हरिद्वार का ऐतिहासिक ऋषिकुल परिसर आने वाले समय में आयुर्वेद, योग, भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन विज्ञान और आधुनिक शोध के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। उत्तराखंड सरकार की योजना के तहत ऋषिकुल स्थित श्री मदन मोहन मालवीय प्राच्य शोध संस्थान को नई पहचान देने की तैयारी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मई 2026 में सचिवालय में हुई उच्चस्तरीय बैठक में संस्थान के विकास और विस्तार की योजनाओं की समीक्षा की थी। सरकार का उद्देश्य इसे केवल एक शैक्षणिक संस्थान तक सीमित रखना नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करना है।
प्रस्तावित स्वरूप में ऋषिकुल में एक तरफ भारतीय परंपरा और प्राचीन ज्ञान की झलक दिखाई देगी, तो दूसरी तरफ यहां आधुनिक शोध प्रयोगशालाएं, डिजिटल पांडुलिपि संरक्षण केंद्र, आधुनिक पुस्तकालय, संगोष्ठी केंद्र और ई-लर्निंग जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। यानी परिसर का वातावरण भारतीय परंपरा से जुड़ा हुआ होगा, लेकिन शिक्षा और शोध के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक और सुविधाएं आधुनिक होंगी। सरकार की मंशा है कि पुरानी ज्ञान परंपराओं को केवल किताबों और पांडुलिपियों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनका व्यवस्थित अध्ययन, संरक्षण और आधुनिक संदर्भों में शोध किया जाए।
इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य से जुड़ा होगा। ऋषिकुल पहले से ही आयुर्वेदिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जाना जाता है। ऋषिकुल सरकारी पीजी आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल हरिद्वार में संचालित है और यहां आयुर्वेद की शिक्षा के साथ मरीजों को चिकित्सा सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। संस्थान की मौजूदा वेबसाइट के अनुसार यहां 210 बेड वाला अस्पताल, ऑपरेशन थिएटर, रेडियोलॉजी और पैथोलॉजी जैसी सुविधाएं मौजूद हैं।
ऐसे में प्रस्तावित विकास से ऋषिकुल की मौजूदा पहचान को और व्यापक स्वरूप देने की कोशिश की जा रही है। आयुर्वेद के साथ योग, ध्यान, भारतीय चिकित्सा पद्धतियों और समग्र स्वास्थ्य को जोड़कर इसे देश-विदेश के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाने पर जोर है। मेडिकल टूरिज्म की संभावनाओं को भी इसी व्यापक सोच से देखा जा रहा है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में इलाज या स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के लिए हरिद्वार आने वाले लोगों को चिकित्सा सुविधाओं के साथ भारतीय स्वास्थ्य परंपरा, योग और जीवनशैली से जुड़े अनुभव भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
ऋषिकुल को भारतीय ज्ञान परंपरा का केंद्र बनाने की योजना में सिर्फ आयुर्वेद और योग ही नहीं, बल्कि ज्योतिष, वैदिक गणित, वेद, उपनिषद, भारतीय दर्शन, तर्कशास्त्र और पारंपरिक विज्ञान जैसी विधाओं को भी शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री की बैठक में वैदिक गणित, वेदों में निहित विज्ञान, उपनिषदों के दर्शन, भारतीय तर्कशास्त्र और पर्यावरण विज्ञान से जुड़े अध्ययन और शोध की आधुनिक व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया।
प्रस्तावित परिसर को अलग-अलग ज्ञान क्षेत्रों के आधार पर विकसित करने की योजना है। इसमें श्रुति केंद्र में वेद, उपनिषद और शास्त्रीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन की व्यवस्था होगी। दर्शन केंद्र भारतीय दर्शन और चेतना से जुड़े विषयों के गहन अध्ययन के लिए विकसित किया जाएगा। आयु केंद्र में आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य विज्ञान को स्थान मिलेगा। विज्ञान केंद्र में भारतीय ज्ञान प्रणालियों और पारंपरिक विज्ञान की विरासत पर काम होगा, जबकि कला केंद्र भारतीय कला, संस्कृति और सौंदर्य परंपरा को प्रदर्शित करने और समझने का माध्यम बनेगा।
सरकार की योजना में यह भी महत्वपूर्ण है कि ऋषिकुल को केवल अतीत की चीजों को प्रदर्शित करने वाला परिसर न बनाया जाए। यहां प्राचीन ज्ञान को आधुनिक शोध पद्धतियों के साथ जोड़ने की कोशिश होगी। उदाहरण के तौर पर वैदिक गणित और भारतीय गणितीय परंपरा से जुड़े विषयों का अध्ययन आधुनिक शैक्षणिक पद्धति से किया जा सकता है। इसी तरह पारंपरिक जल प्रबंधन, जैविक खेती, मौसम आधारित कृषि ज्ञान और धातु विज्ञान जैसे विषयों को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर शोध किए जाने की बात कही गई है।
डिजिटल पांडुलिपि संरक्षण केंद्र इस योजना का एक अहम हिस्सा होगा। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़ी बड़ी संख्या में पांडुलिपियां अलग-अलग संस्थानों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में मौजूद हैं। समय के साथ इन दस्तावेजों के खराब होने का खतरा भी रहता है। ऐसे में डिजिटल संरक्षण के जरिए पुरानी सामग्री को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा सकता है। ऋषिकुल में प्रस्तावित यह व्यवस्था भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े शोध को एक नया आधार दे सकती है।
आधुनिक पुस्तकालय और ई-लर्निंग सुविधाएं भी प्रस्तावित विकास का हिस्सा हैं। इससे देश के अलग-अलग हिस्सों के विद्यार्थी और शोधार्थी ऋषिकुल में उपलब्ध सामग्री का अध्ययन कर सकेंगे। डिजिटल माध्यम के विस्तार से शोध सामग्री तक पहुंच केवल परिसर तक सीमित नहीं रहेगी। भविष्य में ऑनलाइन पाठ्यक्रम, व्याख्यान, शोध सामग्री और डिजिटल अभिलेख जैसी सुविधाएं विकसित होने पर इस संस्थान की पहुंच अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बढ़ सकती है।
योग और ध्यान को भी इस केंद्र की पहचान का प्रमुख हिस्सा बनाया जाएगा। हरिद्वार पहले से ही धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र है। ऋषिकुल को योग, ध्यान, आयुर्वेद और भारतीय अध्यात्म से जोड़कर विकसित करने से यहां आने वाले पर्यटकों के लिए एक नया ज्ञान और स्वास्थ्य आधारित अनुभव तैयार किया जा सकता है। सरकार की बैठक में संस्थान को पर्यटन, आयुर्वेद, ज्योतिष और योग शिक्षा के रूप में विकसित करने पर विचार किया गया था।
इससे मेडिकल टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है। देश के दूसरे राज्यों और विदेशों से आने वाले लोग केवल उपचार के लिए ही नहीं, बल्कि योग, आयुर्वेदिक जीवनशैली, ध्यान और भारतीय स्वास्थ्य पद्धतियों को समझने के लिए भी हरिद्वार पहुंच सकते हैं। यदि योजना के अनुसार सुविधाएं विकसित होती हैं तो ऋषिकुल ऐसे लोगों के लिए शिक्षा, उपचार और अनुभव का संयुक्त केंद्र बन सकता है।
ऋषिकुल के प्रस्तावित स्वरूप में भारतीय स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत की झलक देने पर भी जोर है। मुख्यमंत्री ने विकास के साथ विरासत के संरक्षण को प्राथमिकता देने और परिसर में राज्य के सभी जिलों की लोक कलाओं से जुड़ी गतिविधियों को शामिल करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य यह है कि नया निर्माण पूरी तरह आधुनिक कॉरपोरेट परिसर जैसा न दिखे, बल्कि वहां पहुंचने वाले लोगों को उत्तराखंड और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का अनुभव भी हो।
उत्तराखंड सरकार की सोच में यह परियोजना कुंभ 2027 से भी जुड़ी हुई है। अधिकारियों को संस्थान के विकास का काम जल्द शुरू करने और कुंभ से पहले इसे पूरा करने के निर्देश दिए गए थे। इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि कुंभ के दौरान हरिद्वार में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे में विकसित ऋषिकुल परिसर भारतीय ज्ञान, संस्कृति, योग और आयुर्वेद से जुड़े कार्यक्रमों के लिए महत्वपूर्ण स्थान बन सकता है।
ऋषिकुल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी इस योजना को खास बनाती है। उपलब्ध संस्थागत जानकारी के अनुसार ऋषिकुल परिसर की स्थापना 1919 में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा और मार्गदर्शन से जुड़ी है। आज भी परिसर आयुर्वेदिक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा हुआ है। प्रस्तावित मदन मोहन मालवीय प्राच्य शोध संस्थान इसी विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में देखा जा रहा है।
सरकार की योजना में शिक्षा के साथ संस्कार और राष्ट्र निर्माण को भी महत्वपूर्ण उद्देश्य बताया गया है। इसका अर्थ है कि संस्थान में भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन को केवल अकादमिक विषय के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि जीवन मूल्यों, अनुशासन, कर्तव्यबोध और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश होगी। वेदों और उपनिषदों में मौजूद नैतिक शिक्षाओं और भारतीय दर्शन से जुड़े विचारों को आधुनिक समाज के संदर्भ में समझने और अध्ययन करने पर जोर दिया जाएगा।
परियोजना को पांच प्रमुख केंद्रों के जरिए विकसित करने की योजना भी इसी व्यापक दृष्टिकोण को दिखाती है। श्रुति, दर्शन, आयु, विज्ञान और कला केंद्र मिलकर भारतीय ज्ञान की अलग-अलग धाराओं को एक ही परिसर में जोड़ेंगे। इससे विद्यार्थियों और शोधार्थियों को एक ऐसा वातावरण मिल सकता है जहां चिकित्सा, दर्शन, गणित, विज्ञान, भाषा, संस्कृति और कला जैसे विषयों का एक-दूसरे से संबंध समझने का अवसर मिलेगा।
सरकार ने परियोजना की निगरानी को लेकर भी अधिकारियों को नियमित समीक्षा के निर्देश दिए हैं। प्रमुख सचिव आरके सुधांशु समेत कई वरिष्ठ अधिकारी इस योजना से जुड़ी बैठक में मौजूद रहे थे। हरिद्वार के जिलाधिकारी मयूर दीक्षित भी वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल हुए थे। इससे संकेत मिलता है कि परियोजना को कई विभागों के समन्वय से आगे बढ़ाने की तैयारी है।
ऋषिकुल के विकास का असर हरिद्वार के पर्यटन क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए गंगा, धार्मिक स्थलों और आश्रमों के अलावा भारतीय ज्ञान, आयुर्वेद और योग से जुड़ा एक नया आकर्षण विकसित हो सकता है। यदि शोध संस्थान में नियमित सेमिनार, प्रशिक्षण, प्रदर्शनियां और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम आयोजित होते हैं तो हरिद्वार की पहचान केवल धार्मिक पर्यटन तक सीमित न रहकर ज्ञान और वेलनेस पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में भी मजबूत हो सकती है।
हालांकि अभी इसे प्रस्तावित विकास योजना के रूप में ही देखा जाना चाहिए। विभिन्न सुविधाओं, केंद्रों और शोध गतिविधियों का वास्तविक स्वरूप निर्माण और क्रियान्वयन के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगा। सरकार ने योजना को आगे बढ़ाने और कुंभ 2027 से पहले काम पूरा करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन हर प्रस्तावित सुविधा कब और किस रूप में पूरी तरह संचालन में आएगी, इसकी विस्तृत समयसीमा अभी अलग-अलग स्तर पर तय होनी बाकी है।
कुल मिलाकर हरिद्वार का ऋषिकुल आने वाले वर्षों में एक ऐसे परिसर के रूप में विकसित करने की तैयारी है जहां भारतीय परंपरा और आधुनिक तकनीक साथ-साथ दिखाई देगी। यहां आयुर्वेद और योग से लेकर ज्योतिष, वैदिक गणित, वेद, उपनिषद, दर्शन, पारंपरिक विज्ञान और भारतीय कला तक के अध्ययन और शोध को स्थान देने की योजना है। डिजिटल पांडुलिपि संरक्षण, आधुनिक पुस्तकालय, शोध प्रयोगशालाएं, ई-लर्निंग और संगोष्ठी केंद्र जैसी सुविधाएं इसे आधुनिक शैक्षणिक ढांचे से जोड़ेंगी। दूसरी तरफ परिसर की वास्तुकला और सांस्कृतिक गतिविधियों में भारतीय परंपरा की झलक बनाए रखने पर जोर रहेगा। यदि योजना तय समय के अनुसार आगे बढ़ती है तो कुंभ 2027 से पहले ऋषिकुल को नई पहचान मिल सकती है और यह हरिद्वार के साथ-साथ उत्तराखंड के लिए भारतीय ज्ञान, आयुर्वेद, योग और संस्कृति का महत्वपूर्ण वैश्विक केंद्र बनने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।









