पश्चिम बंगाल में आगामी नगर निकाय चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस से जुड़े तीन राजनीतिक गुटों के बीच खींचतान तेज हो गई है। कोलकाता और हावड़ा समेत प्रमुख शहरी निकायों के चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। उम्मीदवारों के चयन, चुनावी रणनीति और दूसरे दलों के साथ गठबंधन करने के मुद्दे पर अलग-अलग गुटों के नेताओं के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। एक तरफ ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की तैयारी में है, तो दूसरी ओर डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस और तृणमूल से अलग हुए सांसदों से जुड़ा नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया भी अपनी रणनीति बनाने में जुटा है। इन परिस्थितियों ने निकाय चुनाव से पहले राज्य की राजनीति को और दिलचस्प बना दिया है।
पश्चिम बंगाल में मई 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की, जबकि तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा। इसके बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठन को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए। अलग-अलग नेताओं के नेतृत्व में राजनीतिक गुट सक्रिय हुए और उन्होंने अपनी अलग पहचान के साथ आगे बढ़ने की तैयारी शुरू की। अब निकाय चुनाव इन गुटों के लिए स्थानीय स्तर पर अपना प्रभाव साबित करने का महत्वपूर्ण अवसर बन गए हैं।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट अपने समर्थकों को एकजुट रखने और स्थानीय निकायों में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। कोलकाता लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस की राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है। ऐसे में कोलकाता नगर निगम का चुनाव पार्टी के लिए खास महत्व रखता है। उम्मीदवारों के चयन में स्थानीय नेताओं की भूमिका, वार्ड स्तर पर संगठन की स्थिति और मतदाताओं के बीच पकड़ जैसे मुद्दे चुनावी रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं। पार्टी के सामने यह चुनौती भी है कि आंतरिक मतभेदों के कारण उसके समर्थकों में बिखराव न हो।
दूसरी ओर, डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी निकाय चुनाव में गठबंधन करने को लेकर एक राय नहीं बन पाई है। पार्टी के अध्यक्ष अरूप रॉय ने संकेत दिया है कि उनका गुट निकाय चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ने की तैयारी कर रहा है और किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ गठबंधन नहीं करेगा। हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं की राय इससे अलग बताई जा रही है। कमरहाटी के विधायक मदन मित्रा ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना का समर्थन किया है। उनका मानना है कि भाजपा के खिलाफ विपक्षी ताकतों के एकजुट होकर चुनाव लड़ने से बेहतर परिणाम हासिल करने की संभावना बन सकती है।
गठबंधन को लेकर इस मतभेद का असर चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है। अगर तृणमूल से जुड़े अलग-अलग गुट अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं, तो कुछ वार्डों में एक जैसे मतदाता आधार वाले उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हो सकता है। इससे वोटों के बंटवारे की स्थिति पैदा होने की आशंका है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव स्थानीय उम्मीदवारों की लोकप्रियता, संगठन की ताकत और क्षेत्रीय मुद्दों पर निर्भर करेगा। फिलहाल अलग-अलग गुटों के बीच किसी व्यापक चुनावी समझौते की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
तृणमूल से अलग हुए सांसदों से जुड़ी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया की भूमिका भी निकाय चुनाव में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस गुट के नेताओं ने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ राजनीतिक निकटता दिखाई है, लेकिन पश्चिम बंगाल के स्थानीय चुनावों में भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर स्थिति अलग बनी हुई है। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने स्थानीय निकाय चुनाव अपने संगठन और उम्मीदवारों के आधार पर लड़ने की बात कही है। इससे एनसीपीआई के साथ चुनावी तालमेल की संभावनाओं पर सवाल खड़े हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक सहयोग होने के बावजूद स्थानीय चुनावों में गठबंधन अपने आप तय नहीं हो जाता।
कोलकाता और हावड़ा नगर निगम के चुनावों को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन शहरों में स्थानीय प्रशासन और नागरिक सुविधाओं से जुड़े कई मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। सड़क, पेयजल, जल निकासी, कचरा प्रबंधन, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर मतदाताओं की अपेक्षाएं रहती हैं। उम्मीदवारों को वार्ड स्तर पर लोगों से संपर्क बढ़ाने और स्थानीय समस्याओं को अपने अभियान में शामिल करने की जरूरत होगी। ऐसे में केवल राज्य स्तर की राजनीतिक बयानबाजी ही नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दे भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
निकाय चुनाव से पहले वार्डों की संख्या में प्रस्तावित बदलाव भी उम्मीदवारों के चयन और चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। कोलकाता नगर निगम में वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करने और हावड़ा नगर निगम में 50 से बढ़ाकर 68 करने संबंधी विधेयक 2026 में विधानसभा से पारित किए गए थे। नए वार्डों की संरचना और मतदाता क्षेत्रों में बदलाव के कारण राजनीतिक दलों को अपने संगठनात्मक नेटवर्क और उम्मीदवारों की स्थिति का नए सिरे से आकलन करना पड़ सकता है। स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं को टिकट देना सभी दलों के लिए अहम निर्णय होगा।
भाजपा भी विधानसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद नगर निकायों में अपनी स्थिति मजबूत करने की तैयारी कर रही है। पार्टी स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय करने, उम्मीदवारों के चयन और वार्ड स्तर पर संगठन को मजबूत बनाने पर ध्यान दे रही है। वहीं, तृणमूल से जुड़े तीनों गुटों के बीच जारी मतभेद चुनावी रणनीति को और जटिल बना सकते हैं। हालांकि, चुनाव में किस दल या गुट को कितना लाभ होगा, इसका आकलन अभी करना जल्दबाजी होगी।
फिलहाल पश्चिम बंगाल में निकाय चुनाव से पहले गठबंधन, उम्मीदवारों के चयन और संगठनात्मक ताकत को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। तृणमूल से जुड़े गुटों के बीच मतभेद दूर होते हैं या वे अलग-अलग चुनावी मैदान में उतरते हैं, इस पर सबकी नजर है। आने वाले दिनों में चुनावी कार्यक्रम और उम्मीदवारों की घोषणा के साथ तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकती है। इन चुनावों से न केवल स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय होगा, बल्कि यह भी सामने आएगा कि विधानसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक माहौल में विभिन्न दल और गुट शहरी क्षेत्रों में अपनी स्थिति किस तरह मजबूत कर पाते हैं।








