बिहार में शारदीय नवरात्र के दौरान दुर्गा पूजा पंडालों में इस बार लोक संस्कृति की एक पुरानी परंपरा लोगों का ध्यान खींच रही है। जहां आम तौर पर पूजा पंडालों में फिल्मी और आधुनिक गीतों की धुन सुनाई देती है, वहीं मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में बच्चे पारंपरिक झिझिया गीतों पर नृत्य करते नजर आ रहे हैं। सिर पर छेद वाला मिट्टी का घड़ा, उसके भीतर जलता दीपक और पारंपरिक गीतों की लय पर थिरकते कदम इस प्रस्तुति को खास बना रहे हैं। बच्चों की इस भागीदारी से मिथिला की लोकपरंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश भी दिखाई दे रही है।
झिझिया केवल नृत्य या मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि मिथिलांचल की लोक आस्था और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है। इस परंपरा में देवी भगवती और ब्रह्म बाबा से परिवार, बच्चों और समाज की रक्षा की प्रार्थना की जाती है। लोकमान्यताओं के अनुसार, यह नृत्य बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाव की कामना के साथ किया जाता रहा है। इन मान्यताओं को सांस्कृतिक विश्वास के रूप में देखा जाना चाहिए; इनके पीछे बताए जाने वाले अलौकिक प्रभावों का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
नवरात्र के दिनों में जब देवी दुर्गा की आराधना के लिए पंडाल सजाए जाते हैं, तब झिझिया की प्रस्तुति माहौल में पारंपरिक रंग भर देती है। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बच्चे जब समूह में लोकगीतों पर कदम मिलाते हैं, तो दर्शकों का ध्यान सहज ही उनकी ओर खिंच जाता है। पारंपरिक गीतों में स्थानीय भाषा, देवी के प्रति श्रद्धा और गांव-समाज की सामूहिक भावना की झलक मिलती है। ऐसे आयोजन बच्चों को अपनी क्षेत्रीय संस्कृति से परिचित कराने का अवसर भी देते हैं।
झिझिया नृत्य की सबसे खास पहचान सिर पर रखा जाने वाला मिट्टी का घड़ा है। इस घड़े में कई छेद किए जाते हैं और उसके भीतर दीपक जलाया जाता है। नृत्य करने वाला व्यक्ति घड़े को सिर पर संतुलित रखते हुए ताल और लय के साथ कदम बढ़ाता है। घड़े से निकलती रोशनी और छेदों से बनती आकृतियां इस प्रस्तुति को अलग रूप देती हैं। पारंपरिक रूप से महिलाएं इस नृत्य को करती रही हैं, लेकिन अब कई जगहों पर बच्चों और नई पीढ़ी की भागीदारी भी इसे लोकप्रिय बना रही है
इस नृत्य से जुड़ी एक रोचक लोकमान्यता घड़े में बने छेदों को लेकर है। कहा जाता है कि घड़े में इतने छेद होते हैं कि उन्हें गिनना आसान नहीं होता। लोकविश्वास के अनुसार, यदि कोई तांत्रिक इन छेदों को गिन ले, तो घड़ा फूट सकता है। यह झिझिया से जुड़ी पारंपरिक कथा का हिस्सा है, न कि प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य। ऐसी कहानियां बताती हैं कि लोककलाएं केवल संगीत और नृत्य तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके साथ पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं और कथाएं भी जुड़ी होती हैं।
झिझिया के गीतों में ब्रह्म बाबा और देवी भगवती का स्मरण प्रमुखता से मिलता है। “तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा झिझिया बनैली हो...” जैसे पारंपरिक बोलों के माध्यम से श्रद्धालु अपने आराध्य से परिवार और बच्चों की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। ढोलक, हारमोनियम और सामूहिक गायन के साथ होने वाली प्रस्तुति में स्थानीय बोली की मिठास भी सुनाई देती है। यही वजह है कि यह नृत्य मिथिला की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। आज के समय में बच्चों का फिल्मी गीतों के बजाय पारंपरिक झिझिया पर नृत्य करना सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम पहल है। नई पीढ़ी को लोकनृत्य सिखाने से बच्चों को अपनी भाषा, परंपरा और स्थानीय इतिहास को जानने का अवसर मिलता है। यदि पूजा समितियां ऐसे कार्यक्रमों को नियमित रूप से प्रोत्साहित करें और लोक कलाकारों को मंच दें, तो पारंपरिक कलाओं को नई पहचान मिल सकती है।
झिझिया की खासियत यह भी है कि इसमें व्यक्तिगत प्रदर्शन के साथ सामूहिक भागीदारी का महत्व रहता है। एक समूह के रूप में गीत गाना, ताल मिलाना और घड़े को संतुलित रखते हुए नृत्य करना अभ्यास और आपसी तालमेल की मांग करता है। इसके जरिए बच्चे अनुशासन, सहयोग और मंच पर प्रस्तुति देने का अनुभव भी हासिल कर सकते हैं। हालांकि, सिर पर जलता दीपक रखकर नृत्य करते समय सुरक्षा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। बच्चों की प्रस्तुति में प्रशिक्षित वयस्कों की निगरानी और आग से बचाव के इंतजाम होने चाहिए।
बिहार की लोकसंस्कृति में झिझिया के अलावा जट-जटिन, सामा-चकेवा, बिदेसिया और झूमर जैसी कई परंपराएं भी शामिल हैं। ये लोककलाएं अलग-अलग क्षेत्रों के सामाजिक जीवन, मान्यताओं और भावनाओं को व्यक्त करती हैं। झिझिया की लोकप्रियता यह याद दिलाती है कि आधुनिक संगीत के दौर में भी पारंपरिक गीतों और नृत्यों के लिए जगह बनी हुई है। मुजफ्फरपुर और आसपास के पूजा पंडालों में बच्चों की प्रस्तुतियां इसी सांस्कृतिक निरंतरता की एक झलक पेश कर रही हैं।










