भारत की Space Launch Cost सबसे ज्यादा, अध्ययन में प्रति किलो ऑर्बिट पहुंचाने का खर्च अमेरिका से चार गुना

भारत में 2025 में प्रति किलो पेलोड को Low-Earth Orbit तक पहुंचाने की लागत 13,302 डॉलर रही। अध्ययन में अमेरिका की लागत 3,225 डॉलर बताई गई।

छह दशकों से अधिक के अंतरिक्ष मिशनों के विश्लेषण में भारत की प्रति किलोग्राम Space Launch Cost प्रमुख अंतरिक्ष देशों में सबसे अधिक पाई गई। अध्ययन के मुताबिक 2025 में भारत में यह लागत 13,302 डॉलर रही।

Space Launch Cost: भारत को किफायती अंतरिक्ष प्रक्षेपण की पहचान के लिए जाना जाता है, लेकिन एक नए peer-reviewed अध्ययन ने इसकी अलग तस्वीर पेश की है। छह दशकों से अधिक के रॉकेट लॉन्च के विश्लेषण के अनुसार, 2025 में भारतीय रॉकेट से Low-Earth Orbit में एक किलोग्राम पेलोड पहुंचाने की अनुमानित लागत 13,302 डॉलर रही, जो प्रमुख अंतरिक्ष देशों में सबसे अधिक है।

भारत की प्रति किलो लॉन्च लागत सबसे अधिक

भारत की अंतरिक्ष लॉन्चिंग को लंबे समय से लागत के लिहाज से प्रतिस्पर्धी माना जाता रहा है। हालांकि, Economics Letters में प्रकाशित नए peer-reviewed अध्ययन के अनुसार, प्रति किलोग्राम पेलोड को Low-Earth Orbit तक पहुंचाने की लागत के मामले में भारत प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों से पीछे है।

अध्ययन में 2025 के आंकड़ों के आधार पर भारतीय रॉकेट से एक किलोग्राम पेलोड को कक्षा में भेजने की लागत करीब 13,302 डॉलर आंकी गई है। यह आंकड़ा यूरोप, रूस, चीन, जापान और अमेरिका की तुलना में अधिक है।

तुलना के लिए यूरोप में यह अनुमानित लागत 9,897 डॉलर, रूस में 6,682 डॉलर, चीन में 5,809 डॉलर और जापान में 5,287 डॉलर रही। अमेरिका में प्रति किलोग्राम लॉन्च लागत करीब 3,225 डॉलर आंकी गई है। वैश्विक औसत लगभग 3,868 डॉलर रहा।

छह दशकों के मिशनों के आधार पर अध्ययन

यह निष्कर्ष केवल किसी एक मिशन या रॉकेट के प्रदर्शन पर आधारित नहीं है। शोधकर्ताओं ने छह दशकों से अधिक समय में हुए रॉकेट लॉन्च और अंतरिक्ष मिशनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।

अध्ययन Cambridge University के Alessio Terzi और Politecnico di Torino के Francesco Nicoli ने किया है। शोध का उद्देश्य अलग-अलग देशों में अंतरिक्ष प्रक्षेपण की वास्तविक आर्थिक लागत और समय के साथ उसमें आए बदलाव को समझना था।

भारत के मामले में अध्ययन ने एक महत्वपूर्ण कारण की ओर संकेत किया है। देश पर्याप्त संख्या में लॉन्च नहीं करता, जिससे लॉन्च की लागत को बड़े पैमाने पर फैलाने और कम करने का लाभ सीमित रह जाता है।

कम लॉन्च फ्रीक्वेंसी से लागत घटाने में चुनौती

रॉकेट लॉन्चिंग में कई खर्च ऐसे होते हैं जो हर मिशन के साथ सीधे अनुपात में नहीं बढ़ते। लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी विशेषज्ञता, परीक्षण, संचालन और अन्य स्थायी खर्चों को अधिक संख्या में मिशनों के बीच बांटने पर प्रति लॉन्च लागत कम की जा सकती है।

भारत में लॉन्च की संख्या अपेक्षाकृत कम रहने के कारण इन खर्चों का भार कम मिशनों पर पड़ता है। परिणामस्वरूप प्रति किलोग्राम पेलोड की लागत अधिक दिखाई देती है।

यह स्थिति भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम चुनौती मानी जा सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर commercial space sector तेजी से विस्तार कर रहा है।

Space Sector में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच चुनौती

भारत ने कम लागत वाले अंतरिक्ष मिशनों और सफल अभियानों के जरिए दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन नया अध्ययन बताता है कि केवल मिशन की कुल लागत कम होना पर्याप्त नहीं है। पेलोड क्षमता, लॉन्च की संख्या और उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग भी आर्थिक दक्षता तय करते हैं।

ऐसे में भारत के लिए लॉन्च की frequency बढ़ाना, infrastructure का बेहतर उपयोग करना और commercial space गतिविधियों को विस्तार देना महत्वपूर्ण हो सकता है। इससे भविष्य में प्रति किलोग्राम लॉन्च लागत को कम करने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

Leave a comment