मणिपुर: पांच दिनों से बंद नेशनल हाईवे-2, हजारों लोग प्रभावित; अपहरण और हिंसा के विरोध में बढ़ा तनाव

मणिपुर में नेशनल हाईवे-2 पांच दिन से बंद है। 1000 से ज्यादा वाहन फंसे हैं, ईंधन संकट गहरा गया है और बंधकों की रिहाई को लेकर विरोध जारी है। जातीय तनाव जारी है

मणिपुर में नेशनल हाईवे-2 पांच दिनों से बंद होने के कारण 1000 से अधिक ट्रक और वाहन फंसे हुए हैं। कुकी नागरिकों के अपहरण और पादरियों की हत्या के विरोध में जारी बंद से ईंधन संकट बढ़ गया है, जबकि सुरक्षा बल बंधकों की तलाश में अभियान चला रहे हैं।

इम्फाल: पूर्वोत्तर भारत का संवेदनशील राज्य मणिपुर एक बार फिर गंभीर सामाजिक और मानवीय संकट का सामना कर रहा है। राज्य की जीवनरेखा माने जाने वाले नेशनल हाईवे-2 (NH-2) के पिछले पांच दिनों से बंद रहने के कारण सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस बंद के चलते 1000 से अधिक ट्रक, बसें और अन्य वाहन सड़क पर फंसे हुए हैं, जबकि हजारों लोग भोजन, ईंधन और जरूरी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

यह विरोध प्रदर्शन कथित तौर पर कुकी समुदाय के 14 नागरिकों के अपहरण और चर्च से जुड़े पादरियों की हत्या के खिलाफ किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकार अब तक स्थिति को नियंत्रित करने और बंधकों की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने में विफल रही है।

हाईवे बंद होने से सप्लाई चेन प्रभावित

नेशनल हाईवे-2 मणिपुर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है। इस हाईवे के बंद होने से राज्य की सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ा है। सेनापति जिले के खोंग्नेम से टी. खुल्लेन तक लंबी कतारों में खड़े ट्रकों और बसों में चालक एवं यात्री फंसे हुए हैं।

कई ट्रक चालक खुले आसमान के नीचे रात बिताने को मजबूर हैं। मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने की वजह से वे अपने परिवारों से संपर्क भी नहीं कर पा रहे। कई लोगों के पास खाने-पीने का सामान खत्म हो चुका है, जबकि स्थानीय बाजारों में जरूरी वस्तुएं महंगी दरों पर मिल रही हैं।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई वाहन चालकों को भूखे-प्यासे रहना पड़ रहा है। स्थानीय प्रशासन द्वारा राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिशें की गई हैं, लेकिन वे अभी पर्याप्त नहीं मानी जा रही हैं।

ईंधन संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

हाईवे बंद होने का असर राज्य की ईंधन आपूर्ति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। सैकड़ों पेट्रोल और एलपीजी टैंकर रास्ते में फंसे हुए हैं, जिसके चलते कई पेट्रोल पंपों पर ईंधन खत्म हो गया है।

मालोम तेल डिपो में स्टॉक मौजूद होने के बावजूद परिवहन बाधित होने से सप्लाई प्रभावित हो रही है। ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने कम लोडिंग शुल्क और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर भी नाराजगी जताई है। इससे राज्य में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की किल्लत बढ़ने लगी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो मणिपुर में आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी और कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

चर्च संगठनों की शांति पहल

बढ़ते तनाव के बीच चर्च और सामाजिक संगठनों ने शांति बहाली की कोशिशें तेज कर दी हैं। काउंसिल फॉर बैपटिस्ट चर्चेस इन नॉर्थ ईस्ट इंडिया (CBCNEI) और मणिपुर बैपटिस्ट कन्वेंशन (MBC) के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह से मुलाकात कर स्थिति पर चिंता जताई।

प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि चर्च की दो टीमें नागा और कुकी समुदायों के बीच संवाद और विश्वास बहाली के लिए कांगपोकपी और सेनापति जिलों का दौरा करेंगी। इन संगठनों का मानना है कि बातचीत और सामुदायिक सहयोग ही हिंसा और तनाव को कम करने का सबसे प्रभावी रास्ता है।

अपहरण और हिंसा के बाद बढ़ा तनाव

मणिपुर में हालिया तनाव 13 मई को हुई हिंसक घटनाओं के बाद और बढ़ गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांगपोकपी जिले में तीन चर्च नेताओं की हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा नोनी जिले में एक आम नागरिक की गोली मारकर हत्या की गई और उसकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गई।

इन घटनाओं के बाद दोनों समुदायों के कुल 38 लोगों के अपहरण की खबर सामने आई। हालांकि बाद में 31 लोगों को रिहा कर दिया गया, लेकिन अभी भी कई लोग लापता बताए जा रहे हैं।

कुकी समुदाय के संगठन “कुकी इनपी मणिपुर” ने दावा किया है कि उनके 14 सदस्य अब भी हथियारबंद समूहों की कैद में हैं। दूसरी ओर, कुछ रिपोर्ट्स में छह नागा नागरिकों के भी बंधक बने होने की बात कही गई है।

सुरक्षा बलों का सर्च ऑपरेशन जारी

बंधकों की तलाश और हालात पर नियंत्रण के लिए सुरक्षा बलों ने कांगपोकपी जिले के कई संवेदनशील इलाकों में बड़े स्तर पर तलाशी अभियान शुरू किया है। लेइलोन वाइफेई और खाराम वाइफेई गांवों के आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य बंधकों को सुरक्षित छुड़ाना और क्षेत्र में शांति बहाल करना है। हालांकि पहाड़ी और दुर्गम इलाकों के कारण अभियान में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

मणिपुर में लंबे समय से जारी जातीय तनाव

मणिपुर पिछले कई वर्षों से जातीय और सामुदायिक तनाव का केंद्र बना हुआ है। राज्य में मैतेई, कुकी और नागा समुदायों के बीच भूमि अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सुरक्षा को लेकर विवाद समय-समय पर हिंसक रूप ले लेते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह लंबे समय से चले आ रहे सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का परिणाम हैं। यदि सरकार और समुदायों के बीच भरोसे का माहौल नहीं बना, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

केंद्र और राज्य सरकार पर बढ़ा दबाव

नेशनल हाईवे बंद होने, बंधक संकट और बढ़ती हिंसा के बीच केंद्र और राज्य सरकार दोनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय नागरिक समूहों ने सरकार से तुरंत हस्तक्षेप कर शांति बहाल करने की मांग की है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मणिपुर में स्थायी समाधान केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से संभव नहीं होगा। इसके लिए राजनीतिक संवाद, सामुदायिक भागीदारी और विश्वास बहाली की दीर्घकालिक रणनीति जरूरी होगी।

फिलहाल पूरे राज्य की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार बंधकों को सुरक्षित छुड़ाने और हाईवे को फिर से खोलने में कितनी जल्दी सफल होती है।

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