हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में कमजोर और संवेदनशील पहाड़ी ढलानों पर जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT ने संज्ञान लिया है। पर्यावरण और पहाड़ी भूगोल से जुड़े इस मामले में अधिकरण ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है और आठ सप्ताह के भीतर स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुल्लू घाटी लंबे समय से जलविद्युत परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र रही है, लेकिन दूसरी ओर यहां की भौगोलिक संवेदनशीलता, भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी लगातार चर्चा में रहता है।
कुल्लू की पहाड़ियां सामान्य मैदानी इलाकों की तरह स्थिर भूभाग नहीं हैं। यहां कई स्थानों पर ढलान बेहद तीखी हैं और बारिश के दौरान मिट्टी तथा चट्टानों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में किसी बड़े निर्माण, सुरंग, सड़क या अन्य परियोजना के लिए पहाड़ काटने का काम पर्यावरणीय और भूगर्भीय दृष्टि से अतिरिक्त सावधानी की मांग करता है। जलविद्युत परियोजनाओं में बांध, सुरंग, पावर हाउस, सड़क और अन्य आधारभूत ढांचे के निर्माण की जरूरत होती है। इसलिए कमजोर ढलानों वाले क्षेत्रों में इन परियोजनाओं की उपयुक्तता को लेकर उठे सवाल को गंभीर माना जा रहा है।
NGT के संज्ञान के बाद अब संबंधित विभागों और परियोजना से जुड़े पक्षों के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी होगी। आठ सप्ताह की समयसीमा में यह बताना होगा कि संबंधित क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति क्या है, वहां परियोजनाएं लगाने के लिए किन पर्यावरणीय और तकनीकी मानकों को अपनाया गया है तथा संवेदनशील ढलानों की स्थिरता को लेकर क्या अध्ययन किए गए हैं। हालांकि उपलब्ध जानकारी में अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अधिकरण ने किन-किन विशेष परियोजनाओं या कितने स्थानों को इस प्रक्रिया में शामिल किया है।
कुल्लू में जलविद्युत विकास कोई नई बात नहीं है। पार्वती नदी और इसकी सहायक धाराओं पर कई चरणों में जलविद्युत परियोजनाओं का विकास हुआ है। उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार पार्वती जलविद्युत परियोजना की अलग-अलग चरणों वाली योजनाएं कुल्लू जिले में विकसित की गई हैं। इस वजह से जिले में बिजली उत्पादन और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है।
जलविद्युत परियोजनाओं के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि पहाड़ी नदियों की जल ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में जलविद्युत ऊर्जा का बड़ा स्रोत है। लेकिन किसी भी परियोजना की व्यवहार्यता केवल बिजली उत्पादन की क्षमता से तय नहीं होती। उसके लिए पर्यावरणीय प्रभाव, भूगर्भीय स्थिरता, जल स्रोत, स्थानीय आबादी, वन क्षेत्र और आपदा जोखिम जैसे पहलुओं का अध्ययन भी जरूरी होता है।
कुल्लू में कमजोर ढलानों को लेकर उठे सवाल इसी व्यापक चिंता से जुड़े हैं। यदि किसी क्षेत्र की पहाड़ी संरचना पहले से अस्थिर है और वहां बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाता है तो भारी बारिश या भूकंपीय गतिविधि जैसी परिस्थितियों में जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि किसी परियोजना के कारण ही किसी विशेष भूस्खलन की घटना हुई, ऐसा निष्कर्ष वैज्ञानिक जांच के बिना नहीं निकाला जा सकता। यही कारण है कि ऐसे मामलों में विस्तृत भूगर्भीय और पर्यावरणीय अध्ययन महत्वपूर्ण होते हैं।
हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में भारी बारिश, बादल फटने और भूस्खलन जैसी घटनाओं ने निर्माण गतिविधियों और पर्यावरणीय जोखिम को लेकर बहस तेज की है। सड़क निर्माण से लेकर जलविद्युत परियोजनाओं तक, पहाड़ों में होने वाले हर बड़े हस्तक्षेप के साथ प्राकृतिक ढलानों की स्थिरता पर सवाल उठते रहे हैं। कुल्लू भी इस चुनौती से अछूता नहीं है।
किसी जलविद्युत परियोजना के निर्माण में कई स्तरों पर पहाड़ और भूभाग प्रभावित हो सकते हैं। सुरंग बनाने के लिए चट्टानों के भीतर खुदाई की जाती है, परियोजना स्थल तक पहुंचने के लिए सड़कें बनाई जाती हैं और मशीनरी तथा निर्माण सामग्री के लिए भारी परिवहन की जरूरत होती है। यदि इन गतिविधियों के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा जाए तो ढलानों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि आधुनिक परियोजनाओं में भूगर्भीय सर्वे और सुरक्षा उपायों का प्रावधान होता है, लेकिन सवाल यही होता है कि उन्हें जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया गया।
NGT का पर्यावरण संबंधी मामलों में हस्तक्षेप इसी तरह के सवालों की जांच के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। अधिकरण पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में संबंधित विभागों और परियोजना संचालकों से रिपोर्ट और जवाब मांग सकता है। इसके बाद उपलब्ध दस्तावेजों, विशेषज्ञ रिपोर्ट और संबंधित पक्षों की दलीलों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है।
आठ सप्ताह में जवाब मांगे जाने का मतलब यह नहीं है कि अधिकरण ने सभी परियोजनाओं को पर्यावरण के लिए नुकसानदायक घोषित कर दिया है। फिलहाल यह मामला जवाब और तथ्यों की जांच के चरण में है। संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। इसके बाद ही यह तय होगा कि मामले में आगे किसी विस्तृत जांच, विशेषज्ञ समिति या अन्य कार्रवाई की जरूरत है या नहीं।
इस मामले में भूगर्भीय अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक हो सकता है। किसी परियोजना स्थल की चट्टानों की प्रकृति, ढलान का कोण, मिट्टी की स्थिति, जल निकासी, भूस्खलन का पुराना रिकॉर्ड और बारिश के दौरान भूभाग की प्रतिक्रिया जैसी जानकारियों के आधार पर जोखिम का आकलन किया जाता है। यदि कोई क्षेत्र पहले से भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है तो निर्माण की योजना बनाते समय अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की जरूरत होती है।
स्थानीय लोगों के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण है। पहाड़ों में रहने वाले परिवारों का जीवन सीधे प्राकृतिक भूभाग से जुड़ा होता है। खेती, बागवानी, सड़क, पेयजल स्रोत और स्थानीय रास्ते सभी पहाड़ी ढलानों और जल स्रोतों पर निर्भर रहते हैं। किसी परियोजना के निर्माण से यदि स्थानीय जलधारा, रास्ता या जमीन प्रभावित होती है तो उसका सीधा असर ग्रामीण आबादी पर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, जलविद्युत परियोजनाएं स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी पैदा करती हैं। निर्माण कार्यों के दौरान श्रमिकों को काम मिलता है और परियोजना शुरू होने के बाद बिजली उत्पादन से राज्य को राजस्व प्राप्त होता है। इसलिए इस मुद्दे को केवल विकास बनाम पर्यावरण की लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक चुनौती यह है कि विकास कार्य ऐसे क्षेत्रों में और ऐसे तरीके से हों जिससे प्राकृतिक जोखिम को न्यूनतम किया जा सके।
कुल्लू में जलविद्युत क्षमता का इस्तेमाल राज्य की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण रहा है। उपलब्ध आंकड़ों में जिले में कई जलविद्युत परियोजनाओं का उल्लेख मिलता है। पार्वती परियोजना भी कुल्लू की प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में शामिल है। ऐसे में नए प्रोजेक्ट या मौजूदा परियोजनाओं के विस्तार के दौरान पर्यावरणीय वहन क्षमता का सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
विशेषज्ञों के स्तर पर अक्सर यह बात उठती रही है कि पहाड़ी राज्यों में किसी नदी घाटी को अलग-अलग परियोजनाओं के रूप में देखने के बजाय पूरे नदी बेसिन के स्तर पर प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए। एक परियोजना का प्रभाव सीमित दिखाई दे सकता है, लेकिन उसी नदी या घाटी में कई परियोजनाएं होने पर सामूहिक प्रभाव अलग हो सकता है। इसमें सड़क निर्माण, सुरंगों, मलबे के निस्तारण, जल प्रवाह में बदलाव और निर्माण गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव का अध्ययन महत्वपूर्ण होता है।
मलबे का सही निस्तारण भी पहाड़ी परियोजनाओं के लिए एक बड़ा मुद्दा है। सुरंगों और पहाड़ की खुदाई से बड़ी मात्रा में मलबा निकलता है। यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित स्थानों पर नहीं रखा जाए तो बारिश के दौरान यह बहकर नदियों और नालों में पहुंच सकता है। इससे जल प्रवाह प्रभावित होने के साथ-साथ आसपास की जमीन और पर्यावरण पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए पर्यावरणीय प्रबंधन योजना में मलबे के निस्तारण की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होती है।
जलविद्युत परियोजनाओं में प्राकृतिक जल प्रवाह का सवाल भी अहम है। नदी और उसकी सहायक धाराएं केवल बिजली उत्पादन का स्रोत नहीं हैं, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी, कृषि, पेयजल और जैव विविधता के लिए भी जरूरी हैं। किसी परियोजना की योजना बनाते समय नदी में आवश्यक पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखने जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाता है।
NGT के संज्ञान के बाद अब कुल्लू में कमजोर ढलानों पर प्रस्तावित या संचालित परियोजनाओं को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी दस्तावेजों की समीक्षा की संभावना बढ़ गई है। संबंधित विभागों को परियोजना की मंजूरी, पर्यावरणीय स्वीकृति, भूगर्भीय रिपोर्ट और सुरक्षा उपायों से संबंधित जानकारी तैयार करनी पड़ सकती है। आठ सप्ताह की समयसीमा में जवाब दाखिल होने के बाद मामले की अगली दिशा स्पष्ट होगी।
स्थानीय स्तर पर इस मामले का सबसे बड़ा संदेश यही है कि पहाड़ों में विकास योजनाओं के लिए प्राकृतिक भूगोल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिजली की जरूरत और आर्थिक विकास अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी संवेदनशील ढलान पर परियोजना लगाने से पहले उसके दीर्घकालिक जोखिम को समझना भी उतना ही जरूरी है।
यदि किसी परियोजना के लिए तकनीकी अध्ययन यह बताता है कि जमीन पर्याप्त रूप से स्थिर है और जरूरी सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं, तो विकास कार्य को आगे बढ़ाने का आधार मजबूत हो सकता है। लेकिन यदि किसी क्षेत्र में गंभीर भूगर्भीय जोखिम सामने आता है तो परियोजना की डिजाइन, स्थान या निर्माण प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। यही जांच और नियामकीय प्रक्रिया का उद्देश्य है।
फिलहाल NGT के सामने मामला प्रारंभिक जवाब और तथ्यों की प्रक्रिया में है। आठ सप्ताह की समयसीमा पूरी होने के बाद संबंधित विभागों और परियोजना पक्षों के जवाब के आधार पर आगे की सुनवाई हो सकती है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कुल्लू की सभी जलविद्युत परियोजनाओं पर किसी तरह की रोक लगेगी या परियोजनाओं के खिलाफ कोई अंतिम आदेश आएगा।
कुल मिलाकर कुल्लू में कमजोर ढलानों पर जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर NGT का संज्ञान हिमाचल के पहाड़ी विकास मॉडल पर एक महत्वपूर्ण बहस को सामने लाता है। एक तरफ राज्य की जलविद्युत क्षमता का इस्तेमाल आर्थिक और ऊर्जा जरूरतों के लिए किया जाना जरूरी है, तो दूसरी तरफ संवेदनशील पहाड़ी भूभाग, भूस्खलन के जोखिम और स्थानीय पर्यावरण की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। अब आठ सप्ताह में मांगा गया जवाब इस मामले में उपलब्ध तथ्यों और तकनीकी आकलनों को सामने लाएगा। इसके बाद ही पता चलेगा कि NGT इस मामले में आगे किस दिशा में कार्रवाई करता है।









