बक्सर से फरक्का तक गंगा का हवाई सर्वेक्षण भागलपुर की बाढ़ का स्थायी समाधान खोजेंगे वैज्ञानिक 15 नवंबर से होगी ड्रोन मैपिंग

बिहार में गंगा की गाद और बदलती धारा की पड़ताल के लिए बक्सर से फरक्का तक हवाई सर्वे होगा। 15 नवंबर से ड्रोन मैपिंग कर बाढ़ के समाधान तलाशे जाएंगे।
 बक्सर से फरक्का तक गंगा का हवाई सर्वेक्षण भागलपुर की बाढ़ का स्थायी समाधान खोजेंगे वैज्ञानिक 15 नवंबर से होगी ड्रोन मैपिंग
Photo Credit / Attribution: Google

बिहार में गंगा नदी की बदलती धारा, नदी तल में जमा गाद और हर साल आने वाली बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान खोजने के लिए बड़ा वैज्ञानिक अभियान शुरू किया जा रहा है। गुरुवार 29 अक्टूबर को बक्सर से भागलपुर होते हुए फरक्का तक गंगा नदी का उच्चस्तरीय हवाई सर्वेक्षण किया जाएगा। इस सर्वेक्षण के जरिए नदी की चौड़ाई, जलप्रवाह के फैलाव, धारा में बदलाव और तलहटी में जमा गाद की स्थिति का आकलन किया जाएगा। सर्वे से मिलने वाली तस्वीरें और वीडियो 30 अक्टूबर को पटना में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विशेषज्ञों के सामने प्रस्तुत किए जाएंगे। इसके बाद 15 नवंबर से नदी तल और किनारों की विस्तृत ड्रोन मैपिंग शुरू करने की योजना है। इस पूरी कवायद का उद्देश्य भागलपुर समेत पूर्वी बिहार में बाढ़ की समस्या को वैज्ञानिक तरीके से समझना और लंबे समय के लिए प्रभावी उपाय तैयार करना है।

गंगा के इस सर्वेक्षण में जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान यानी वाल्मी, पटना के तकनीकी विशेषज्ञ शामिल होंगे। विशेषज्ञ विशेष कैमरों और सर्वेक्षण उपकरणों की मदद से नदी के विस्तृत हिस्से की तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड करेंगे। इससे गंगा के मौजूदा स्वरूप, उसकी धारा में आ रहे बदलाव, पानी के फैलाव और उन स्थानों की पहचान करने में मदद मिलेगी जहां नदी का तल उथला हो गया है। इन आंकड़ों के आधार पर यह समझने की कोशिश की जाएगी कि किन क्षेत्रों में गाद जमा होने से जलप्रवाह प्रभावित हो रहा है और कहां बाढ़ का दबाव अधिक बढ़ रहा है भागलपुर जिले में हर साल मानसून के दौरान गंगा का जलस्तर बढ़ने से दियारा क्षेत्रों, खेतों, गांवों और रिहायशी इलाकों पर बाढ़ का खतरा मंडराने लगता है। नदी की धारा में बदलाव और किनारों के आसपास गाद जमा होने से कई स्थानों पर पानी का फैलाव बढ़ने की आशंका रहती है। बाढ़ के कारण किसानों की फसलें प्रभावित होती हैं और कई इलाकों में सड़क संपर्क तथा सामान्य जनजीवन बाधित हो जाता है। ऐसे में प्रशासन और जल संसाधन विभाग अब नदी की स्थिति का तकनीकी अध्ययन कर बाढ़ के कारणों को अधिक स्पष्ट रूप से समझना चाहते हैं।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस वर्ष बाढ़ प्रभावित भागलपुर का दौरा करते हुए समस्या का स्थायी तकनीकी समाधान खोजने का भरोसा दिया था। इसके बाद जल संसाधन विभाग ने गंगा के प्रवाह और गाद जमाव का वैज्ञानिक आकलन करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। हवाई सर्वेक्षण इसी प्रयास का हिस्सा है। अधिकारियों के अनुसार, सर्वे से मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण कर नदी के अलग-अलग हिस्सों की स्थिति समझी जाएगी और आगे की कार्ययोजना तैयार करने में उनका इस्तेमाल किया जाएगा। हालांकि, सर्वेक्षण अपने आप में बाढ़ का समाधान नहीं है, बल्कि प्रभावी उपाय तय करने के लिए जरूरी जानकारी जुटाने का एक चरण है।

इस अभियान का अगला महत्वपूर्ण चरण 15 नवंबर से शुरू होने वाली ड्रोन मैपिंग है। इसके तहत बक्सर से भागलपुर तक गंगा के नदी तल, किनारों, धारा के बीच बने गाद के टापुओं और संवेदनशील तटबंधों की हाई-रेजोल्यूशन त्रिआयामी मैपिंग करने की योजना है। हवाई सर्वेक्षण से जहां नदी के बड़े हिस्से की समग्र तस्वीर मिलेगी, वहीं ड्रोन मैपिंग से कुछ क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और अधिक विस्तार से समझने में मदद मिलेगी। इससे यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि किन स्थानों पर गाद का जमाव अधिक है, कहां नदी की धारा बदल रही है और किन इलाकों में कटाव का खतरा बना हुआ है। सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी को 30 अक्टूबर को पटना में होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में रखा जाएगा। सम्मेलन में देश-विदेश के नदी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और नीति निर्माता जल सुरक्षा, गाद प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और गंगा नदी के बदलते स्वरूप पर चर्चा करेंगे। इसका उद्देश्य नदी से जुड़ी समस्याओं को केवल तात्कालिक राहत या तटबंध निर्माण तक सीमित रखने के बजाय वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर दीर्घकालिक योजना तैयार करना है। गंगा के प्रवाह, तलछट और नदी के किनारों की स्थिति को समझने के बाद ही तय किया जा सकेगा कि किन क्षेत्रों में किस तरह के उपाय उपयोगी हो सकते हैं।

गंगा नदी में गाद का जमाव लंबे समय से बिहार में चर्चा का विषय रहा है। गंगा और उसकी सहायक नदियां अपने साथ बड़ी मात्रा में तलछट लाती हैं। नदी की गति, पानी की मात्रा, किनारों की स्थिति और अलग-अलग स्थानों पर बहाव के बदलाव के कारण यह तलछट कई जगह जमा हो जाती है। कुछ क्षेत्रों में इससे नदी की गहराई और जल निकासी प्रभावित हो सकती है, जबकि दूसरे हिस्सों में नदी का स्वरूप अलग तरीके से बदल सकता है। इसलिए पूरे नदी क्षेत्र के लिए एक जैसा उपाय अपनाने के बजाय प्रत्येक हिस्से की परिस्थितियों का अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययन करना जरूरी है।

गाद निकालने यानी ड्रेजिंग को भी संभावित उपायों में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसका फैसला विस्तृत तकनीकी अध्ययन के बाद ही किया जाना चाहिए। नदी के किसी हिस्से से गाद निकालने से पहले उसकी मात्रा, जमाव का कारण, जलप्रवाह पर प्रभाव और नीचे की ओर पड़ने वाले संभावित असर का आकलन जरूरी होता है। बिना पर्याप्त अध्ययन के बड़े पैमाने पर गाद हटाने से नदी के दूसरे हिस्सों में कटाव, तलछट के दोबारा जमाव या जलीय पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञों के सामने चुनौती केवल यह पता लगाना नहीं है कि गाद कहां जमा है, बल्कि यह समझना भी है कि उसका नदी के पूरे तंत्र पर क्या असर पड़ रहा है।

गंगा नदी का पारिस्थितिक महत्व भी इस अभियान को महत्वपूर्ण बनाता है। भागलपुर क्षेत्र में गंगा डॉल्फिन समेत कई जलीय जीवों का प्राकृतिक आवास है। नदी की गहराई, प्रवाह और तलछट की स्थिति में बड़े बदलाव से जलीय जीवों के आवास प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में बाढ़ नियंत्रण, नदी की जल निकासी और तटबंधों की सुरक्षा के साथ पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखना भी आवश्यक होगा। वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर ही तय किया जा सकेगा कि किन स्थानों पर हस्तक्षेप जरूरी है और किन क्षेत्रों में नदी की प्राकृतिक प्रक्रिया को बनाए रखना अधिक उपयुक्त होगा।

बिहार सरकार की इस पहल से भागलपुर और पूर्वी बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों को उम्मीद है कि समस्या के कारणों को बेहतर तरीके से समझने का अवसर मिलेगा। हवाई सर्वेक्षण, ड्रोन मैपिंग और विशेषज्ञों के सम्मेलन से एकत्रित जानकारी के आधार पर आगे की योजनाओं का खाका तैयार किया जा सकता है। हालांकि, बाढ़ का स्थायी समाधान नदी के प्रवाह, तलछट, तटबंधों, सहायक नदियों और पूरे जलग्रहण क्षेत्र से जुड़े कई पहलुओं पर निर्भर करेगा। इसलिए सर्वेक्षण के बाद तैयार होने वाली योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और उनकी नियमित निगरानी भी उतनी ही जरूरी होगी।

फिलहाल 29 अक्टूबर का हवाई सर्वेक्षण, 30 अक्टूबर का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और 15 नवंबर से प्रस्तावित ड्रोन मैपिंग इस दिशा में अहम कदम हैं। इनसे मिलने वाले वैज्ञानिक आंकड़ों का विश्लेषण यह तय करने में मदद करेगा कि गंगा के किन हिस्सों में गाद प्रबंधन, जल निकासी में सुधार या तटबंधों को मजबूत करने जैसे उपायों की जरूरत है। भागलपुर के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इन अध्ययनों को किस तरह ऐसी व्यावहारिक योजनाओं में बदला जाए, जिनसे बाढ़ का जोखिम कम हो, लोगों की आजीविका सुरक्षित रहे और गंगा नदी का प्राकृतिक संतुलन भी बना रहे।

Leave a comment