TMC ने चुनाव आयोग को भेजी नई सूची, ममता बनर्जी को बताया पार्टी प्रमुख

तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को नई पदाधिकारी सूची भेजकर ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष बताया। बागी गुट द्वारा समानांतर कमेटी बनाने के बाद विवाद और गहरा गया है।

तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग को भेजी नई सूची में ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव बताया है। बागी गुट की समानांतर कमेटी के ऐलान के बाद पार्टी ने आठ नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की प्रमुख राजनीतिक पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर विवाद अब सार्वजनिक रूप से सामने आ गया है। पार्टी ने चुनाव आयोग को अपने पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (नेशनल वर्किंग कमेटी) की नई सूची सौंपते हुए स्पष्ट किया है कि ममता बनर्जी ही पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वहीं दूसरी ओर, पार्टी के एक बागी गुट ने समानांतर कार्यकारी समिति का गठन कर अलग नेतृत्व संरचना की घोषणा कर दी है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में अगले चुनावी चरण को लेकर गतिविधियां तेज हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष आने वाले समय में TMC की रणनीति और संगठनात्मक एकजुटता को प्रभावित कर सकता है।

चुनाव आयोग को भेजी गई सूची में ममता बनर्जी अध्यक्ष

तृणमूल कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग को भेजी गई आधिकारिक सूची में ममता बनर्जी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बताया गया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सुभ्रत बक्शी को उपाध्यक्ष और अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह सूची 20 जून 2026 तक की संगठनात्मक स्थिति के आधार पर तैयार की गई है। TMC नेतृत्व का दावा है कि यही पार्टी की वैध और आधिकारिक संरचना है तथा सभी संगठनात्मक निर्णय इसी ढांचे के तहत लिए जा रहे हैं। इस कदम को पार्टी नेतृत्व की ओर से संगठन पर अपना नियंत्रण मजबूत करने और किसी भी वैकल्पिक दावे को खारिज करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

बागी गुट ने घोषित की समानांतर राष्ट्रीय कार्यकारी समिति

चुनाव आयोग को सूची भेजे जाने से एक दिन पहले TMC के असंतुष्ट नेताओं ने एक बड़ा कदम उठाते हुए समानांतर राष्ट्रीय कार्यकारी समिति के गठन की घोषणा की थी। विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने कोलकाता में आयोजित विशेष बैठक में नया संगठनात्मक ढांचा पेश किया। इस बैठक में विधायक अरूप रॉय को समिति का अध्यक्ष चुना गया। इसके अलावा फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास, रथिन घोष और सबीना यास्मीन को उपाध्यक्ष बनाया गया। बागी नेताओं ने दावा किया कि उनका कदम पार्टी संविधान और संगठनात्मक प्रक्रियाओं के अनुरूप है। इस घटनाक्रम ने TMC के भीतर लंबे समय से चल रही असहमति को खुलकर सामने ला दिया है।

बागी नेताओं का क्या है तर्क?

समानांतर समिति बनाने वाले नेताओं का कहना है कि फरवरी 2022 में गठित राष्ट्रीय कार्यकारी समिति का कार्यकाल फरवरी 2026 में समाप्त हो गया था। उनका आरोप है कि निर्धारित अवधि पूरी होने के बावजूद नई समिति का गठन नहीं किया गया। इसी वजह से उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को सक्रिय रखने के लिए नई समिति गठित करने का निर्णय लिया। बागी गुट का दावा है कि पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और संगठनात्मक चुनावों में पारदर्शिता की कमी रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व इन दावों को पूरी तरह खारिज कर रहा है।

TMC ने जारी किए कारण बताओ नोटिस

संगठनात्मक विवाद के बीच तृणमूल कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया है। पार्टी ने बागी गुट से जुड़े आठ नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इन नेताओं पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने और संगठन की आधिकारिक लाइन से अलग कदम उठाने का आरोप लगाया गया है।

TMC ने चुनाव आयोग को भेजी नई सूची, ममता बनर्जी को बताया पार्टी प्रमुख

पार्टी नेतृत्व ने संबंधित नेताओं से जवाब मांगा है कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर और अधिक अनुशासनात्मक कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे विवाद और गहरा सकता है।

राष्ट्रीय कार्यकारी समिति में शामिल प्रमुख चेहरे

चुनाव आयोग को भेजी गई सूची के अनुसार, TMC की राष्ट्रीय कार्यकारी समिति में कुल 24 नेताओं को शामिल किया गया है।

पार्टी के वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त सचिव की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा समिति में चंद्रिमा भट्टाचार्य, अमित मित्रा, राजेश पति त्रिपाठी, असीमा पात्रा, मलय घटक, गौतम देव, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, बुलु चिक बराइक, मुकुल संगमा, बैस्वानोर चट्टोपाध्याय, बीरबाहा हांसदा, कल्याण बनर्जी, सौगत रॉय, नदीमुल हक, मदन मित्रा, बिमान बनर्जी, महुआ मोइत्रा और कुणाल घोष जैसे प्रमुख नेताओं को भी शामिल किया गया है। इस सूची के जरिए पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि संगठन के अधिकांश वरिष्ठ नेता अब भी आधिकारिक नेतृत्व के साथ खड़े हैं।

कुणाल घोष ने बागी गुट पर साधा निशाना

TMC नेता कुणाल घोष ने समानांतर समिति बनाने वाले नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि बागी गुट पार्टी के नाम और पहचान का अनुचित इस्तेमाल कर रहा है। घोष ने कहा कि किसी भी व्यक्ति या समूह को पार्टी की आधिकारिक संरचना से अलग जाकर समानांतर संगठन चलाने का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, पार्टी का संविधान और संगठनात्मक प्रक्रियाएं स्पष्ट हैं तथा सभी निर्णय अधिकृत नेतृत्व द्वारा ही लिए जा सकते हैं। उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व बागी गुट को किसी भी प्रकार की वैधता देने के पक्ष में नहीं है।

सौगत रॉय ने कहा- ममता ही TMC की पहचान

तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने भी बागी गुट के दावों को महत्व देने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी ने पार्टी की स्थापना की थी और आज भी वही पार्टी की सबसे बड़ी पहचान हैं। रॉय के अनुसार, TMC का जनाधार और राजनीतिक शक्ति ममता बनर्जी के नेतृत्व से जुड़ी हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ नेताओं की असहमति से पार्टी की मूल संरचना या जनसमर्थन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

राजनीतिक महत्व और संभावित असर

तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति है और राज्य की राजनीति में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। ऐसे में पार्टी के भीतर संगठनात्मक विवाद का असर केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रह सकता।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विवाद लंबा खिंचता है, तो इसका प्रभाव पार्टी की चुनावी रणनीति, संगठनात्मक मजबूती और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ सकता है। हालांकि पार्टी नेतृत्व का दावा है कि अधिकांश नेता और कार्यकर्ता आधिकारिक संगठन के साथ हैं तथा मौजूदा विवाद को जल्द सुलझा लिया जाएगा।

आगे क्या होगा?

अब सभी की नजर चुनाव आयोग और पार्टी नेतृत्व की आगामी कार्रवाइयों पर है। यदि बागी गुट अपने दावों पर कायम रहता है, तो यह मामला कानूनी और संगठनात्मक स्तर पर और जटिल हो सकता है। फिलहाल तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग के समक्ष ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली कार्यकारी समिति को आधिकारिक संरचना के रूप में प्रस्तुत कर दिया है। दूसरी ओर, असंतुष्ट नेता अपनी समानांतर समिति के जरिए संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह विवाद केवल आंतरिक असहमति तक सीमित रहता है या पश्चिम बंगाल की राजनीति में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत बनता है।

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