उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरी के लिए चरित्र सत्यापन की नई नीति लागू की है। हिंसक गतिविधियों और गंभीर अपराधों से जुड़े अभ्यर्थियों की नियुक्ति रुक सकती है। हालांकि, केवल FIR दर्ज होने से कोई उम्मीदवार अयोग्य नहीं होगा।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भर्ती से जुड़े नियम बदल गए हैं। योगी सरकार ने 28 अक्टूबर 2026 को चरित्र सत्यापन की नई नीति जारी की है। इसके तहत हिंसा के जरिए व्यवस्था बदलने का उद्देश्य रखने वाले संगठनों से जुड़े लोगों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जा सकता है। वहीं, सामान्य पदों पर चयनित अभ्यर्थियों को सत्यापन पूरा होने से पहले भी अस्थायी नियुक्ति पत्र मिल सकेगा।
हिंसा के जरिए व्यवस्था बदलने की गतिविधियों में शामिल लोगों पर सख्ती
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी विभागों में सीधी भर्ती के लिए चरित्र और पिछले रिकॉर्ड की जांच के नियमों में बदलाव किया है। नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने बुधवार को नई नीति से संबंधित शासनादेश जारी किया। इसमें स्पष्ट किया गया है कि सरकारी नौकरी के लिए चयन होने के बाद अभ्यर्थी के आपराधिक रिकॉर्ड और अन्य जरूरी जानकारियों की जांच की जाएगी।
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नई नीति में ऐसे संगठनों से जुड़े लोगों के लिए विशेष प्रावधान किया गया है, जिनका घोषित उद्देश्य हिंसक तरीकों से मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करना है। यदि किसी अभ्यर्थी के ऐसे संगठन की गतिविधियों में शामिल होने के प्रमाण मिलते हैं, तो उसकी सरकारी नौकरी प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा या केवल विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर उसे नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। सिर्फ FIR दर्ज होने या पुलिस जांच लंबित रहने से भी सरकारी नौकरी का रास्ता अपने आप बंद नहीं होगा। संबंधित मामले के तथ्य और निर्धारित कानूनी शर्तों के आधार पर ही फैसला लिया जाएगा।
नियमों के अनुसार, यदि किसी अभ्यर्थी ने 21 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद सत्यापन से पहले के तीन वर्षों में ऐसी हिंसक गतिविधियों में हिस्सा लिया है, तो इसे जांच में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। हालांकि, इस दौरान उसके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव के ठोस प्रमाण मिलने पर उन पर भी विचार किया जा सकेगा।
हत्या, पेपर लीक और साइबर ठगी जैसे मामलों में भी नौकरी पर असर
नई नीति में गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। हत्या, बलवा, फिरौती के लिए अपहरण, दुष्कर्म, दहेज हत्या और पॉक्सो कानून से संबंधित निर्धारित मामलों में दोषी ठहराए जाने या सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय होने पर अभ्यर्थी को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य माना जा सकता है।
सरकारी भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी करने वालों पर भी सख्ती की गई है। प्रश्नपत्र लीक करने वाले गिरोह, सॉल्वर गैंग, दूसरे उम्मीदवार की जगह परीक्षा देने वाले और फर्जी प्रमाणपत्र तैयार कराने वाले लोगों को भी निर्धारित नियमों के तहत नौकरी से वंचित किया जा सकता है।
इसके अलावा डिजिटल अरेस्ट, यूपीआई के जरिए धोखाधड़ी और दूसरे साइबर अपराधों में शामिल लोगों पर भी यह व्यवस्था लागू होगी। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, धनशोधन निवारण अधिनियम और गैंगस्टर एक्ट से संबंधित मामलों को भी नीति में शामिल किया गया है।
हालांकि, प्रत्येक मामले में सिर्फ आरोप लगने को दोष साबित होना नहीं माना जाएगा। नियुक्ति से जुड़ा निर्णय अपराध की श्रेणी, न्यायिक स्थिति और शासनादेश में निर्धारित शर्तों के आधार पर होगा।
चरित्र सत्यापन पूरा होने से पहले भी मिल सकेगा नियुक्ति पत्र
सरकार ने भर्ती प्रक्रिया में देरी कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब सामान्य सरकारी पदों पर चयनित उम्मीदवारों को चरित्र सत्यापन की रिपोर्ट आने से पहले प्रोविजनल नियुक्ति पत्र दिया जा सकेगा। इसके लिए अभ्यर्थी को निर्धारित दस्तावेज और स्वघोषणा पत्र जमा करना होगा।
इस नियुक्ति पत्र में साफ बताया जाएगा कि यदि बाद में सत्यापन के दौरान कोई ऐसी जानकारी सामने आती है, जिससे उम्मीदवार अयोग्य साबित होता है, तो उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है। गलत जानकारी देने या जरूरी तथ्य छिपाने पर कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
हालांकि, सुरक्षा और दूसरे संवेदनशील पदों पर नियुक्ति से पहले विस्तृत जांच जरूरी होगी। पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों का दोबारा चरित्र सत्यापन अनिवार्य नहीं किया गया है। जरूरत पड़ने पर संबंधित विभाग से उनके पुराने सेवा रिकॉर्ड की जानकारी ली जा सकेगी।
नई व्यवस्था केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं है। निगमों, परिषदों, शैक्षणिक संस्थानों, स्वायत्त निकायों, सरकारी उपक्रमों, पंचायतों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती से होने वाली नियुक्तियों पर भी यह लागू होगी। पहले से लंबित सत्यापन मामलों का निपटारा भी नई नीति के आधार पर किया जाएगा।
पुलिस को 30 दिन में देनी होगी रिपोर्ट, अभ्यर्थी को मिलेगा सफाई का मौका
चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया के लिए भी समय सीमा तय की गई है। जिला पुलिस और स्थानीय अभिसूचना इकाई को अनुरोध मिलने के 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट देनी होगी। रिपोर्ट में देरी होने की स्थिति में गृह विभाग इसकी निगरानी करेगा।
सामान्य मामलों में पुलिस उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर जांच करेगी। इसके लिए अभ्यर्थी को थाने बुलाना या उसके घर जाकर पूछताछ करना जरूरी नहीं होगा। विशेष परिस्थितियों में आवश्यक जांच कराई जा सकेगी।
यदि पुलिस रिपोर्ट में कोई प्रतिकूल जानकारी मिलती है, तो जिलाधिकारी संबंधित उम्मीदवार को अपना पक्ष रखने का अवसर देंगे। अभ्यर्थी ऑनलाइन या व्यक्तिगत रूप से अपनी सफाई दे सकेगा। इसके बाद उपलब्ध रिकॉर्ड और संबंधित तथ्यों के आधार पर नियुक्ति प्राधिकारी को रिपोर्ट भेजी जाएगी।
अभ्यर्थियों को आवेदन और स्वघोषणा पत्र में गिरफ्तारी, आपराधिक मुकदमे, अभियोजन और अदालत से दोषी ठहराए जाने जैसी जानकारी देनी होगी। पिछली सरकारी सेवा से बर्खास्तगी या भर्ती परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के कारण लगाए गए प्रतिबंध का विवरण भी देना होगा।
यदि किसी उम्मीदवार ने शुरुआती आवेदन में कोई जानकारी नहीं दी, लेकिन बाद में चिकित्सा परीक्षण या सत्यापन के दौरान लिखित रूप में सही विवरण दे दिया, तो केवल शुरुआती चूक के आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द करना जरूरी नहीं होगा। मामले का निर्णय नीति में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा।
नई व्यवस्था का असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ेगा, जो उत्तर प्रदेश में सरकारी विभागों या संबंधित संस्थानों की सीधी भर्ती में चयनित होते हैं। इसलिए उम्मीदवारों के लिए जरूरी है कि वे आवेदन में अपने पिछले रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी सही भरें और सत्यापन के दौरान मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध कराएं।









