यूपी के बिजली उपभोक्ताओं को अक्टूबर में राहत, 5 प्रतिशत से ज्यादा घट सकता है बिल

यूपी के करीब 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं को अक्टूबर में राहत मिल सकती है। एफपीपीसीए के तहत बिजली बिल में 5% से अधिक कमी की संभावना है।
यूपी के बिजली उपभोक्ताओं को अक्टूबर में राहत, 5 प्रतिशत से ज्यादा घट सकता है बिल
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उत्तर प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए अक्टूबर का महीना राहत लेकर आ सकता है। सितंबर के बाद अब अक्टूबर में भी बिजली बिल में कमी आने की संभावना जताई गई है। ताजा जानकारी के मुताबिक अक्टूबर में बिजली बिल 5 प्रतिशत से अधिक कम हो सकता है। इसका लाभ प्रदेश के करीब 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं को मिलने की उम्मीद है। हालांकि अंतिम प्रतिशत और लागू होने की स्थिति पावर कॉरपोरेशन के आदेश के बाद स्पष्ट होगी।

बिजली बिल में प्रस्तावित कमी का मुख्य कारण ईंधन अधिभार शुल्क यानी फ्यूल सरचार्ज में आई कमी है। एफपीपीसीए यानी फ्यूल एंड पावर पर्चेज कॉस्ट एडजस्टमेंट के तहत जुलाई महीने के ईंधन अधिभार शुल्क में कमी का असर अक्टूबर में मिलने वाले बिजली बिल पर दिखाई देगा। पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन की ओर से इस संबंध में जल्द आदेश जारी किए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

अगर यह कटौती लागू होती है तो यह लगातार चौथा महीना होगा जब प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं को बिल में राहत मिलेगी। इससे पहले जुलाई में बिजली बिल में 4.43 प्रतिशत, अगस्त में 2.92 प्रतिशत और सितंबर में 7.93 प्रतिशत की कमी का लाभ उपभोक्ताओं को मिला था। अब अक्टूबर में भी पांच प्रतिशत से अधिक की संभावित कमी से उपभोक्ताओं को त्योहारों के मौसम में अतिरिक्त राहत मिल सकती है।

दरअसल, इस पूरे बदलाव की पृष्ठभूमि जून महीने से जुड़ी है। जून में प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं से 10 प्रतिशत अतिरिक्त ईंधन अधिभार शुल्क लिया गया था। उस समय करीब 3.73 करोड़ उपभोक्ताओं से लगभग 1610 करोड़ रुपये की अतिरिक्त वसूली की गई थी। बाद में बिजली नियामक आयोग ने पुराने भुगतान या पिछली देनदारियों को एफपीपीसीए में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई। आयोग ने स्पष्ट किया कि अधिभार की गणना वास्तविक बिजली खरीद लागत और ट्रांसमिशन शुल्क के आधार पर ही होनी चाहिए।

आयोग के इस रुख के बाद एफपीपीसीए की गणना के तरीके में बदलाव आया और इसके बाद उपभोक्ताओं को लगातार बिल में राहत मिलने लगी। जुलाई से लागू हुई कटौती का असर अगस्त और सितंबर के बिलों में भी दिखाई दिया। सितंबर में तो बिजली बिल में 7.93 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जो पिछले महीनों की तुलना में अधिक थी।

अक्टूबर की संभावित राहत भी इसी व्यवस्था से जुड़ी है। जुलाई में बिजली खरीद से संबंधित लागत और ईंधन अधिभार में जो बदलाव आया, उसका समायोजन बाद के बिलों में किया जा रहा है। इसी वजह से सितंबर में मिले बिजली बिल के बाद अक्टूबर में भी उपभोक्ताओं को कम भुगतान करना पड़ सकता है। हालांकि अलग-अलग उपभोक्ताओं के बिल में वास्तविक रुपये की बचत उनकी बिजली खपत और बिल की राशि पर निर्भर करेगी।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी उपभोक्ता का सामान्य बिजली बिल 2000 रुपये आता है और उसमें करीब पांच प्रतिशत की कमी लागू होती है, तो लगभग 100 रुपये की कमी हो सकती है। इसी तरह 5000 रुपये के बिल पर पांच प्रतिशत की दर से करीब 250 रुपये की कमी बन सकती है। यह केवल समझाने के लिए गणना है; वास्तविक बिल में कटौती लागू दर, खपत और अन्य शुल्कों के आधार पर अलग हो सकती है।

इस राहत का लाभ केवल किसी एक शहर या जिले तक सीमित नहीं रहेगा। एफपीपीसीए के तहत सभी श्रेणियों के लगभग 3.73 करोड़ उपभोक्ताओं को इसका लाभ मिलने की बात कही गई है। यानी घरेलू समेत अलग-अलग श्रेणियों के उपभोक्ताओं पर इसका असर पड़ सकता है।

बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्टूबर में त्योहारों के कारण कई घरों में बिजली की खपत बढ़ जाती है। नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान घरों और बाजारों में रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल बढ़ सकता है। ऐसे समय में बिल की दर में कमी उपभोक्ताओं के कुल भुगतान पर असर डाल सकती है।

हालांकि यहां यह समझना जरूरी है कि पांच प्रतिशत से अधिक की संभावित कमी का मतलब यह नहीं है कि हर उपभोक्ता का पूरा बिजली बिल ठीक पांच प्रतिशत कम ही आएगा। बिजली बिल में ऊर्जा खपत के अलावा अन्य शुल्क भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए अंतिम बिल की राशि संबंधित उपभोक्ता की वास्तविक खपत, कनेक्शन की श्रेणी और उस समय लागू शुल्कों पर निर्भर करेगी।

पावर कॉरपोरेशन की ओर से आदेश जारी होने के बाद यह स्पष्ट होगा कि अक्टूबर में कितने प्रतिशत की वास्तविक राहत लागू होगी। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार पांच प्रतिशत से अधिक कमी की संभावना जताई गई है। सितंबर में 7.93 प्रतिशत की राहत मिलने के बाद अक्टूबर की संभावित कटौती पर उपभोक्ताओं की नजर बनी हुई है।

एफपीपीसीए को लेकर पिछले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश में काफी चर्चा रही है। बिजली नियामक आयोग ने इसकी गणना को लेकर पावर कॉरपोरेशन को नियमों के मुताबिक वास्तविक लागत के आधार पर समायोजन करने के निर्देश दिए थे। आयोग के अनुसार बिजली खरीद की वास्तविक लागत और ट्रांसमिशन शुल्क को ध्यान में रखकर अधिभार तय किया जाना चाहिए तथा किसी अन्य महीने की देनदारी को इसमें शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

यही बदलाव उपभोक्ताओं के लिए राहत का आधार बना है। जुलाई से पहले जहां अतिरिक्त अधिभार की वजह से बिल बढ़ रहे थे, वहीं इसके बाद की गणना में कमी आने से लगातार तीन महीनों तक उपभोक्ताओं को राहत मिली। अब अक्टूबर में भी इसी क्रम के जारी रहने की संभावना है।

राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने भी कहा है कि एफपीपीसीए की गणना में पारदर्शिता आने से उपभोक्ताओं को कानून के अनुसार इसका लाभ समय पर मिल रहा है। उनका कहना है कि वास्तविक लागत के आधार पर गणना होने से उपभोक्ताओं को राहत का लाभ बिल में दिखाई दे रहा है।

इससे पहले अगस्त में भी प्रदेश के 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं को एफपीपीसीए के तहत 2.92 प्रतिशत की राहत मिली थी। जुलाई में यह राहत 4.43 प्रतिशत थी। सितंबर में कटौती बढ़कर 7.93 प्रतिशत तक पहुंच गई। अब अक्टूबर में पांच प्रतिशत से अधिक की संभावित कमी को लेकर उपभोक्ताओं को अगले आदेश का इंतजार है।

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं के लिए अक्टूबर में राहत की उम्मीद बनी हुई है। जुलाई के ईंधन अधिभार शुल्क में कमी के कारण अक्टूबर के बिल में पांच प्रतिशत से अधिक की कटौती संभावित है। करीब 3.73 करोड़ उपभोक्ताओं को इसका लाभ मिलने की बात सामने आई है। हालांकि अंतिम राहत कितनी होगी और किस बिलिंग अवधि से लागू होगी, इसकी आधिकारिक पुष्टि पावर कॉरपोरेशन के आदेश के बाद होगी।

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