कोलकाता की ऐतिहासिक राइटर्स बिल्डिंग यानी महाकरण के जीर्णोद्धार को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। इस परियोजना में अदाणी ग्रुप सबसे आगे नजर आ रहा है। समूह की एक टीम ने पश्चिम बंगाल लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारियों के साथ राइटर्स बिल्डिंग का निरीक्षण किया और इमारत की मौजूदा स्थिति, संरचनात्मक समस्याओं तथा संभावित जीर्णोद्धार के दायरे का प्रारंभिक आकलन किया। इस निरीक्षण के बाद विस्तृत प्रस्ताव तैयार किए जाने की संभावना है।
रिपोर्ट के मुताबिक, PWD के मुख्य अभियंता और उनकी टीम के साथ अदाणी ग्रुप के सलाहकार एवं सेवानिवृत्त IAS अधिकारी संजय थाडे भी निरीक्षण में शामिल रहे। टीम ने भवन के अलग-अलग हिस्सों की स्थिति को समझने की कोशिश की। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि ऐतिहासिक इमारत को उसकी मूल विरासत और स्थापत्य पहचान को बनाए रखते हुए किस तरह आधुनिक जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है।
राज्य सरकार से जुड़े सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, राइटर्स बिल्डिंग के संरक्षण और नए सिरे से उपयोग की योजना को लेकर अदाणी ग्रुप ने रुचि दिखाई है। प्रस्तावित काम सिर्फ सामान्य मरम्मत तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि ऐतिहासिक इमारत को उसकी प्रशासनिक और स्थापत्य गरिमा के अनुरूप फिर से तैयार करने की दिशा में देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम जिम्मेदारी किसे दी जाएगी, इस पर अभी औपचारिक फैसला होना बाकी है।
प्रारंभिक आकलन में राइटर्स बिल्डिंग के जीर्णोद्धार की लागत करीब 100 से 120 करोड़ रुपये तक आने का अनुमान सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, अदाणी ग्रुप इस परियोजना को कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी CSR पहल के तहत वित्तपोषित करने पर विचार कर सकता है। यह अभी प्रस्ताव और प्रारंभिक आकलन के स्तर की जानकारी है, इसलिए इसे अंतिम लागत या स्वीकृत परियोजना नहीं माना जा सकता।
राइटर्स बिल्डिंग कोलकाता की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है। इसका निर्माण 1777 में हुआ था और शुरुआत में यह ईस्ट इंडिया कंपनी के जूनियर क्लर्कों के कार्यालय के रूप में इस्तेमाल की जाती थी। इन क्लर्कों को उस दौर में ‘राइटर्स’ कहा जाता था और इसी वजह से इमारत का नाम राइटर्स बिल्डिंग पड़ा। समय के साथ यह बंगाल के प्रशासन का एक प्रमुख केंद्र बन गई।
इस इमारत का इतिहास केवल प्रशासन तक सीमित नहीं है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भी राइटर्स बिल्डिंग का खास स्थान है। 8 दिसंबर 1930 को क्रांतिकारी बिनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने यहां ब्रिटिश अधिकारी एनएस सिम्पसन पर हमला किया था। इस घटना की स्मृति से जुड़ा क्षेत्र बाद में डलहौजी स्क्वायर से बदलकर बीबी.
डी. बाग के नाम से जाना गया। इस वजह से राइटर्स बिल्डिंग बंगाल के राजनीतिक और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
समय के साथ राइटर्स बिल्डिंग में कई तरह के निर्माण और बदलाव हुए। 19वीं सदी के अंत तक इमारत ने अपना मौजूदा ग्रीको-रोमन स्वरूप हासिल किया था। बाद के वर्षों में प्रशासनिक जरूरतों और जगह की कमी के कारण परिसर में कई अतिरिक्त निर्माण और बदलाव किए गए। इन बदलावों के कारण मूल स्थापत्य स्वरूप के कुछ हिस्सों पर असर पड़ा और लंबे समय से इसके संरक्षण की जरूरत महसूस की जाती रही है।
राइटर्स बिल्डिंग लंबे समय तक पश्चिम बंगाल सरकार के प्रशासनिक कामकाज का प्रमुख केंद्र रही। हालांकि 2013 में राज्य सचिवालय को नबन्ना स्थानांतरित कर दिया गया और इसके बाद राइटर्स बिल्डिंग का प्रशासनिक इस्तेमाल काफी कम हो गया। पिछले कई वर्षों से इसके व्यापक जीर्णोद्धार और भविष्य के उपयोग को लेकर अलग-अलग स्तर पर योजनाएं सामने आती रही हैं।
अब अदाणी ग्रुप की ओर से इस ऐतिहासिक भवन में रुचि दिखाए जाने से राइटर्स बिल्डिंग के भविष्य को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। सरकार की तरफ से इसे प्रशासनिक केंद्र के रूप में दोबारा इस्तेमाल करने की इच्छा भी पहले सामने आ चुकी है। ऐसे में संभावित जीर्णोद्धार के बाद इस ऐतिहासिक परिसर को किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा, यह भी इस पूरी परियोजना का अहम हिस्सा होगा।
हालांकि विरासत वाली इमारत में किसी भी तरह के निर्माण या बदलाव के लिए सामान्य भवन की तरह काम नहीं किया जा सकता। ऐतिहासिक ढांचे की मूल पहचान, बाहरी स्वरूप और स्थापत्य विशेषताओं को संरक्षित रखना जरूरी होगा। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, किसी भी संभावित जीर्णोद्धार के लिए संबंधित वैधानिक मंजूरियों के साथ संरक्षण विशेषज्ञों और वास्तु विशेषज्ञों से भी सलाह ली जानी होगी।
यही वजह है कि हालिया निरीक्षण को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निरीक्षण के दौरान भवन की वर्तमान स्थिति, संरचनात्मक मजबूती, मरम्मत की जरूरत और संभावित काम के दायरे का आकलन किया गया। इसी प्रारंभिक मूल्यांकन के आधार पर आगे विस्तृत प्रस्ताव तैयार हो सकता है। प्रस्ताव में इमारत के संरक्षण के साथ-साथ उसके भविष्य के इस्तेमाल से जुड़ी जरूरतों को भी शामिल किए जाने की संभावना है।
राइटर्स बिल्डिंग के जीर्णोद्धार की प्रक्रिया इसलिए भी चुनौतीपूर्ण होगी क्योंकि यह सिर्फ एक पुरानी सरकारी इमारत नहीं है। यह कोलकाता और बंगाल के इतिहास से गहराई से जुड़ी हुई है। इसके गलियारों, बाहरी ढांचे और वास्तुशिल्प में औपनिवेशिक दौर की छाप दिखाई देती है। इसलिए आधुनिक सुविधाएं जोड़ते समय ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होगा।
इस परियोजना में अदाणी ग्रुप का नाम आगे आने के साथ कॉरपोरेट भागीदारी के जरिए ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। समूह की ओर से कोलकाता में पहले भी विरासत से जुड़े काम में भागीदारी की गई है। रिपोर्टों के अनुसार, उसके पोर्ट कारोबार से जुड़ी पहल के तहत कुम्हारटोली घाट के पुनर्विकास और संरक्षण से संबंधित काम भी किया गया है।
हालांकि राइटर्स बिल्डिंग को लेकर अभी सबसे अहम सवाल यही है कि अंतिम रूप से जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी किसे दी जाएगी और परियोजना किस मॉडल के तहत आगे बढ़ेगी। फिलहाल अदाणी ग्रुप को संभावित दावेदारों में सबसे आगे बताया जा रहा है और उसकी टीम द्वारा किया गया निरीक्षण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अंतिम फैसला संबंधित सरकारी प्रक्रिया और प्रस्ताव के मूल्यांकन के बाद ही स्पष्ट होगा।
राइटर्स बिल्डिंग की बहाली की योजना सफल होती है तो इससे कोलकाता की ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करने के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण भवन को नए उपयोग के लिए तैयार करने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि आधुनिक जरूरतों और ऐतिहासिक विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। फिलहाल अदाणी ग्रुप की टीम के निरीक्षण के बाद इस बहुचर्चित परियोजना को लेकर उम्मीदें और गतिविधियां दोनों बढ़ गई हैं।









