चमगादड़ टापू बाजार में कांवड़ों के अलग-अलग मॉडल तैयार किए गए हैं। कुछ कांवड़ बेहद हल्की हैं, जिन्हें सामान्य पैदल यात्रा के लिए तैयार किया गया है, जबकि कुछ कांवड़ विशाल आकार की हैं और इन्हें विशेष रूप से समूहों या डाक कांवड़ के लिए सजाया गया है। कांवड़ की सजावट में जितना अधिक सामान लगाया जाता है, उसकी लागत भी उतनी ही बढ़ जाती है।
व्यापारियों का कहना है कि इस बार उन्होंने पिछले अनुभवों और श्रद्धालुओं की पसंद को देखते हुए बड़ी मात्रा में माल तैयार कराया था। इसके लिए उन्हें पहले से पैसा लगाना पड़ा। कच्चा माल खरीदने से लेकर कारीगरों की मजदूरी, सजावट, दुकान का किराया और परिवहन तक कई तरह के खर्च जुड़े हैं।
यही वजह है कि बिक्री में थोड़ी भी कमी होने पर कारोबारियों का पैसा फंस जाता है। व्यापारी बताते हैं कि कुछ कांवड़ें हजारों रुपये में बिकती हैं, जबकि बड़ी और विशेष डिजाइन वाली कांवड़ों की कीमत इससे काफी ज्यादा हो सकती है। ऐसे में अगर बड़ी संख्या में महंगी कांवड़ें बच जाती हैं तो नुकसान लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपये तक पहुंच सकता है।
बाजार में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए हालांकि यह पूरा इलाका किसी आकर्षण से कम नहीं है। कांवड़ों की सजावट देखने के लिए भी लोग बाजार में रुकते हैं। रंग-बिरंगी लाइटों और धार्मिक प्रतीकों से सजी कांवड़ें लोगों का ध्यान खींचती हैं। कई श्रद्धालु अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से कांवड़ चुनते हैं।
व्यापारियों का कहना है कि कांवड़ यात्रा का कारोबार केवल कांवड़ बेचने तक सीमित नहीं है। इसके साथ रस्सी, सजावटी सामान, भगवा कपड़े, धार्मिक झंडे, डमरू, लाइट और अन्य सामान की भी बिक्री होती है। इससे बड़ी संख्या में छोटे दुकानदारों और कारीगरों को रोजगार मिलता है।
लेकिन मेला समाप्त होते ही इस पूरी आर्थिक गतिविधि पर अचानक विराम लग जाता है। जिन दुकानों में अभी ग्राहकों की भीड़ दिखाई दे रही है, वहां कुछ दिनों बाद सामान समेटने की तैयारी शुरू हो जाएगी। कारोबारियों के सामने बचा हुआ माल हटाने और अगले सीजन तक दुकान बंद रखने की चुनौती होगी।
व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता महंगी कांवड़ों को लेकर है। उनका कहना है कि सामान्य कांवड़ किसी तरह कम कीमत पर निकाल दी जाती है, लेकिन विशेष डिजाइन वाली कांवड़ के लिए ग्राहक मिलना मुश्किल होता है। कई बार इन्हें बनाने में जितना खर्च आता है, उतनी कीमत भी वापस नहीं मिल पाती।
कुछ व्यापारी यह भी कहते हैं कि कांवड़ यात्रा के दौरान अचानक मांग बढ़ने पर अतिरिक्त माल तैयार कराया जाता है। लेकिन अगर किसी दिन बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई तो उसका असर पूरे सीजन के कारोबार पर पड़ सकता है। मेला कुछ ही दिनों का होता है, इसलिए दुकानदारों के पास नुकसान की भरपाई के लिए ज्यादा समय नहीं होता।
हरिद्वार में कांवड़ यात्रा के दौरान प्रशासन की ओर से बड़े स्तर पर यातायात और सुरक्षा व्यवस्था की जाती है। इस बार भी यात्रा को देखते हुए अलग-अलग मार्गों पर डायवर्जन और विशेष व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। इससे बाजारों तक पहुंच और व्यापार पर भी असर पड़ता है, क्योंकि कई मार्गों पर सामान्य वाहनों की आवाजाही सीमित रहती है।
व्यापारियों का कहना है कि वे कांवड़ मेले की व्यवस्थाओं का समर्थन करते हैं, लेकिन उनके कारोबार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि बाजार में श्रद्धालुओं की आवाजाही बेहतर तरीके से बनी रहे और दुकानदारों को पर्याप्त समय मिले तो बिक्री बढ़ सकती है।
चमगादड़ टापू की कांवड़ मार्केट कई वर्षों से कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रही है। ऑनलाइन उपलब्ध बाजार के वीडियो और तस्वीरों में भी यहां बड़ी संख्या में कांवड़ और धार्मिक सामान की दुकानें दिखाई देती हैं।
व्यापारियों के मुताबिक, इस कारोबार से जुड़े कारीगर भी पूरे सीजन का इंतजार करते हैं। कई परिवार ऐसे हैं जिनकी आमदनी का बड़ा हिस्सा कांवड़ सीजन से आता है। कांवड़ की डिजाइन और सजावट तैयार करने में कई दिन लगते हैं। इसलिए मेला खत्म होने के बाद बचा हुआ तैयार माल उनके लिए केवल सामान नहीं, बल्कि उसमें लगा पैसा और मेहनत भी है।
व्यापारी चाहते हैं कि कांवड़ मेले के बाद बची हुई कांवड़ों को किसी अन्य धार्मिक आयोजन, मेले या दूसरे राज्यों के बाजारों में बेचने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था विकसित हो। इससे सीजन खत्म होने के बाद उनके नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
फिलहाल चमगादड़ टापू बाजार में कारोबारियों की नजर आने वाले दिनों की बिक्री पर टिकी हुई है। जैसे-जैसे सावन शिवरात्रि नजदीक आएगी, कांवड़ियों की संख्या और खरीदारी बढ़ने की उम्मीद है। व्यापारियों को उम्मीद है कि अंतिम दिनों में बिक्री तेज होगी और उनका ज्यादा से ज्यादा माल निकल जाएगा।
लेकिन दूसरी तरफ उनके मन में यह डर भी बना हुआ है कि यदि बड़ी मात्रा में कांवड़ बच गईं तो मेला समाप्त होते ही उनकी कीमत लगभग खत्म हो जाएगी। यही वजह है कि व्यापारी कह रहे हैं कि जिस कांवड़ को बनाने में हजारों रुपये खर्च हुए हैं, वही कुछ दिनों बाद कबाड़ के भाव भी नहीं बिकेगी।
कांवड़ मेले की रौनक और धार्मिक आस्था के बीच चमगादड़ टापू के व्यापारियों की यह परेशानी इस सीजन के कारोबार का दूसरा पहलू सामने रखती है। श्रद्धालुओं के लिए कांवड़ भगवान शिव तक आस्था पहुंचाने का माध्यम है, लेकिन इसे बनाने और बेचने वाले कारोबारियों के लिए यही कांवड़ उनके पूरे साल की कमाई से जुड़ी हुई है।