ट्रंप के फैसले पर अफ्रीकी देशों का पलटवार, अमेरिकी नागरिकों पर लगाया बैन

डोनाल्ड ट्रंप के यात्रा प्रतिबंध के जवाब में माली और बुर्किना फासो ने अमेरिकी नागरिकों की एंट्री पर रोक लगाई। इसे समानता, संप्रभुता और कूटनीतिक सम्मान से जुड़ा

अमेरिका के यात्रा प्रतिबंध के जवाब में माली और बुर्किना फासो ने अमेरिकी नागरिकों की एंट्री पर रोक लगा दी है। इसे सम्मान, समानता और संप्रभुता से जुड़ा कदम माना जा रहा है, जिससे पश्चिम अफ्रीका की राजनीति में नया तनाव उभरा है।

America: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक फैसले ने पश्चिम अफ्रीका की राजनीति में हलचल मचा दी है। माली और बुर्किना फासो ने अमेरिकी नागरिकों की अपने देश में एंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिका द्वारा लगाए गए यात्रा प्रतिबंध (travel ban) के जवाब में उठाया गया है। इस घटनाक्रम को सिर्फ एक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि सम्मान, समानता (equality) और संप्रभुता (sovereignty) से जुड़ा फैसला माना जा रहा है।

अमेरिका के फैसले से बढ़ा तनाव

डोनाल्ड ट्रंप ने 16 दिसंबर को पहले से लागू यात्रा प्रतिबंधों को और सख्त करते हुए 20 नए देशों को इस सूची में शामिल किया था। इनमें माली, बुर्किना फासो और नाइजर जैसे पश्चिम अफ्रीकी देश भी शामिल हैं। अमेरिका का तर्क था कि इन देशों में सुरक्षा हालात खराब हैं और सशस्त्र समूहों (armed groups) की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।

हालांकि, इन देशों ने इसे सुरक्षा से ज्यादा भेदभाव (discrimination) और एकतरफा निर्णय माना। माली और बुर्किना फासो की सैन्य सरकारों का कहना है कि अमेरिका ने बिना आपसी संवाद के यह फैसला लिया, जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों के खिलाफ है।

माली का जवाबी कदम

माली सरकार ने साफ शब्दों में कहा कि वह समानता के सिद्धांत (principle of reciprocity) पर काम करेगी। माली के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान में बताया कि तत्काल प्रभाव से अमेरिकी नागरिकों पर वही शर्तें लागू होंगी, जो अमेरिका ने माली के नागरिकों पर लगाई हैं।

सरकार के अनुसार, यदि माली के नागरिकों को अमेरिका में प्रवेश से रोका जा सकता है, तो माली को भी यह अधिकार है कि वह अपने देश में आने वाले अमेरिकी नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए। यह फैसला माली की संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ा हुआ है।

बुर्किना फासो का सख्त रुख

बुर्किना फासो ने भी इसी तर्ज पर अमेरिका को जवाब दिया है। देश के विदेश मंत्री करमोको जीन-मैरी ट्राओरे ने हस्ताक्षरित बयान जारी कर अमेरिकी यात्रियों के प्रवेश पर रोक लगाने की घोषणा की।

बुर्किना फासो सरकार का कहना है कि वह किसी भी देश के साथ असमान व्यवहार (unequal treatment) को स्वीकार नहीं करेगी। बयान में यह भी कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में आपसी सम्मान और बराबरी जरूरी है, न कि ताकत के आधार पर फैसले थोपना।

सैन्य सरकारों की पृष्ठभूमि

माली और बुर्किना फासो दोनों ही देशों में सैन्य सरकारें (military regimes) सत्ता में हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन देशों ने नागरिक सरकारों को हटाकर सत्ता संभाली थी। इन तख्तापलटों की एक बड़ी वजह बढ़ती असुरक्षा और सशस्त्र समूहों का प्रभाव बताया गया था।

सैन्य शासकों ने सत्ता में आने के बाद यह वादा किया था कि वे आतंकवाद और हिंसा से निपटेंगे। हालांकि, जमीनी हालात अभी भी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। यही वजह है कि अमेरिका ने यात्रा प्रतिबंधों के लिए सुरक्षा को मुख्य कारण बताया।

अमेरिका का सुरक्षा तर्क

व्हाइट हाउस के अनुसार, जिन देशों पर यात्रा प्रतिबंध लगाए गए हैं, वहां आतंकवादी हमलों का खतरा ज्यादा है। अमेरिका का दावा है कि इन देशों से आने वाले यात्रियों की जांच करना कठिन हो जाता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा (national security) को खतरा पैदा हो सकता है।

लेकिन माली और बुर्किना फासो का कहना है कि इस तर्क के पीछे राजनीतिक एजेंडा ज्यादा है। उनका मानना है कि अमेरिका ने पूरे देश और उसके नागरिकों को एक ही नजर से देखा, जो न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक।

पश्चिम अफ्रीका में बदलते समीकरण

माली, बुर्किना फासो और नाइजर ने हाल ही में पश्चिम अफ्रीकी क्षेत्रीय संगठन इकोनॉमिक कम्युनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट्स (ECOWAS) से दूरी बना ली है। इन देशों ने मिलकर एक नया क्षेत्रीय गठबंधन बनाने का फैसला किया है।

इस बदलाव को पश्चिम अफ्रीका की राजनीति में एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका और यूरोपीय देशों से रिश्तों में आई खटास भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा मानी जा रही है।

‘गरीब देश’ की छवि पर सवाल

अक्सर माली और बुर्किना फासो को दुनिया के सबसे गरीब देशों में गिना जाता है। यहां प्रति व्यक्ति आय 1200 डॉलर से भी कम है। लेकिन इन देशों का कहना है कि आर्थिक कमजोरी का मतलब यह नहीं कि वे आत्मसम्मान से समझौता करें। अमेरिकी नागरिकों पर बैन लगाकर इन देशों ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर सभी देश बराबर हैं, चाहे उनकी आर्थिक स्थिति कुछ भी हो।

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