सरकार की ओर से कभी ‘आउटस्टैंडिंग’ और ‘वेरी गुड’ जैसी ग्रेडिंग पाने वाले एक अधिकारी को कुछ समय बाद ‘डेडवुड’ बताकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी गई। यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने सरकारी कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय व्यापार सेवा (Indian Trade Service) के अधिकारी एस. एस. दास को 2018 में दी गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि अधिकारी के लंबे और बेहतर सेवा रिकॉर्ड तथा उनकी हालिया पदोन्नति को देखते हुए उन्हें अचानक ‘डेडवुड’ बताकर सेवा से हटाना प्रथम दृष्टया विरोधाभासी था।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी अधिकारी को लगातार अच्छी ग्रेडिंग मिलने और उच्च पद पर पदोन्नति दिए जाने के बाद अचानक सार्वजनिक सेवा के लिए अनुपयुक्त बताना आपस में मेल नहीं खाता। अदालत ने सरकार को एस. एस. दास के सेवा लाभ बहाल करने और उन्हें कुल 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है।
2018 में दी गई थी अनिवार्य सेवानिवृत्ति
एस. एस. दास को 10 मई 2018 को फंडामेंटल रूल 56(जे) यानी FR 56(J) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी। उस समय उनकी सेवा के करीब पांच वर्ष अभी बाकी बताए गए थे। सरकार की कार्रवाई के बाद दास ने इसे चुनौती दी, लेकिन केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) और दिल्ली हाई कोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिली।
इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। शीर्ष अदालत ने मामले में उपलब्ध सेवा रिकॉर्ड और सरकार की कार्रवाई के क्रम का परीक्षण किया और अंततः अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले को रद्द कर दिया।
दशकों तक रहा बेहतर सेवा रिकॉर्ड
दास वर्ष 1989 में भारतीय व्यापार सेवा में शामिल हुए थे। उनके सेवा रिकॉर्ड के मुताबिक, 1994 के बाद लंबे समय तक उन्हें ‘आउटस्टैंडिंग’ और ‘वेरी गुड’ जैसी ग्रेडिंग मिलती रही। वर्ष 2014 में उन्हें एंटी-डंपिंग महानिदेशालय में अतिरिक्त निदेशक की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद फरवरी 2018 में उन्हें जॉइंट सेक्रेटरी स्तर पर नियमित पदोन्नति भी मिली।
अदालत के लिए यह तथ्य महत्वपूर्ण था, क्योंकि पदोन्नति का मतलब था कि हाल ही में संबंधित अधिकारी को अधिक जिम्मेदारी संभालने के योग्य माना गया था।
प्रमोशन के दो महीने बाद ‘डेडवुड’ बताने पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इस घटनाक्रम को सरकार के रुख में गंभीर विरोधाभास के तौर पर देखा। अदालत के अनुसार, यदि किसी अधिकारी को फरवरी में जॉइंट सेक्रेटरी स्तर पर पदोन्नत किया गया और केवल दो महीने बाद उसे ‘डेडवुड’ मानकर अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया गया, तो दोनों फैसलों के बीच तार्किक संबंध स्पष्ट नहीं होता।
पीठ ने प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी करते हुए संकेत दिया कि ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी को हटाने का निर्णय पहले लिया गया और उसके समर्थन में बाद में आधार तलाशे गए। अदालत ने इस तरह की कार्रवाई को उच्च पदों पर उपलब्ध प्रशासनिक शक्तियों के गंभीर दुरुपयोग से जोड़ा।
दास को मिलेगा 15 लाख रुपये का मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने एस. एस. दास को उनके सेवा लाभ बहाल करने का आदेश दिया है। इसमें परिस्थितियों के अनुसार जूनियर अधिकारियों की पदोन्नति के आधार पर उन्हें नॉशनल प्रमोशन का लाभ देने पर भी विचार शामिल है। इसके अलावा सरकार को कुल 15 लाख रुपये का भुगतान करना होगा। इसमें 6 लाख रुपये मुकदमे की लागत और 9 लाख रुपये प्रतिष्ठा तथा अन्य नुकसान के लिए निर्धारित किए गए हैं।
अदालत ने डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) को भी निर्देश दिया कि दास को कार्यालय बुलाकर सम्मानजनक तरीके से विदाई दी जाए। कोर्ट ने कहा कि उन्हें वैसी ही औपचारिक विदाई मिलनी चाहिए, जैसी सामान्य परिस्थितियों में सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी को दी जाती है।










