El Niño एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है, जिसमें प्रशांत महासागर के सतही पानी के तापमान में असामान्य वृद्धि होती है। इसका असर वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है और यह कई क्षेत्रों में बारिश, तापमान और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।
नई दिल्ली: वैश्विक मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव के संकेत के बीच El Niño (अल नीनो) एक बार फिर चर्चा में है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जलवायु घटना इस वर्ष 1950 के बाद से सबसे मजबूत रूपों में से एक हो सकती है, जिसका असर दुनिया भर के मौसम चक्र पर पड़ सकता है। भारत जैसे मानसून-निर्भर देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि इसके प्रभाव से वर्षा की मात्रा कम होने और कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होने की आशंका जताई जाती है।
क्या है El Niño और कैसे बनता है यह मौसम पैटर्न?
El Niño एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने से उत्पन्न होती है। यह मुख्य रूप से दक्षिण अमेरिकी तट के पास स्थित “Niño 3.4” क्षेत्र में तापमान वृद्धि से पहचाना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जब इस क्षेत्र का तापमान लगातार पांच महीनों तक सामान्य से लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहता है, तो इसे El Niño के सक्रिय होने का संकेत माना जाता है।
इस वर्ष शुरुआती डेटा में इस क्षेत्र में तापमान तेजी से बढ़ने के संकेत मिले हैं, जिसके बाद विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने देशों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
मौसम चक्र पर कैसे डालता है असर?
El Niño समुद्र और वायुमंडल की सामान्य धाराओं को प्रभावित करता है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न बदल जाता है। इसका प्रभाव कई क्षेत्रों में देखा जाता है, जैसे—
- दक्षिण एशिया में कम वर्षा
- दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश
- ऑस्ट्रेलिया में सूखा
- वैश्विक तापमान में वृद्धि
विशेषज्ञों के अनुसार, इस वर्ष प्रशांत महासागर की सतह के नीचे का पानी भी सामान्य से लगभग 6 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म दर्ज किया गया है, जो इसे और अधिक प्रभावी बना सकता है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर? IMD का अनुमान
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भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। विभाग ने अनुमान लगाया है कि पूरे मानसून सीजन में वर्षा का दीर्घकालिक औसत (Long Period Average - LPA) लगभग 90 प्रतिशत रह सकता है, जिसमें लगभग 4 प्रतिशत की संभावित त्रुटि सीमा शामिल है।
एलपीए का अर्थ किसी क्षेत्र में 30 से 50 वर्षों की अवधि के औसत वर्षा से होता है, जिसके आधार पर किसी मौसम की सामान्यता या कमी का आकलन किया जाता है। IMD के अनुसार, यदि मानसून में वर्षा 90 प्रतिशत से कम रहती है, तो इसे “कम वर्षा” श्रेणी में रखा जाता है।
किन राज्यों और जिलों पर अधिक खतरा?
सरकारी आकलन के अनुसार, देश के लगभग 197 जिलों की पहचान ऐसे क्षेत्रों के रूप में की गई है, जो El Niño के प्रभाव से अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इनमें मुख्य रूप से कृषि-निर्भर क्षेत्र शामिल हैं, जहां बारिश की कमी का सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह पैटर्न मजबूत होता है, तो खरीफ फसलों पर दबाव बढ़ सकता है और जल संसाधनों की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, El Niño और La Niña एक-दूसरे के विपरीत जलवायु चरण हैं।
- El Niño: समुद्र का तापमान बढ़ाता है और भारत में सामान्यतः कम वर्षा का कारण बनता है।
- La Niña: समुद्र का तापमान घटाता है और आमतौर पर अधिक बारिश और ठंडे मौसम से जुड़ा होता है।
इन दोनों घटनाओं का वैश्विक जलवायु संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ता है और यह हर 2 से 7 वर्षों में सक्रिय होती हैं। भारत की कृषि अर्थव्यवस्था सीधे मानसून पर निर्भर है। ऐसे में कमजोर मानसून का असर न केवल फसल उत्पादन पर बल्कि खाद्य कीमतों, ग्रामीण आय और जल भंडारण पर भी पड़ सकता है।










