राजस्थान में IAS शिखर अग्रवाल APO, परिवार के नाम 40 विला-कॉटेज खरीदने पर विवाद, सभी अहम पदों से हटाए गए

राजस्थान सरकार ने IAS शिखर अग्रवाल को APO किया। परिवार के नाम 6.16 करोड़ में 40 विला-कॉटेज खरीदने और सालाना 1.80 करोड़ की लीज के दावों पर विवाद बढ़ा।

राजस्थान सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल को एपीओ कर दिया है। उनके परिवार द्वारा 6.16 करोड़ रुपये में 40 विला-कॉटेज खरीदने का मामला चर्चा में है। संपत्तियों को उसी कंपनी को लीज पर देने पर सवाल उठे हैं।

जयपुर: राजस्थान की राजधानी जयपुर में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिखर अग्रवाल को लेकर बड़ा प्रशासनिक फैसला हुआ है। राजस्थान सरकार ने उन्हें पदस्थापन आदेशों की प्रतीक्षा (APO) में रख दिया है। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब उनके परिवार के नाम करीब 6 करोड़ 16.5 लाख रुपये में 40 विला और कॉटेज खरीदने का मामला सामने आया है। इन संपत्तियों को खरीदने के बाद उसी कंपनी को लीज पर देने की बात भी सामने आई है। हालांकि, सरकार ने एपीओ करने के आदेश में प्रशासनिक कारण बताए हैं, संपत्ति विवाद का उल्लेख नहीं किया है। 

देर रात जारी हुआ आदेश, सभी अहम जिम्मेदारियां हटीं

राजस्थान के कार्मिक विभाग ने बुधवार, 28 अक्टूबर की देर रात शिखर अग्रवाल को एपीओ करने का आदेश जारी किया। अग्रवाल 1993 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।

इससे पहले वह उद्योग, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उनके पास राज्य के औद्योगिक विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण पद भी थे। वह दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर से जुड़े प्राधिकरण, राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (रीको) और निवेश संवर्धन ब्यूरो के अध्यक्ष भी थे।

एपीओ आदेश के बाद उनसे ये जिम्मेदारियां वापस ले ली गई हैं। फिलहाल उन्हें किसी नए पद पर नियुक्त नहीं किया गया है। 

ढाई साल में खरीदे 40 विला और कॉटेज

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, शिखर अग्रवाल, उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर, दोनों बेटों और सास-ससुर के नाम पर पिछले करीब ढाई साल में 40 संपत्तियां खरीदी गईं। इनमें 20 विला अलवर जिले के अजबगढ़ में हैं, जबकि 20 कॉटेज उदयपुर के बुझड़ा इलाके में स्थित हैं। सभी संपत्तियां गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी से खरीदी गई थीं।

रिपोर्ट के अनुसार, इन संपत्तियों को खरीदने में कुल 6 करोड़ 16 लाख 50 हजार रुपये खर्च किए गए। उदयपुर के 20 कॉटेज की रजिस्ट्री सितंबर 2023 में हुई थी। वहीं, अलवर के 20 विला मार्च 2026 में खरीदे गए। संपत्तियों की खरीद और उनसे जुड़े दस्तावेज सामने आने के बाद पूरे मामले पर सवाल उठने लगे। 

जिस कंपनी से खरीदी संपत्ति, उसी को लीज पर दी

इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा संपत्तियों की खरीद के बाद हुए लीज समझौते की हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, अग्रवाल परिवार ने जिन 40 विला और कॉटेज को गोयल फैशंस प्राइवेट लिमिटेड से खरीदा था, उन्हें बाद में उसी कंपनी को किराये पर दे दिया।

उदयपुर के बुझड़ा में स्थित 20 कॉटेज का सालाना किराया चार लाख रुपये प्रति कॉटेज तय किया गया। इस हिसाब से इनसे हर साल 80 लाख रुपये मिलने की बात कही गई है। वहीं, अलवर के अजबगढ़ में खरीदे गए 20 विला का सालाना किराया पांच लाख रुपये प्रति विला बताया गया है। इससे सालाना एक करोड़ रुपये की आय का अनुमान है।

इस तरह कुल 40 संपत्तियों से सालाना 1.80 करोड़ रुपये की लीज आय का दावा किया गया है। हालांकि, यह समझौते के आधार पर बताई गई रकम है। वास्तव में कितनी राशि प्राप्त हुई, इसकी अलग पुष्टि जरूरी है। 

प्रॉपर्टी रिटर्न में जानकारी देने पर भी उठे सवाल

संपत्तियों की खरीद के साथ सरकारी अधिकारियों की सालाना अचल संपत्ति विवरणी को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि अजबगढ़ में खरीदे गए विला की जानकारी उपलब्ध वार्षिक संपत्ति विवरण में दिखाई नहीं दे रही थी।

हालांकि, शिखर अग्रवाल ने इस दावे पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने संपत्तियों की पूरी जानकारी निर्धारित प्रक्रिया के तहत दी थी, लेकिन विभाग के रिकॉर्ड में उसे अपडेट नहीं किया गया।

इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। ऐसे में यह स्पष्ट होना बाकी है कि संपत्ति विवरण और विभागीय रिकॉर्ड में अंतर किस कारण हुआ। 

संपत्ति खरीद पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

शिखर अग्रवाल राज्य के उद्योग और निवेश से जुड़े विभागों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे थे। ऐसे में उनके परिवार के कारोबारी संपत्ति सौदों को लेकर पारदर्शिता और हितों के संभावित टकराव से जुड़े सवाल उठाए जा रहे हैं।

हालांकि, किसी अधिकारी या उसके परिवार द्वारा संपत्ति खरीदना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। इस मामले में यह देखना जरूरी होगा कि सभी जरूरी अनुमतियां ली गई थीं या नहीं और नियमों के अनुसार संपत्तियों की जानकारी दी गई थी या नहीं।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी तरह की वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार साबित होने का दावा नहीं किया जा सकता।

एपीओ का क्या मतलब होता है?

सरकारी सेवा में एपीओ यानी Awaiting Posting Orders का मतलब है कि अधिकारी को मौजूदा पद से हटाकर अगली नियुक्ति के आदेश का इंतजार करने के लिए कहा गया है। इसका अर्थ सेवा से बर्खास्तगी या दोषी पाया जाना नहीं है। अधिकारी सरकारी सेवा में बना रहता है, लेकिन उसके पास नियमित पदस्थापन नहीं होता।

शिखर अग्रवाल के मामले में भी कार्मिक विभाग ने प्रशासनिक कारणों का हवाला दिया है। इसलिए एपीओ आदेश को अपने आप में संपत्ति से जुड़े आरोपों की पुष्टि नहीं माना जा सकता।

आगे क्या होगा?

इस मामले में अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर हैं। संपत्तियों की खरीद, लीज समझौते और वार्षिक संपत्ति विवरण को लेकर उठे सवालों के बाद यह देखना होगा कि सरकार कोई विभागीय जांच कराती है या नहीं।

फिलहाल शिखर अग्रवाल को महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों से हटा दिया गया है। लेकिन संपत्ति खरीद से जुड़े विवाद में किसी कानूनी उल्लंघन की अंतिम पुष्टि नहीं हुई है।

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