BPSC TRE-4 के लिए डिग्री चाहिए तो BRABU में दोबारा छप रहा मूल प्रमाणपत्र, तीन लाख डिग्रियां आने के बाद भी 2400 से अधिक रीप्रिंट

मुजफ्फरपुर के BRABU में तीन लाख से अधिक डिग्रियां छपने के बाद भी 2400 से ज्यादा प्रमाणपत्र रीप्रिंट कराए गए। जानिए विश्वविद्यालय ने इसकी क्या वजह बताई।
BPSC TRE-4 के लिए डिग्री चाहिए तो BRABU में दोबारा छप रहा मूल प्रमाणपत्र, तीन लाख डिग्रियां आने के बाद भी 2400 से अधिक रीप्रिंट
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मुजफ्फरपुर। बिहार में शिक्षक भर्ती की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए स्नातक की डिग्री एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। खासकर बीपीएससी शिक्षक भर्ती TRE-4 के लिए आवेदन करने वाले छात्र-छात्राएं अपने मूल प्रमाणपत्र को लेकर विश्वविद्यालयों के चक्कर लगा रहे हैं। इसी बीच मुजफ्फरपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (बीआरएबीयू) के परीक्षा विभाग में डिग्री छपाई और वितरण की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। विश्वविद्यालय में पिछले वर्षों के स्नातक उत्तीर्ण विद्यार्थियों की करीब तीन लाख से अधिक डिग्रियां पहले ही छपकर आ चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद जरूरत पड़ने पर विद्यार्थियों की डिग्रियां दोबारा प्रिंट कराई जा रही हैं। बताया जा रहा है कि हाल के दिनों में 2400 से अधिक डिग्रियों को रीप्रिंट कराया गया है।

इस पूरी प्रक्रिया ने विश्वविद्यालय के प्रमाणपत्र प्रबंधन और वितरण व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की डिग्रियां छपकर परीक्षा विभाग में रखी हुई हैं, तो उन्हीं प्रमाणपत्रों को रिकॉर्ड से खोजकर विद्यार्थियों तक पहुंचाने के बजाय दोबारा छपवाने की जरूरत क्यों पड़ रही है। विश्वविद्यालय की ओर से इसका कारण डिग्रियों को अलग-अलग लॉट में खोजने में लगने वाला समय और परेशानी बताया गया है। वहीं, इस प्रक्रिया से छपाई एजेंसी को एक ही डिग्री के लिए दो बार भुगतान होने की आशंका भी चर्चा में है। हालांकि, एजेंसी को लाभ पहुंचाने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय ने स्नातक के कई सत्रों की डिग्रियां एक साथ छपवाई थीं। इनमें सत्र 2018-21, 2019-22, 2020-23 और 2021-24 के तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों के उत्तीर्ण छात्र-छात्राएं शामिल हैं। इन सत्रों की डिग्रियां बड़ी संख्या में छपकर परीक्षा विभाग पहुंची थीं। उम्मीद थी कि विद्यार्थियों के आवेदन मिलने पर संबंधित सत्र और रिकॉर्ड के आधार पर मूल प्रमाणपत्र खोजकर जारी कर दिए जाएंगे। इससे समय और संसाधन दोनों की बचत हो सकती थी। लेकिन अब जरूरतमंद विद्यार्थियों को समय पर प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने के लिए दोबारा छपाई का विकल्प अपनाया जा रहा है।

बीपीएससी TRE-4 के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के सामने मूल डिग्री प्राप्त करना महत्वपूर्ण हो गया है। प्रतियोगी परीक्षाओं में आवेदन, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान शैक्षणिक योग्यता से जुड़े प्रमाणपत्र मांगे जा सकते हैं। ऐसे में डिग्री समय पर नहीं मिलने से अभ्यर्थियों को परेशानी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है। इसी दबाव के बीच विश्वविद्यालय में बड़ी संख्या में विद्यार्थी मूल प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर रहे हैं। कुछ विद्यार्थियों की डिग्रियां पहले ही छप चुकी हैं, लेकिन रिकॉर्ड से उन्हें खोजकर जारी करने में समय लग रहा है। ऐसे मामलों में दोबारा छपाई कर प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक डॉ. अरविंद कुमार ने बताया कि करीब तीन लाख विद्यार्थियों की डिग्रियां छपकर परीक्षा विभाग में आ चुकी हैं। अलग-अलग लॉट में रखी डिग्रियों को खोजकर संबंधित विद्यार्थियों तक पहुंचाने में काफी समय और मेहनत लगती है। जिन छात्र-छात्राओं को तत्काल मूल प्रमाणपत्र की जरूरत है, उन्हें समय पर डिग्री देने के उद्देश्य से रीप्रिंट कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रमाणपत्र जारी करने से पहले टीआर यानी टैबुलेशन रजिस्टर समेत संबंधित रिकॉर्ड से मिलान किया जाता है और इसके बाद आवश्यक रिकॉर्ड तैयार किया जाता है।

परीक्षा नियंत्रक के अनुसार, जब डिग्री वितरण का दबाव कम हो जाएगा, तब पहले से छपकर आई डिग्रियों की छंटाई की जाएगी और उन्हें संबंधित कॉलेजों में भेजा जाएगा। रिकॉर्ड से मिलान के दौरान यदि यह पता चलता है कि किसी विद्यार्थी की डिग्री पहले ही जारी हो चुकी है, तो दोबारा जारी करने की प्रक्रिया रोक दी जाएगी। विश्वविद्यालय की ओर से बताई गई इस व्यवस्था का उद्देश्य तत्काल जरूरत वाले विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र उपलब्ध कराना है, लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि डिग्रियों की छपाई, भंडारण और वितरण का रिकॉर्ड व्यवस्थित रहे, ताकि एक ही प्रमाणपत्र पर अनावश्यक खर्च की स्थिति न बने।

इस मामले में सबसे अहम पहलू यह है कि पहले से छपी डिग्रियों का सही तरीके से रखरखाव और सूचीबद्ध करना कितना जरूरी है। यदि हर डिग्री को सत्र, कॉलेज, विद्यार्थी के नाम, पंजीकरण संख्या और रोल नंबर के आधार पर व्यवस्थित डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ा जाए, तो जरूरत पड़ने पर प्रमाणपत्र की पहचान करना आसान हो सकता है। इससे न केवल विद्यार्थियों को जल्दी डिग्री मिल सकेगी, बल्कि दोबारा छपाई की जरूरत भी कम की जा सकती है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक पोर्टल पर डिग्री के लिए ऑनलाइन आवेदन और प्रमाणपत्र की स्थिति देखने की सुविधा उपलब्ध है। 

डिग्री रीप्रिंट की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का संबंध केवल छपाई खर्च से नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय की प्रशासनिक कार्यशैली से भी है। विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र देने के लिए आवेदन लेने, पुराने रिकॉर्ड खोजने, दस्तावेजों का मिलान करने और डिग्री जारी करने की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। यदि पहले से छपी डिग्री उपलब्ध है, तो उसे खोजने और जारी करने की प्रक्रिया पारदर्शी बनाना जरूरी है। दूसरी ओर, जिन विद्यार्थियों को भर्ती या किसी अन्य जरूरी काम के लिए तत्काल प्रमाणपत्र चाहिए, उनकी जरूरत को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में विश्वविद्यालय के सामने समय पर डिग्री जारी करने और अनावश्यक दोबारा छपाई से बचने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।

बीआरएबीयू में डिग्री को लेकर सामने आई यह स्थिति उन विद्यार्थियों के लिए खास महत्व रखती है, जो शिक्षक भर्ती और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। आवेदन या दस्तावेज सत्यापन के समय किसी प्रमाणपत्र की अनुपलब्धता उनके लिए परेशानी का कारण बन सकती है। इसलिए अभ्यर्थियों को चाहिए कि वे विश्वविद्यालय के आधिकारिक पोर्टल पर डिग्री आवेदन की प्रक्रिया और स्टेटस की जानकारी लेते रहें तथा अपने शैक्षणिक दस्तावेजों में किसी तरह की त्रुटि होने पर समय रहते सुधार के लिए आवेदन करें।

फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि तत्काल जरूरत वाले विद्यार्थियों को डिग्री उपलब्ध कराने के लिए रीप्रिंट कराया जा रहा है और रिकॉर्ड से मिलान के बाद ही प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। वहीं, तीन लाख से अधिक डिग्रियां पहले से छपकर आने के बावजूद 2400 से अधिक डिग्रियों के दोबारा प्रिंट होने का मामला व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत को सामने लाता है। यदि विश्वविद्यालय पुराने प्रमाणपत्रों की व्यवस्थित छंटाई, डिजिटल सूची और समयबद्ध वितरण सुनिश्चित करता है, तो विद्यार्थियों की परेशानी कम होने के साथ-साथ छपाई प्रक्रिया में पारदर्शिता भी बढ़ सकती है।

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