नेपाल: बंदरों से फसलों की रक्षा के लिए 2 दिन का सार्वजनिक अवकाश, प्रशासन करेगा विशेष अभियान

नेपाल के तेहरथुम जिले मे बंदरो से फसल बचाने के लिए 2 दिन की छुट्टी घोषित की गई। स्थानीय लोग सामूहिक अभियान चलाकर फसलो को नुकसान पहुंचाने वाले बंदरों को भगाएंगे।

नेपाल के तेहरथुम जिले की लालिगुरास नगरपालिका में बंदरों के आतंक से फसलें बर्बाद हो रही हैं। प्रशासन ने 2 दिन की छुट्टी घोषित कर सामूहिक अभियान शुरू किया है, जिसमें लोग मिलकर बंदरों को खेतों और गांवों से भगाएंगे।

काठमांडू: नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में वन्यजीव और मानव संघर्ष का एक अनोखा मामला सामने आया है, जहां बंदरों के झुंड किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह समस्या खास तौर पर तेहरथुम जिला के लालिगुरास नगरपालिका में गंभीर रूप ले चुकी है।

स्थानीय प्रशासन के अनुसार रीसस मकाक (रातो बंदर) प्रजाति के बंदर लगातार मक्का, आलू, कोदो, फल और सब्जियों की फसलों को नष्ट कर रहे हैं, जिससे किसानों की आजीविका पर सीधा असर पड़ रहा है।

15 मई को सार्वजनिक अवकाश, सामूहिक अभियान का निर्णय

इस समस्या से निपटने के लिए लालिगुरास नगरपालिका ने एक असामान्य लेकिन सामूहिक समाधान अपनाया है। प्रशासन ने 15 मई को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है, ताकि सभी स्थानीय लोग मिलकर बंदरों को खेतों और बस्तियों से भगाने के अभियान में शामिल हो सकें।

इसके साथ ही 16 मई को भी विशेष अभियान चलाने की योजना बनाई गई है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में संगठित तरीके से बंदरों को दूर जंगल की ओर खदेड़ने का प्रयास किया जाएगा।

“दो दिन की छुट्टी लो और बंदर भगाओ” अभियान

नगरपालिका की इस पहल को स्थानीय स्तर पर “दो दिन की छुट्टी लो और बंदर भगाओ” अभियान कहा जा रहा है। प्रशासन का मानना है कि जब पूरा समुदाय एक साथ इस समस्या में शामिल होगा, तो इसका प्रभाव अधिक होगा।

अर्जुन माबुहांग ने कहा कि बंदरों की समस्या को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, लेकिन अब यह किसानों और बच्चों दोनों के लिए गंभीर संकट बन चुकी है।

किसानों की बढ़ती परेशानी

स्थानीय किसानों का कहना है कि बंदरों के झुंड रात-दिन खेतों में घुसकर फसलें बर्बाद कर रहे हैं। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई किसान रातभर खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं।

कुछ क्षेत्रों में बच्चों को भी परिवार के साथ खेतों की सुरक्षा में मदद करनी पड़ रही है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

प्रभावित इलाकों में निगरानी और चौकियां

नगरपालिका ने सबसे अधिक प्रभावित वार्डों में अस्थायी चौकियां और निगरानी दल तैनात किए हैं। वार्ड-8 के मेघा, नागेश्वरी और सिंहाथाप जैसे इलाकों में कर्मचारी लगातार गश्त कर रहे हैं और बंदरों को भगाने का काम कर रहे हैं।

प्रशासन का कहना है कि यह एक अस्थायी समाधान है, जबकि दीर्घकालिक रणनीति पर भी काम किया जा रहा है।

दीर्घकालिक समाधान की मांग

मेयर अर्जुन माबुहांग ने नेपाल सरकार से इस समस्या को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से लेने की अपील की है। उनका कहना है कि केवल स्थानीय प्रशासन के प्रयास पर्याप्त नहीं हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि सामुदायिक जंगलों में अमरूद, नाशपाती और अन्य फलदार पेड़ लगाए जाएं, ताकि बंदरों को जंगल में ही पर्याप्त भोजन मिल सके और वे बस्तियों की ओर न आएं।

धार्मिक मान्यताओं के कारण चुनौती

नेपाल और भारत के कई हिस्सों में बंदरों को धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है, विशेष रूप से हिंदू धर्म में उन्हें भगवान हनुमान का प्रतीक माना जाता है। इसी कारण इन पर कठोर नियंत्रण उपाय अपनाना सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यही कारण है कि नसबंदी, पकड़ने या हटाने जैसे उपायों के बावजूद इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

विशेषज्ञों की राय

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की कमी और मानव बस्तियों का विस्तार बंदरों को भोजन की तलाश में गांवों और खेतों की ओर धकेल रहा है। यह मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक बढ़ता हुआ उदाहरण है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए आवासीय वन प्रबंधन, फसल सुरक्षा तकनीक और सामुदायिक भागीदारी जरूरी है।

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