झारखंड में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के सैकड़ों पद खाली हैं। RTI से मिली जानकारी में रांची के स्कूलों में भी शिक्षकों की कमी सामने आई है, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
रांची: झारखंड में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद सरकारी स्कूलों में इसकी शिक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है। RTI से सामने आई जानकारी के अनुसार रांची समेत कई क्षेत्रों में उर्दू शिक्षकों के स्वीकृत पद लंबे समय से खाली हैं। इससे उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
राजभाषा का दर्जा, लेकिन शिक्षकों की भारी कमी
झारखंड में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा हासिल है, लेकिन सरकारी विद्यालयों में इसके शिक्षण की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। राज्य गठन के करीब 26 साल बाद भी उर्दू शिक्षा के क्षेत्र में रिक्त पदों और नियुक्ति प्रक्रिया की समस्या बनी हुई है।
आजादी से पहले रांची के पठारी क्षेत्र में उर्दू को बढ़ावा देने के लिए कई स्कूल खोले गए थे। इनमें कुछ निजी स्तर पर और कुछ सरकारी स्कूल शामिल थे। आजादी के बाद प्राथमिक स्तर पर उर्दू की पढ़ाई को आगे बढ़ाया गया, लेकिन मौजूदा स्थिति में शिक्षकों की कमी के कारण विद्यार्थियों को पर्याप्त शैक्षणिक सुविधा नहीं मिल पा रही है।
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सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी ने सरकारी स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की कमी की तस्वीर सामने रखी है। जनवादी लेखक संघ के एमजेड खान के अनुसार, उर्दू को राजभाषा का दर्जा देने के साथ उसके व्यावहारिक क्रियान्वयन की दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है।
रांची में 56 स्वीकृत पदों में 34 खाली
रांची जिला के शिक्षक अधिकारी से RTI के तहत 227 राजकीय एवं राज्यकृत विद्यालयों से जानकारी प्राप्त की गई। इसके आधार पर जिले के सरकारी स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की स्थिति को लेकर चिंता सामने आई है।
रांची प्रखंड के दो दर्जन से अधिक विद्यालयों में उर्दू शिक्षकों के 56 पद शुरुआती दौर से स्वीकृत हैं। इनमें से 34 पद खाली पड़े हैं, जबकि सिर्फ 22 शिक्षक कार्यरत हैं। लंबे समय से पद खाली रहने का सीधा असर उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों की शिक्षा पर पड़ रहा है।
हिंदपीढ़ी उर्दू स्कूल में 425 विद्यार्थी, चार पद रिक्त
जीएमएस हिंदपीढ़ी उर्दू स्कूल के आंकड़े भी शिक्षकों की कमी की स्थिति को स्पष्ट करते हैं। यहां उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 425 है। स्कूल में उर्दू शिक्षकों के सात पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल तीन शिक्षक कार्यरत हैं। चार पद खाली हैं।
ऐसे में प्राथमिक स्तर पर विद्यार्थियों को नियमित और पर्याप्त शिक्षण सुविधा उपलब्ध कराने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन विद्यालयों में उर्दू शिक्षकों के कई पद दशकों से रिक्त हैं।
उर्दू शिक्षा सुधार के लिए उठाने होंगे ठोस कदम
उर्दू शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए उर्दू अकादमी की स्थापना, प्रत्येक जिले में उर्दू प्रकोष्ठ बनाने, रिक्त शिक्षक पदों को भरने और अनुवाद केंद्र स्थापित करने जैसे कदम सुझाए गए हैं। इसके अलावा उर्दू पुस्तकालयों को मजबूत करने की जरूरत भी बताई गई है।
शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया लंबे समय से लंबित रहने के कारण विद्यार्थियों को इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है। ऐसे में उर्दू को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देने के साथ सरकारी विद्यालयों में उसके प्रभावी शिक्षण के लिए रिक्त पदों को भरना और संस्थागत व्यवस्था मजबूत करना अहम माना जा रहा है।







