दर्शाता है कि बांग्लादेश की सत्ता पूरी तरह वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर नहीं गई। इससे भारत को सुरक्षा मोर्चे पर तत्काल दबाव का सामना नहीं करना पड़ेगा।
2. बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियां
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था वर्तमान में दबाव में है। विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट, निर्यात क्षेत्र पर दबाव और मुद्रास्फीति जैसी समस्याएं सरकार के सामने प्राथमिक चुनौतियां हैं। नई बीएनपी सरकार की पहली प्राथमिकता अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और विकास की गति को बनाए रखना होगी।
भारत और बांग्लादेश के बीच पिछले वर्षों में द्विपक्षीय कारोबारी संबंध मजबूत रहे हैं। ऊर्जा सहयोग, बिजली निर्यात, पेट्रोलियम पाइपलाइन, रेल और सड़क संपर्क, बंदरगाह उपयोग जैसी परियोजनाएं दोनों देशों को जोड़ती हैं। भारतीय कंपनियों का बांग्लादेश में कुल निवेश लगभग पांच अरब डॉलर के करीब है।
बीएनपी सरकार को इन परियोजनाओं को जारी रखना आर्थिक रूप से लाभकारी रहेगा। इसके अलावा बीएनपी के घोषणा पत्र में भारत के प्रति कोई टकरावपूर्ण रुख नहीं दिखा। इसका मतलब है कि नई सरकार आर्थिक यथार्थ को समझते हुए भारत के साथ सहयोग की दिशा में काम करने को प्राथमिकता दे सकती है।
3. भारत की पूर्व संपर्क

नई दिल्ली ने पिछले कुछ महीनों में स्पष्ट संकेत दिए थे कि वह बीएनपी नेतृत्व के साथ संवाद के लिए तैयार है। कूटनीतिक चैनल और बैकचैनल वार्ता के माध्यम से यह सुनिश्चित किया गया कि सत्ता परिवर्तन के बावजूद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण न हों।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खालिदा जिया की मृत्यु के बाद ढाका का दौरा किया और भारत की संवेदनाओं को साझा किया। भारतीय संसद ने भी उनकी मृत्यु पर शोक जताया। इन पहलुओं ने नई सरकार के लिए भारत विरोधी रुख अपनाना कठिन बना दिया। पहले से स्थापित संवाद के माध्यम से दोनों देशों के बीच सहयोग और भरोसे का आधार मौजूद है।
4. क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूप से जुड़े हैं। पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी में बांग्लादेश की भूमिका महत्वपूर्ण है। रेल मार्ग, अंतर्देशीय जलमार्ग, सड़क गलियारे और सीमा हाट जैसी व्यवस्थाएं दोनों देशों की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डालती हैं।
बीएनपी के लिए इन परियोजनाओं को रोकना या धीमा करना आर्थिक नुकसान का कारण बनेगा। इसके उलट, इन्हें आगे बढ़ाना उसे घरेलू स्तर पर विकासोन्मुख छवि प्रदान करेगा। शेख हसीना ने पूर्वोत्तर भारत की अर्थव्यवस्था को बांग्लादेश से जोड़ने की पहल की थी। यह प्रक्रिया नई बीएनपी सरकार के लिए भी लाभकारी होगी, क्योंकि व्यावहारिक राजनीति संबंधों को स्थिर रखने में मदद करेगी।
5. बदलती वैश्विक परिदृश्य और रणनीतिक संतुलन

आज दुनिया भू-राजनीतिक पुनर्संतुलन के दौर से गुजर रही है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, चीन की आर्थिक सक्रियता और पाकिस्तान के साथ उसके समीकरण स्पष्ट हैं। ऐसे में बांग्लादेश के लिए किसी एक धुरी पर पूरी तरह झुकना जोखिम भरा हो सकता है।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में स्थिर और विश्वसनीय साझेदार की आवश्यकता बढ़ती है। भारत, जो क्षेत्रीय स्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, बांग्लादेश के लिए एक स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार बना रहेगा। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री सहयोग और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में द्विपक्षीय रणनीतिक संबंध मजबूत करना ढाका के लिए भी लाभकारी साबित होगा।
भारत-बांग्लादेश संबंधों में नया युग
चुनाव परिणाम भारत के लिए पूर्ण संतोष का कारण नहीं हैं, लेकिन गंभीर चिंता का संकेत भी नहीं देते। जमात बहुमत से दूर है, बीएनपी का रुख व्यावहारिक दिख रहा है और आर्थिक मजबूरियां सहयोग की दिशा में प्रेरित कर सकती हैं।
हालांकि, आवामी लीग की अनुपस्थिति में जमात एक मजबूत विपक्षी शक्ति के रूप में उभर सकती है और भविष्य में भारत विरोधी भावनाओं को बढ़ावा दे सकती है। इस स्थिति में भारत को बहु-स्तरीय कूटनीति अपनानी होगी। रणनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए और ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के अनुसार, भारत और बांग्लादेश के संबंधों में एक नया युग प्रारंभ होगा।











