केंद्र सरकार ने भारतीय नौसेना के लिए आठ नए युद्धपोत बनाने की परियोजना को मंजूरी दी है। इस पर 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होंगे। युद्धपोतों का निर्माण कोलकाता और गोवा में होगा। पहला जहाज 2030 तक मिलने की उम्मीद है।
नई दिल्ली: भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी रक्षा परियोजना को हरी झंडी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार, 28 अक्टूबर को हुई सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक में आठ नेक्स्ट जेनरेशन कार्वेट युद्धपोत बनाने को मंजूरी मिली। इस परियोजना की लागत 40,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। नए युद्धपोत समुद्री निगरानी, तटीय सुरक्षा और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने जैसे अभियानों में नौसेना की मदद करेंगे।
कोलकाता और गोवा में बनाए जाएंगे आठ नए युद्धपोत
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, आठों युद्धपोतों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इसके लिए कोलकाता की गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) और गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) को जिम्मेदारी देने की तैयारी है। दोनों सरकारी कंपनियों के साथ अगले कुछ दिनों में अनुबंध पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद अब परियोजना को निर्माण के स्तर पर आगे बढ़ाया जाएगा। अनुबंध पूरा होने पर दोनों शिपयार्ड युद्धपोतों का निर्माण शुरू करेंगे। नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर इनके डिजाइन और तकनीकी क्षमताओं पर काम किया गया है। इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जहाजों का निर्माण विदेशी कंपनियों के बजाय भारतीय शिपयार्डों में होगा। इससे देश में विकसित रक्षा तकनीक और जहाज निर्माण सुविधाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा।
कितने ताकतवर होंगे नए कार्वेट युद्धपोत?
भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल होने वाले नए युद्धपोत आकार में छोटे जरूर होंगे, लेकिन समुद्र में कई तरह के सैन्य अभियान संभाल सकेंगे। इन्हें नेक्स्ट जेनरेशन कार्वेट (NGC) नाम दिया गया है। एक युद्धपोत का वजन करीब 2,000 टन होने का अनुमान है, जबकि इसकी रफ्तार लगभग 30 नॉट तक पहुंच सकती है। तेज रफ्तार की वजह से ये जहाज समुद्र में जरूरत के हिसाब से जल्दी अपनी जगह बदल सकेंगे।
इन युद्धपोतों की एक खास बात यह है कि इनका डिजाइन भारतीय नौसेना ने खुद बनाया है। निर्माण के दौरान आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। नौसेना की कोशिश ऐसे जहाज तैयार करने की है, जो समुद्र में गश्त करने के साथ जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई में भी हिस्सा ले सकें।
समुद्र में निगरानी के साथ दुश्मन से मुकाबला भी करेंगे
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नए कार्वेट युद्धपोतों को कई जिम्मेदारियां सौंपी जा सकेंगी। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इनका इस्तेमाल समुद्री इलाकों की निगरानी, दूसरे युद्धपोतों को सुरक्षा देने और संभावित खतरों से निपटने में किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर ये समुद्र में दुश्मन के जहाजों की तलाश करने और उन पर हमला करने वाले अभियानों में भी शामिल हो सकेंगे।
ये युद्धपोत नौसेना के दूसरे जहाजों के साथ मिलकर भी काम करेंगे। इसे सर्फेस एक्शन ग्रुप कहा जाता है, जिसमें कई युद्धपोत एक साथ किसी अभियान को अंजाम देते हैं। भारत की समुद्री सीमा काफी लंबी है। इसके अलावा हिंद महासागर में कई ऐसे रास्ते हैं, जिनसे बड़ी संख्या में व्यापारिक जहाज गुजरते हैं। इन इलाकों में निगरानी बनाए रखना नौसेना की अहम जिम्मेदारी है। नए कार्वेट मिलने से नौसेना के पास गश्त और सुरक्षा अभियानों के लिए ज्यादा जहाज उपलब्ध होंगे।
नौसेना को कब मिलेगा पहला नया युद्धपोत?
आठ नए कार्वेट बनाने की योजना पर काम आगे बढ़ रहा है। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, जरूरी समझौते पूरे होने के बाद पहला युद्धपोत 2030 तक नौसेना को सौंपने का लक्ष्य है। जहाज बनाने वाले दोनों शिपयार्ड निर्माण में लगने वाला समय कम करने के उपाय भी तलाश रहे हैं। हालांकि, बाकी सात जहाज कब तक नौसेना को मिलेंगे, इसकी पूरी जानकारी अभी नहीं दी गई है। युद्धपोत तैयार करने में केवल उसका ढांचा बनाना ही शामिल नहीं होता।
उसमें हथियार, संचार उपकरण और दूसरी जरूरी प्रणालियां लगाने के बाद कई तरह के परीक्षण भी किए जाते हैं। इन प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद ही जहाज नौसेना को सौंपा जाता है।
देश में बनेंगे युद्धपोत, रक्षा उत्पादन को मिलेगा काम
नए कार्वेट युद्धपोतों का निर्माण भारत में किया जाएगा। इससे घरेलू जहाज निर्माण उद्योग को बड़ा काम मिलने की उम्मीद है। परियोजना का मकसद नौसेना की जरूरतें पूरी करने के साथ देश में रक्षा उपकरणों और युद्धपोतों के निर्माण को बढ़ावा देना भी है। यह योजना सरकार के आत्मनिर्भर भारत अभियान का हिस्सा है। इसे समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग से जुड़ी 'सागर' पहल के अनुरूप भी बताया गया है।
आठ युद्धपोतों के निर्माण को कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है। अब दोनों शिपयार्डों के साथ औपचारिक अनुबंध होना बाकी है। समझौते पूरे होने के बाद ही जहाज बनाने और नौसेना को सौंपने का विस्तृत कार्यक्रम सामने आएगा।










