इंडोनेशिया में जंगल की आग से हाहाकार, 1.75 लाख लोग बीमार; 8.95 लाख हेक्टेयर जमीन जली

इंडोनेशिया में जंगल की भीषण आग और जहरीले धुएं से अगस्त से अब तक करीब 1.75 लाख लोग सांस संबंधी बीमारियों से प्रभावित हुए हैं। 8.95 लाख हेक्टेयर जमीन जल चुकी है

इंडोनेशिया में जंगल की भीषण आग और जहरीले धुएं से अगस्त से अब तक करीब 1.75 लाख लोग सांस संबंधी बीमारियों से प्रभावित हुए हैं। 8.95 लाख हेक्टेयर जमीन जल चुकी है और धुएं का असर मलेशिया, सिंगापुर व फिलीपींस तक पहुंचा है।

जकार्ता: इंडोनेशिया में कई हफ्तों से जारी जंगल और जमीन की भीषण आग ने स्वास्थ्य एवं पर्यावरण का संकट गहरा दिया है। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, अगस्त से अब तक करीब 1,75,000 लोग सांस संबंधी बीमारियों से प्रभावित हुए हैं। इनमें 40,000 से अधिक मामले छोटे बच्चों, खासकर टॉडलर्स, से जुड़े हैं। लगातार फैल रहे जहरीले धुएं ने इंडोनेशिया के साथ-साथ पड़ोसी मलेशिया और सिंगापुर के कई हिस्सों की हवा को भी प्रभावित किया है। धुएं के कारण कई क्षेत्रों में एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI ‘अनहेल्दी’ श्रेणी तक पहुंच गया है। सरकार आग पर काबू पाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चला रही है, लेकिन विशाल भौगोलिक क्षेत्र, घने जंगल और पीटलैंड की कठिन परिस्थितियां राहत एवं बचाव अभियान को चुनौती दे रही हैं।

1.75 लाख लोग सांस संबंधी बीमारियों से प्रभावित

इंडोनेशिया के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, अगस्त से अब तक करीब 175,000 लोगों में सांस संबंधी बीमारी दर्ज की गई है। इन मामलों में सामान्य खांसी से लेकर ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियां भी शामिल हैं। इनमें से 40,000 से अधिक मामले टॉडलर्स से संबंधित हैं। आग और धुएं के कारण अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। कई इलाकों में जहरीले धुएं के कारण स्कूलों को बंद करना पड़ा है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जंगल की आग से जुड़ी सांस संबंधी बीमारियों के मामलों में सितंबर की शुरुआत में तेजी से बढ़ोतरी हुई। 1 सितंबर तक ऐसे 50,891 मामले दर्ज किए गए थे, जो 9 सितंबर तक बढ़कर 1,13,336 हो गए।

54 हजार से ज्यादा अधिकारी अभियान में जुटे

इंडोनेशियाई सरकार ने आग बुझाने और धुएं के प्रभाव को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर संसाधन लगाए हैं। अधिकारियों के अनुसार, 54,000 से अधिक कर्मियों को अभियान में तैनात किया गया है। बोर्नियो और सुमात्रा द्वीपों पर आग बुझाने के लिए दर्जनों विमानों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन विमानों के जरिए प्रभावित इलाकों में पानी गिराकर आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश की जा रही है।

इंडोनेशिया के कैबिनेट सचिव टेडी इंद्रा विजया ने कहा कि हवा से लेकर जमीन तक सभी बल लगातार अभियान में जुटे हैं। उनके मुताबिक, आग बुझाने, धुएं के प्रभाव को कम करने और लोगों को जंगल एवं जमीन की आग के खतरे से बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।

इस साल आग का प्रकोप क्यों बढ़ा?

इंडोनेशिया में हर साल शुष्क मौसम के दौरान जंगलों में आग लगती है। आम तौर पर यह मौसम जुलाई से अक्टूबर तक रहता है। हालांकि, इस साल बेहद शुष्क परिस्थितियों ने आग और धुएं के संकट को और गंभीर बना दिया है। इसका एक प्रमुख कारण तथाकथित ‘गॉडजिला’ अल नीनो को बताया गया है। इस मौसम संबंधी घटना ने कई इलाकों में अत्यधिक सूखे की स्थिति को बढ़ावा दिया है, जिससे जंगल और जमीन आग की चपेट में आने के लिए अधिक संवेदनशील हो गए।

स्वतंत्र वन निगरानी प्लेटफॉर्म Nusantara Atlas के अनुसार, बुधवार तक पूरे देश में करीब 7,34,000 हॉटस्पॉट का पता लगाया गया था। यह संख्या 2019 की तुलना में 30 प्रतिशत से अधिक ज्यादा है। 2019 भी इंडोनेशिया के सबसे खराब वनाग्नि वर्षों में शामिल रहा था।

8.95 लाख हेक्टेयर जमीन जल चुकी

इस साल जनवरी से अब तक आग की वजह से कम से कम 8,95,657 हेक्टेयर जमीन जल चुकी है। यह क्षेत्रफल ग्रेटर लंदन के आकार से करीब छह गुना है।

आग का असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। जहरीले धुएं ने आबादी वाले इलाकों को भी प्रभावित किया है। धुएं की चादर इंडोनेशिया से निकलकर पड़ोसी देशों के कुछ हिस्सों तक पहुंच गई है, जिससे पूरे क्षेत्र में वायु गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ी है।

मलेशिया और सिंगापुर तक पहुंचा धुआं

इंडोनेशिया की जंगल की आग से पैदा हुआ धुआं पड़ोसी मलेशिया और सिंगापुर तक पहुंच चुका है। कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक अस्वास्थ्यकर स्तर पर पहुंच गया है।

मलेशिया के सरवाक राज्य में स्थिति गंभीर रहने के कारण अधिकारियों ने पांच दिन का क्लाउड-सीडिंग अभियान भी चलाया। इसका उद्देश्य बारिश कराने के साथ-साथ सूखे के दौरान जल स्तर बनाए रखने में मदद करना था।

सरवाक में कई जलविद्युत बांधों में पानी का स्तर घट रहा है। अधिकारियों को अक्टूबर में और अधिक गर्म एवं शुष्क मौसम की आशंका है। इसलिए बारिश के जरिए जलाशयों का स्तर बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

क्लाउड सीडिंग से बारिश कराने की कोशिश

इंडोनेशिया ने भी हाल के हफ्तों में कई बार क्लाउड सीडिंग अभियान चलाया है। कुछ अभियानों में जापान की सेल्फ-डिफेंस फोर्सेज के सदस्य भी शामिल हुए, जो इस महीने की शुरुआत में बोर्नियो पहुंचे थे।

क्लाउड सीडिंग में मौजूदा बादलों के भीतर नमक के क्रिस्टल या सिल्वर आयोडाइड जैसी सामग्री पहुंचाई जाती है, ताकि बारिश होने की संभावना बढ़ सके।

हालांकि, मौसम वैज्ञानिक इस तकनीक की प्रभावशीलता को लेकर एकमत नहीं हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि इस तरीके से जंगल की आग पर कितनी प्रभावी ढंग से काबू पाया जा सकता है।

आग ने वन्यजीवों के लिए भी बढ़ाया खतरा

जंगल की आग और धुएं का असर इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों पर भी पड़ रहा है। गंभीर रूप से संकटग्रस्त ओरंगुटान भी इस आपदा से प्रभावित हुए हैं।

पिछले महीने के अंत में पश्चिम कालीमंतन की एक पाम ऑयल प्लांटेशन में एक ओरंगुटान जमीन पर तड़पता हुआ मिला था। एक किसान ने उसे देखा, जिसके बाद वन्यजीव संगठन की मदद से उसे बचाया गया और हाइपोक्सिया के लिए आपात उपचार दिया गया। हालांकि बाद में उसकी मौत हो गई।

पश्चिम कालीमंतन इंडोनेशिया के उन क्षेत्रों में शामिल है जो इस बार आग से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

सरकार के खिलाफ दायर हुआ मुकदमा

आग से प्रभावित पश्चिम कालीमंतन में स्वदेशी और नागरिक समाज संगठनों ने पिछले सप्ताह केंद्र सरकार तथा स्थानीय प्रशासन के खिलाफ सामूहिक मुकदमा दायर किया।

संगठनों ने आरोप लगाया कि सरकार और स्थानीय प्रशासन ने आग पर प्रभावी तरीके से कार्रवाई नहीं की और उनकी लापरवाही के कारण संकट बार-बार सामने आ रहा है।

समूह के वकील ग्लोरियो सानेन ने कहा कि यह हर साल होने वाली आपदा है और इस दोहराव से यह संकेत मिलता है कि संबंधित पक्षों को जंगल और जमीन की आग से होने वाले खतरे की जानकारी पहले से थी।

धुआं फिलीपींस तक पहुंचा

इंडोनेशिया के जंगलों की आग से उठने वाला धुआं अब क्षेत्र के अन्य हिस्सों तक भी पहुंच रहा है। फिलीपींस के कुछ इलाकों में स्थानीय अधिकारियों ने लोगों से यथासंभव घरों के अंदर रहने की अपील की है।

वहीं, सिंगापुर में अधिकारियों ने रोजाना धुंध और वायु गुणवत्ता संबंधी सलाह जारी करना शुरू कर दिया है।

इंडोनेशिया के लिए यह संकट केवल जंगल की आग बुझाने तक सीमित नहीं है। बढ़ते श्वसन रोग, स्कूलों का बंद होना, अस्पतालों पर दबाव, वन्यजीवों की मौत और पड़ोसी देशों तक पहुंचता धुआं इस आपदा के व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव को दिखाता है। अक्टूबर में गर्म और शुष्क परिस्थितियों की आशंका के बीच आग पर जल्द नियंत्रण पाना स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है।

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