मेला खत्म होने के बाद कबाड़ बन जाएंगी कांवड़, हरिद्वार के चमगादड़ टापू बाजार में व्यापारियों का छलका दर्द

हरिद्वार के चमगादड़ टापू बाजार में कांवड़ व्यापारियों को मेला खत्म होने के बाद माल बचने की चिंता है। बोले- करोड़ों रुपये की कांवड़ कबाड़ हो जाएंगी।
मेला खत्म होने के बाद कबाड़ बन जाएंगी कांवड़, हरिद्वार के चमगादड़ टापू बाजार में व्यापारियों का छलका दर्द
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हरिद्वार: कांवड़ मेले के दौरान हरिद्वार का चमगादड़ टापू बाजार रंग-बिरंगी और आकर्षक कांवड़ों से गुलजार है। दूर-दूर से आए कांवड़ यात्री अपनी पसंद की कांवड़ खरीद रहे हैं। बाजार में छोटी कांवड़ से लेकर विशाल और बेहद सजावटी कांवड़ तक मौजूद हैं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे यहां के व्यापारियों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। व्यापारियों का कहना है कि मेला खत्म होते ही बड़ी संख्या में कांवड़ का कोई खरीदार नहीं रहेगा और करोड़ों रुपये का माल कबाड़ में बदल सकता है।

चमगादड़ टापू हरिद्वार के प्रमुख कांवड़ बाजारों में से एक है, जहां सावन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु कांवड़ खरीदने पहुंचते हैं। यहां अलग-अलग डिजाइन, आकार और कीमत की कांवड़ तैयार की जाती हैं। कांवड़ को आकर्षक बनाने के लिए रंगीन कपड़े, लाइट, झालर, सजावटी सामान और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता है। बाजार में इस समय हर तरफ भगवा रंग और भगवान शिव से जुड़ी सजावट दिखाई दे रही है।

इस साल कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से शुरू हुई है और 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि के साथ इसका समापन होगा। हरिद्वार प्रशासन को इस बार बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। पिछले साल भी करोड़ों कांवड़ यात्री हरिद्वार पहुंचे थे और इस बार करीब 5 करोड़ श्रद्धालुओं के आने का अनुमान बताया गया है।

व्यापारियों के लिए यही भीड़ उम्मीद भी है और चिंता भी। उनका कहना है कि कांवड़ का कारोबार पूरी तरह सीजन पर निर्भर करता है। सालभर कांवड़ तैयार करने के बाद दुकानदारों को कुछ ही दिनों के मेले में अपना अधिकांश माल बेचने की उम्मीद रहती है। यदि बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं होती तो बचा हुआ माल अगले साल तक रखना भी आसान नहीं होता।

व्यापारियों के मुताबिक, कांवड़ कोई सामान्य उत्पाद नहीं है जिसे सालभर आसानी से दूसरे बाजारों में बेचा जा सके। इसका कारोबार मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा के दौरान ही होता है। मेला खत्म होने के बाद इसकी मांग लगभग खत्म हो जाती है। ऐसे में जो कांवड़ इस सीजन में नहीं बिकतीं, उनके सामने उन्हें स्टोर करने या अगले साल तक सुरक्षित रखने की समस्या खड़ी हो जाती है।

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