पश्चिम बंगाल में विधानसभा उपचुनाव से पहले चुनाव चिन्ह को लेकर उठा विवाद अब कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुंच गया है। इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) से जुड़े 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को दिए जाने के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने सुनवाई के दौरान आयोग से यह जानने की कोशिश की कि जब उसके पास बड़ी संख्या में अन्य मुक्त चुनाव चिन्ह उपलब्ध थे, तब पहले से एक राजनीतिक दल द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे 'लिफाफा' चिन्ह को दूसरे दल को देने का आधार क्या था। मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद 28 सितंबर को न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
यह पूरा विवाद पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से जुड़ा है। इन सीटों पर 6 अक्टूबर 2026 को मतदान होना है। विवाद उस समय सामने आया जब चुनाव आयोग ने डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी के अलग हुए गुट को 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिया। ISF का कहना है कि वह पहले से इस चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल करता रहा है और उपचुनाव में भी उसके उम्मीदवार मैदान में हैं। ऐसे में उसी चुनाव क्षेत्र में किसी दूसरे राजनीतिक दल को वही चिन्ह दिए जाने से मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
ISF की ओर से विधायक नौशाद सिद्दीकी ने चुनाव आयोग के इस फैसले को कलकत्ता हाई कोर्ट में चुनौती दी। याचिका में चुनाव आयोग द्वारा 'लिफाफा' चिन्ह को दूसरे दल को दिए जाने पर सवाल उठाया गया। ISF की ओर से अदालत में तर्क रखा गया कि पार्टी लंबे समय से इस चिन्ह का इस्तेमाल कर रही है और आगामी उपचुनाव में भी इसी चिन्ह के लिए उसने आवेदन किया था। ऐसे में मतदान से ठीक पहले इसे किसी दूसरे दल को आवंटित करने से पार्टी की चुनावी पहचान प्रभावित हो सकती है।
मामले की सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल किए। अदालत ने पूछा कि यदि दो पक्ष किसी एक चुनाव चिन्ह के लिए आवेदन कर रहे हों तो आयोग किस आधार पर यह तय करता है कि चिन्ह किसे दिया जाएगा। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में 'लिफाफा' चिन्ह चुनने के पीछे रिकॉर्ड पर क्या कारण मौजूद हैं। न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा कि उसके निर्णय के पीछे वास्तविक आधार क्या था।
सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी उस समय और कड़ी हो गई जब न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने सवाल उठाया कि यदि चुनाव आयोग किसी निजी पक्ष के निर्देश या प्रभाव के आधार पर काम करेगा तो उसकी स्वतंत्र भूमिका का क्या अर्थ रह जाएगा। अदालत ने यह टिप्पणी चुनाव आयोग और दूसरे पक्ष के बीच कथित मिलीभगत जैसी स्थिति दिखाई देने के संदर्भ में की, लेकिन यह अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं है। अदालत ने मूल रूप से आयोग की निर्णय प्रक्रिया और उसके आधार को स्पष्ट करने पर जोर दिया।
कोर्ट ने चुनाव आयोग के वकील से यह भी पूछा कि जब बड़ी संख्या में मुक्त चुनाव चिन्ह उपलब्ध थे तो 'लिफाफा' ही क्यों चुना गया। सुनवाई के दौरान बताया गया कि आयोग के पास करीब 183 मुक्त चुनाव चिन्ह उपलब्ध थे। ऐसे में अदालत यह समझना चाहती थी कि जिस चिन्ह का इस्तेमाल ISF पहले कर चुका था और जिसके लिए उसी उपचुनाव में उसके उम्मीदवार मैदान में थे, उसी चिन्ह को दूसरे दल को देने की जरूरत क्यों पड़ी।
अदालत ने चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता के महत्व पर भी जोर दिया। न्यायमूर्ति कृष्ण राव की टिप्पणियों का मूल संदेश यह था कि चुनाव से संबंधित संवैधानिक संस्था के फैसलों में स्पष्टता होनी चाहिए और ऐसे फैसले नहीं होने चाहिए जिनके कारण राजनीतिक दलों को चुनाव के बीच अदालत का रुख करना पड़े। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि चुनाव शुरू होने के बाद इस तरह के विवाद सामने आने से न्यायिक प्रक्रिया पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
इससे पहले 24 सितंबर की सुनवाई में भी कलकत्ता हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा था कि 'लिफाफा' चिन्ह को डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को आवंटित करने का कारण क्या है। अदालत ने आयोग को अपने निर्णय के आधार की जानकारी देने के लिए कहा था। इसके बाद मामले में आगे सुनवाई हुई और आयोग की ओर से चुनाव चिन्हों के आवंटन से जुड़े नियमों और अपनी प्रक्रिया के बारे में दलीलें रखी गईं।
चुनाव आयोग की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि किसी मुक्त चुनाव चिन्ह पर किसी राजनीतिक दल का स्थायी स्वामित्व नहीं होता। आयोग ने यह भी कहा कि किसी दल को एक ही मुक्त चुनाव चिन्ह लगातार एक निश्चित सीमा से अधिक इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं माना जा सकता। यानी आयोग की दलील का आधार यह था कि 'लिफाफा' चिन्ह किसी पार्टी की स्थायी संपत्ति नहीं है और नियमों के तहत उसका आवंटन किया जा सकता है। दूसरी ओर, ISF की ओर से इस बात पर जोर दिया गया कि इस चुनाव में उसके उम्मीदवार भी उसी चिन्ह के साथ मैदान में हैं और पिछले चुनावों में पार्टी की पहचान उस चिन्ह से जुड़ी रही है।
विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि चुनाव चिन्ह भारतीय चुनाव व्यवस्था में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की पहचान का प्रमुख माध्यम होता है। खासकर ऐसे मतदाताओं के लिए, जो उम्मीदवार के नाम के बजाय चुनाव चिन्ह के आधार पर पार्टी या प्रत्याशी को पहचानते हैं, चिन्ह में बदलाव या एक ही क्षेत्र में मिलते-जुलते संदर्भ वाला चिन्ह भ्रम पैदा कर सकता है। इसी वजह से ISF ने अदालत में यह मुद्दा उठाया कि चुनाव चिन्ह के आवंटन में आयोग को पहले से मौजूद चुनावी संदर्भ और संबंधित क्षेत्र में उम्मीदवारों की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।
इस मामले में डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। यह दल तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए राजनीतिक गुट से जुड़ा है और आगामी उपचुनाव में उसे 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी को चुनाव चिन्ह के लिए कई विकल्प दिए गए थे, जिनमें लिफाफा, पेंसिल बॉक्स और टॉर्च जैसे विकल्प शामिल थे। आयोग की ओर से अंततः लिफाफा चिन्ह आवंटित किया गया। इसी आवंटन पर ISF ने आपत्ति जताई और हाई कोर्ट का रुख किया।
ISF का कहना है कि 'लिफाफा' उसके लिए केवल एक सामान्य चुनाव चिन्ह नहीं है, बल्कि पिछले चुनावों से जुड़ी राजनीतिक पहचान का हिस्सा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार पार्टी ने 2021, 2024 और 2026 के चुनावों में इस चिन्ह का इस्तेमाल किया था। हालांकि चुनाव आयोग का पक्ष यह है कि किसी मुक्त चिन्ह पर किसी दल का स्थायी अधिकार नहीं होता। इसी अंतर के कारण मामला कानूनी विवाद में बदल गया है और अब हाई कोर्ट को यह देखना है कि आयोग ने उपलब्ध नियमों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला किस आधार पर लिया।
अदालत की सुनवाई के दौरान यह सवाल भी सामने आया कि चुनाव आयोग ने ISF के आवेदन पर विचार किस तरह किया। 28 सितंबर की सुनवाई में न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने इस बात पर सवाल उठाया कि 17 सितंबर को ISF की ओर से 'लिफाफा' चिन्ह के लिए आवेदन किए जाने के बावजूद आयोग ने उसी चिन्ह को दूसरे दल को क्यों आवंटित किया। अदालत इस निर्णय की प्रक्रिया और रिकॉर्ड पर मौजूद कारणों को समझना चाहती थी।
मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। इसका मतलब है कि फिलहाल हाई कोर्ट ने यह अंतिम निर्णय नहीं दिया है कि 'लिफाफा' चुनाव चिन्ह किसे मिलना चाहिए। अब अदालत के अंतिम आदेश का इंतजार है। चुनाव आयोग के चिन्ह आवंटन को लेकर अदालत क्या निर्देश देती है, इसका असर आगामी उपचुनाव की चुनावी प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
नंदीग्राम उपचुनाव पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले से ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है और ऐसे समय में चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद सामने आने से मामला और संवेदनशील हो गया है। हालांकि इस विवाद का अंतिम कानूनी परिणाम अभी सामने नहीं आया है। हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आयोग का मौजूदा आवंटन बरकरार रहता है या उसमें किसी तरह का बदलाव करने का निर्देश दिया जाता है।
फिलहाल अदालत की सुनवाई से इतना स्पष्ट है कि चुनाव चिन्हों के आवंटन की प्रक्रिया को लेकर हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब मांगा है और यह जानने पर जोर दिया है कि उसके फैसले के पीछे क्या ठोस आधार था। अदालत ने आयोग की संवैधानिक भूमिका और निष्पक्षता को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने की आवश्यकता पर भी टिप्पणी की है। अब सभी पक्षों की निगाहें हाई कोर्ट के सुरक्षित रखे गए फैसले पर टिकी हैं।











