तमिलनाडु में मतदाता सूची से 97.37 लाख नाम हटाए जाने के मामले में डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसदीय कार्रवाई शुरू करने और मतदाता सूची में हुए बदलावों की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट की राय लेने का अनुरोध किया है।
चेन्नई: तमिलनाडु में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद फिर तेज हो गया है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। स्टालिन का आरोप है कि 2025 में हुई SIR प्रक्रिया के दौरान राज्य की मतदाता सूची से 97,37,832 नाम हटाए गए और इनमें बड़ी संख्या में योग्य मतदाता भी शामिल थे। उन्होंने राष्ट्रपति से इस मामले को संसद के दोनों सदनों के सामने रखने और सुप्रीम कोर्ट की राय लेने की अपील की है।
राष्ट्रपति मुर्मू से स्टालिन ने क्या मांग की?
स्टालिन ने 26 अक्टूबर को राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन तैयार किया था। इसकी जानकारी बुधवार, 28 अक्टूबर को सामने आई। डीएमके प्रतिनिधिमंडल को राष्ट्रपति से मुलाकात का समय नहीं मिलने पर ज्ञापन ईमेल के जरिए भेजा गया। पत्र में स्टालिन ने संविधान के अनुच्छेद 86(2) का हवाला दिया। इसके तहत राष्ट्रपति संसद के किसी एक या दोनों सदनों को संदेश भेज सकती हैं।
डीएमके प्रमुख चाहते हैं कि राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संसद के सामने रखें, ताकि उन पर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत विचार किया जा सके। इसके अलावा उन्होंने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेने का अनुरोध भी किया है।
97.37 लाख वोटरों के नाम हटने पर उठाए सवाल
स्टालिन ने तमिलनाडु में 2025 के दौरान हुई SIR प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम भी हटाए गए, जो मतदान के योग्य थे। स्टालिन ने मांग की है कि 97.37 लाख मतदाता प्रविष्टियों को मसौदा सूची से बाहर करने की कानूनी वैधता की जांच होनी चाहिए।
यह संख्या SIR के दौरान मसौदा मतदाता सूची से बाहर हुई प्रविष्टियों से जुड़ी है। इसे बिना अलग जांच के इतने ही वास्तविक और योग्य मतदाताओं के मतदान अधिकार छिनने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति का भी किया जिक्र
राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में स्टालिन ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि दो चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए जाने पर आपत्ति जताई थी। स्टालिन के अनुसार, इन फैसलों को अनधिकृत और गैरकानूनी बताया गया था।
डीएमके अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य सदस्यों की राय को नजरअंदाज करते हुए एकतरफा फैसले लिए। उनका कहना है कि यदि चुनाव आयोग के भीतर ही फैसलों को लेकर ऐसी असहमति है, तो संस्था के कामकाज की स्वतंत्र समीक्षा जरूरी है। हालांकि, ये स्टालिन के आरोप और उनके पत्र में दिए गए तर्क हैं। संबंधित फैसलों की वैधता पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायिक या संवैधानिक प्रक्रिया से ही होगा।
पुराने वोटरों की सूची बहाल करने की मांग
स्टालिन ने राष्ट्रपति से अपील की कि तमिलनाडु में SIR के बाद तैयार मतदाता सूची का इस्तेमाल आगामी चुनावों और उपचुनावों में नहीं किया जाए। उन्होंने मांग की कि नई सूची की वैधता स्पष्ट होने तक SIR से पहले वाली मतदाता सूची बहाल की जाए। डीएमके प्रमुख ने केवल तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि देशभर में SIR प्रक्रिया रद्द करने की मांग भी की है।
उनका कहना है कि मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण कानून के मुताबिक होना चाहिए और नाम हटाए जाने से पहले संबंधित व्यक्ति को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।
चुनाव आयोग के डिजिटल सिस्टम की जांच की मांग
राष्ट्रपति को भेजे गए ज्ञापन में स्टालिन ने चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET और ERONET की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच कराने का भी सुझाव दिया है।
उन्होंने मांग की कि मतदाता सूची में हुए बदलावों, डिजिटल रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के फैसलों की समीक्षा ऐसे विशेषज्ञों से कराई जाए, जो चुनाव आयोग के नियंत्रण में न हों।
इसके साथ ही स्टालिन ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने और तब तक सभी VVPAT पर्चियों की गिनती कराने की मांग भी रखी है।
चुनाव नतीजों पर भी उठाए सवाल
स्टालिन ने आरोप लगाया कि तमिलनाडु में जिन विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए, वहां चुनाव परिणामों पर असर पड़ा हो सकता है। उन्होंने अपनी कोलाथुर विधानसभा सीट का भी जिक्र किया, जहां SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता प्रविष्टियां हटाई गई थीं।
उनका दावा है कि इस प्रक्रिया से डीएमके के परंपरागत समर्थन वाले क्षेत्रों को नुकसान हुआ। हालांकि, केवल मतदाताओं के नाम हटने और चुनाव परिणामों के बीच संख्यात्मक संबंध से चुनावी गड़बड़ी साबित नहीं होती। इसके लिए विस्तृत और स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।
अब आगे क्या हो सकता है?
स्टालिन के ज्ञापन के बाद राष्ट्रपति सचिवालय और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं के अगले कदम पर नजर रहेगी।मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संविधान में विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। केवल राजनीतिक दल की मांग या राष्ट्रपति को पत्र भेजने से मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता।
फिलहाल स्टालिन की मांगों पर राष्ट्रपति की ओर से किसी नई कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।








