कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने इस विधेयक की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि इसके प्रावधान नागरिक समाज संगठनों और गैर-सरकारी संस्थाओं (NGOs) के कामकाज पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।
नई दिल्ली: भारत में प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर राजनीतिक बहस तेज होती जा रही है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस विधेयक का खुलकर विरोध करते हुए विपक्षी दलों से इसे संसद में रोकने के लिए एकजुट होने की अपील की है। उनका कहना है कि प्रस्तावित संशोधन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), चैरिटेबल संस्थाओं, शैक्षणिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
केंद्र सरकार मानसून सत्र के दौरान इस विधेयक को संसद में पेश करने और पारित कराने की तैयारी कर रही है। इसी बीच थरूर ने सार्वजनिक रूप से अपनी चिंताएं व्यक्त करते हुए कहा कि यह कानून भारत में सिविल सोसाइटी और सरकार के बीच संबंधों को व्यापक रूप से बदल सकता है।
शशि थरूर ने क्या कहा?
तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन विधेयक को रोकना आवश्यक है। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में लंबे समय से योगदान देने वाली संस्थाओं को कठोर कानूनी प्रक्रियाओं के दायरे में लाना उचित नहीं होगा।
थरूर के अनुसार, कई गैर-लाभकारी संस्थाएं दशकों से समाज के कमजोर वर्गों के लिए कार्य कर रही हैं और उन्हें संदेह की दृष्टि से देखना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।
सिविल सोसाइटी की भूमिका को लेकर चिंता
कांग्रेस सांसद का मानना है कि प्रस्तावित संशोधन से कार्यपालिका की शक्तियों में और अधिक केंद्रीकरण हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार गैर-सरकारी संगठनों, थिंक टैंकों और मानवाधिकार समूहों को विकास प्रक्रिया में भागीदार के बजाय संदेहास्पद संस्थाओं के रूप में प्रस्तुत कर रही है। थरूर ने कहा कि कई संगठन विदेशी अनुदान पर निर्भर रहते हैं क्योंकि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत कार्यों और सामाजिक कल्याण परियोजनाओं को संचालित करते हैं। यदि उनके वित्तीय स्रोतों पर अत्यधिक नियंत्रण लगाया जाता है, तो उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
विदेशी फंडिंग और संस्थाओं पर प्रभाव
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थरूर ने दावा किया कि पिछले कुछ वर्षों में नियामकीय सख्ती के कारण विदेशी फंडिंग में उल्लेखनीय गिरावट आई है। उनका कहना है कि इससे हजारों सामाजिक और सामुदायिक संगठनों के संचालन पर असर पड़ा है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि यदि नए संशोधन के तहत सरकार को अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं, तो कुछ मामलों में संस्थाओं की संपत्तियों पर कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है।
उनके अनुसार, इससे गैर-लाभकारी क्षेत्र में अनिश्चितता पैदा हो सकती है। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
केरल का उदाहरण क्यों दिया?
शशि थरूर ने विशेष रूप से केरल का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में कई धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं ने पिछले सौ वर्षों से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि स्कूल, अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, डायग्नोस्टिक सेंटर और सामाजिक कल्याण संगठनों ने धर्म और जाति से परे समाज के विभिन्न वर्गों की सेवा की है। ऐसे संस्थानों की वित्तीय स्थिरता पर किसी भी प्रकार का प्रभाव व्यापक सामाजिक परिणाम पैदा कर सकता है।
विपक्षी दलों से एकजुट होने की अपील
थरूर ने विपक्षी सांसदों से संसद में एकजुट होकर प्रस्तावित विधेयक पर चर्चा करने और आवश्यकता पड़ने पर इसका विरोध करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह केवल एक कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक समाज की स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है। उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि संसद में इस विधेयक के सभी पहलुओं की गहन समीक्षा की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी नए कानून से वैध सामाजिक संस्थाओं के कार्य प्रभावित न हों।
फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) भारत में विदेशी स्रोतों से प्राप्त धन के नियमन के लिए लागू किया गया कानून है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंडिंग का उपयोग राष्ट्रीय हितों और कानूनी मानकों के अनुरूप हो। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2022 के बीच हजारों संगठनों को विदेशों से बड़ी मात्रा में आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। एफसीआरए पोर्टल के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि जुलाई 2026 तक हजारों संस्थाओं के पंजीकरण सक्रिय हैं, जबकि कई प्रमाणपत्र रद्द या समाप्त भी किए जा चुके हैं।









