कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने और कैबिनेट फेरबदल को लेकर सियासी हलचल एक बार फिर तेज हो गई है। प्रदेश के कई वरिष्ठ मंत्री दिल्ली पहुंचकर पार्टी नेतृत्व से मुलाकात कर रहे हैं। इससे पहले 18 विधायकों ने भी कांग्रेस अध्यक्ष से मिलकर राज्य में मंत्रिमंडल फेरबदल की मांग रखी थी।
नई दिल्ली: कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर बड़े सियासी बदलाव की ओर संकेत दे रही है। राज्य में मुख्यमंत्री परिवर्तन और कैबिनेट फेरबदल को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के दिल्ली दौरे और पार्टी आलाकमान से लगातार बैठकों के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है। माना जा रहा है कि अगले महीने इस पर कोई बड़ा और निर्णायक फैसला लिया जा सकता है।
दिल्ली में कांग्रेस नेताओं की लगातार बैठकें
कर्नाटक कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेता इन दिनों दिल्ली में पार्टी हाईकमान से मुलाकात कर रहे हैं। हाल ही में वरिष्ठ नेता सतीश जारकीहोली और एम. बी. पाटिल ने कांग्रेस अध्यक्ष से मुलाकात की, जिन्हें मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी माना जाता है। इसके बाद बी. के. हरिप्रसाद और के. एच. मुनियप्पा ने भी दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत की।
इन बैठकों में राज्य की मौजूदा राजनीतिक स्थिति, कैबिनेट विस्तार और संभावित नेतृत्व बदलाव पर विस्तार से चर्चा होने की बात सामने आ रही है। इससे पहले भी करीब 18 विधायकों ने कांग्रेस अध्यक्ष को पत्र लिखकर कैबिनेट फेरबदल की मांग की थी।
नेतृत्व बदलाव या कैबिनेट फेरबदल?
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कर्नाटक में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सिर्फ कैबिनेट में फेरबदल होगा या मुख्यमंत्री स्तर पर बदलाव देखने को मिलेगा। वर्तमान राजनीतिक स्थिति में उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार कथित तौर पर नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में माने जा रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का रुख कैबिनेट पुनर्गठन तक सीमित बताया जा रहा है।
पार्टी के भीतर यह संतुलन आने वाले फैसले को और भी महत्वपूर्ण बना रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस आलाकमान दोनों नेताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर सकता है।
आलाकमान ने 4 मई तक मांगा समय
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस हाईकमान ने राज्य इकाई से 4 मई तक इंतजार करने को कहा है। इस दौरान सभी पक्षों से सुझाव और रिपोर्ट ली जा रही है, जिसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि किसी भी बड़े बदलाव से पहले संगठनात्मक एकता और सरकार की स्थिरता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी माने जाने वाले वरिष्ठ नेता के. एन. राजन्ना का बयान भी काफी अहम माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि सिद्धारमैया राहुल गांधी के निर्देशों का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं—चाहे उन्हें पद पर बने रहना हो या सत्ता छोड़नी पड़े। राजन्ना ने यह भी संकेत दिया कि पार्टी नेतृत्व किसी भी निर्णय को अंतिम मानकर आगे बढ़ सकता है। उनके बयान को कांग्रेस के भीतर संभावित सहमति बनाने की दिशा में एक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।








