राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद अभिनेता संजय मिश्रा पहली बार अपने पैतृक गांव दरभंगा के नारायणपुर पहुंचे। मनीगाछी प्रखंड के इस गांव में उनका बेहद सादा और देसी अंदाज देखने को मिला। बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाने वाले संजय मिश्रा गांव में लुंगी और टी-शर्ट पहने नजर आए। गांव के दालान पर बच्चों और बुजुर्गों के बीच बैठे अभिनेता की तस्वीरें और उनका सहज अंदाज लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। उनकी सादगी ने एक बार फिर यह दिखाया कि बड़ी उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी उनका अपनी मिट्टी और गांव से गहरा जुड़ाव बना हुआ है।
संजय मिश्रा का दरभंगा जिले के मनीगाछी प्रखंड स्थित नारायणपुर गांव से पारिवारिक संबंध है। बचपन में घर के लोग उन्हें प्यार से ‘घूटन’ कहकर बुलाते थे। छोटे से गांव से जुड़ी उनकी पहचान आज हिंदी सिनेमा के बड़े कलाकारों में होती है। राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने के बाद अपने पैतृक गांव पहुंचना उनके परिवार और स्थानीय लोगों के लिए खुशी का अवसर बन गया। गांव के लोगों के बीच उनका साधारण पहनावा और अपनापन खास तौर पर चर्चा में रहा
संजय मिश्रा को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में फिल्म ‘भक्षक’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला है। गुजरात के एकता नगर में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें सम्मानित किया। फिल्म में उन्होंने भास्कर सिन्हा नाम के एक संवेदनशील और साहसी पत्रकार का किरदार निभाया। यह किरदार कहानी में सामाजिक सच्चाई को सामने लाने और जांच में सहयोग करने वाली भूमिका के रूप में दिखाई देता है। उनके अभिनय को इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली।
संजय मिश्रा की अभिनय यात्रा भी काफी दिलचस्प रही है। उनका बचपन पटना, वाराणसी और दिल्ली में बीता। शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने टेलीविजन और फिल्मों में काम करना शुरू किया। टीवी धारावाहिक ‘ऑफिस ऑफिस’ में शुक्ला जी के किरदार ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बनाया। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाकर दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया
‘आंखों देखी’, ‘मसान’, ‘वध’ और ‘भक्षक’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय की विविधता देखने को मिलती है। संजय मिश्रा की खासियत यह है कि वह हास्य भूमिकाओं के साथ गंभीर और भावनात्मक किरदारों को भी सहजता से निभाते हैं। उनके अभिनय में आम लोगों के जीवन, व्यवहार और भावनाओं की झलक दिखाई देती है। यही वजह है कि वह लंबे समय से हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं।
संजय मिश्रा के परिवार की पृष्ठभूमि भी उल्लेखनीय रही है। उनके पिता शंभुनाथ मिश्रा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से जुड़े थे और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनकी रुचि थी। उनके दादा जगदीप नारायण मिश्रा प्रशासनिक सेवा में रहे थे। परिवार के इसी परिवेश और बचपन में अलग-अलग शहरों में रहने के अनुभवों ने संजय मिश्रा के व्यक्तित्व को आकार देने में भूमिका निभाई। वाराणसी में बिताए समय के दौरान उन्होंने घाटों, रामलीला और साधु-संतों के हाव-भाव को करीब से देखा, जिनसे आगे चलकर उनके अभिनय को भी अनुभव मिला।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के बाद नारायणपुर पहुंचने पर संजय मिश्रा का लुंगी और टी-शर्ट वाला अंदाज उनकी उपलब्धि से अलग एक दूसरी वजह से चर्चा में रहा। आमतौर पर फिल्मी सितारों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में सजे-धजे रूप में देखा जाता है, लेकिन संजय मिश्रा अपने गांव में बिल्कुल सामान्य ग्रामीण परिवेश में दिखाई दिए। बच्चों और बुजुर्गों के बीच दालान पर बैठने का उनका अंदाज उनके सहज स्वभाव की झलक देता है।
उनकी इस उपलब्धि से नारायणपुर गांव और दरभंगा क्षेत्र के लोगों में गर्व का माहौल है। संजय मिश्रा की सफलता यह संदेश देती है कि प्रतिभा, मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर छोटे शहर या गांव से निकलकर भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। फिल्मी दुनिया में बड़ा मुकाम हासिल करने के बाद अपने पैतृक गांव पहुंचकर सादगी से समय बिताना उनके प्रशंसकों के लिए भी खास रहा।









