11 साल बाद अमेरिका पहुंचे शी जिनपिंग, ट्रंप एयरपोर्ट पर करेंगे स्वागत; ट्रेड, AI और ताइवान पर नजर

शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका पहुंचे हैं। ट्रंप एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करेंगे। दोनों नेताओं के बीच ट्रेड, टैरिफ, AI, ताइवान और रूस पर बातचीत होगी।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका की राजकीय यात्रा पर पहुंचे हैं। ट्रंप ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर उनका स्वागत करेंगे। दोनों नेताओं की बैठक में ट्रेड, टैरिफ, AI, ताइवान, दुर्लभ खनिज और रूस से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है।

न्यूयोर्क: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बुधवार को अमेरिका के तीन दिवसीय राजकीय दौरे के लिए रवाना हुए। यह 11 साल में उनकी पहली अमेरिकी राजकीय यात्रा है। वॉशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उनकी अहम बैठक होगी, जिसमें व्यापार, टैरिफ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), दुर्लभ खनिज, ताइवान और रूस से जुड़े मुद्दे एजेंडे में रहने की संभावना है। शी के अमेरिका पहुंचने पर ट्रंप खुद ज्वाइंट बेस एंड्रयूज पर उनका स्वागत करेंगे। किसी विदेशी नेता के स्वागत के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति का सीधे एयरपोर्ट जाना असामान्य प्रोटोकॉल माना जाता है। Reuters के अनुसार, यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में औपचारिक स्वागत समारोह और राजकीय भोज भी आयोजित किया जाएगा।

व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर, फिर होगी द्विपक्षीय बैठक

शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के सम्मान में व्हाइट हाउस में राजकीय भोज आयोजित किया जाएगा। इस डिनर में अमेरिका के प्रमुख टेक्नोलॉजी और कारोबारी जगत के कई बड़े नाम शामिल होने वाले हैं।

Reuters के अनुसार, अतिथियों में Amazon के जेफ बेजोस, Alphabet के सुंदर पिचाई, OpenAI के सैम ऑल्टमैन, Apple के टिम कुक, Tesla के एलन मस्क, Nvidia के जेंसन हुआंग और Dell Technologies के माइकल डेल शामिल हैं। इसके बाद ट्रंप और शी के बीच औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत होगी। दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के साथ कई संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दे भी बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं।

1. ट्रेड और टैरिफ पर सबसे ज्यादा नजर

अमेरिका और चीन के रिश्तों में व्यापार और टैरिफ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच पिछले वर्षों में टैरिफ को लेकर तनाव बढ़ा है और कई दौर की बातचीत के बाद कुछ क्षेत्रों में शुल्क और व्यापार बाधाओं को कम करने की कोशिश हुई है।

मौजूदा व्यापार व्यवस्था को लेकर 10 नवंबर की समयसीमा महत्वपूर्ण है। AP के अनुसार, दोनों देश टैरिफ में पारस्परिक कटौती और व्यापार संबंधी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। संभावित समझौतों में कृषि और औद्योगिक उत्पादों से जुड़े मुद्दे भी शामिल हो सकते हैं।

हालांकि, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने संकेत दिया है कि इसी सप्ताह किसी बड़े समझौते या टैरिफ ट्रूस के विस्तार की संभावना स्पष्ट नहीं है। दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी रहने की उम्मीद है।

2. AI पर पहली बार अहम बातचीत

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया प्रमुख क्षेत्र बन चुका है। दोनों देशों के बीच AI मॉडल, चिप्स, कंप्यूटिंग क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों पर मतभेद हैं।

अमेरिका ने चीन को अत्याधुनिक AI चिप्स और कुछ उन्नत तकनीकों की पहुंच को सीमित करने के लिए निर्यात नियंत्रण लगाए हैं। चीन इन प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है और अमेरिकी तकनीकी नीतियों को अपने तकनीकी विकास के लिए बाधा के रूप में देखता है।

हाल की तैयारियों में दोनों देशों के बीच AI संवाद को फिर से आगे बढ़ाने की कोशिश हुई है। AP के अनुसार, अमेरिका ने AI से जुड़े संकटों के लिए दोनों देशों के बीच संचार तंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है।

इस बातचीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा AI की सुरक्षा और संभावित जोखिमों से जुड़ी जानकारी साझा करने की व्यवस्था हो सकता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच रणनीतिक अविश्वास के कारण किसी व्यापक AI समझौते की राह आसान नहीं है।

3. ताइवान पर मतभेद बरकरार

ताइवान अमेरिका और चीन के संबंधों का सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दों में से एक है। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका ताइवान के साथ सुरक्षा संबंध और हथियारों की आपूर्ति बनाए रखता है।

शी जिनपिंग की ओर से अमेरिका से ताइवान के मुद्दे पर चीन की चिंताओं को ध्यान में रखने की मांग किए जाने की संभावना है। दूसरी ओर, वॉशिंगटन ताइवान के साथ अपने मौजूदा संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ी नीति पर कायम रह सकता है।

ताइवान का महत्व केवल सुरक्षा के लिहाज से नहीं है। यह वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। इसलिए ताइवान से जुड़े किसी भी तनाव का असर टेक्नोलॉजी, चिप उद्योग और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के व्यापार पर पड़ सकता है।

हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर यह कहना संभव नहीं है कि ट्रंप और शी की बैठक में ताइवान पर कोई नया समझौता होगा।

4. रूस और ऊर्जा खरीद भी बन सकती है चर्चा का विषय

अमेरिका और चीन के बीच रूस से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में आ सकते हैं। चीन रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है और रूस के साथ अपने व्यापारिक संबंधों में तीसरे देशों के हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है।

वहीं, अमेरिकी प्रशासन रूस के ऊर्जा कारोबार और उसके खरीदारों पर दबाव बढ़ाने की नीति पर काम कर रहा है। इसलिए रूस से तेल और गैस की खरीद का मुद्दा अमेरिका-चीन वार्ता में व्यापक प्रतिबंध नीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार के संदर्भ में उठ सकता है।

हालांकि, उपलब्ध ताजा रिपोर्टों में इस मुद्दे को संभावित एजेंडे का हिस्सा बताया गया है, लेकिन बैठक में किसी निश्चित समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।

ट्रंप-शी की लगातार मुलाकातों का महत्व

ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच सीधा संवाद पिछले कुछ महीनों में जारी रहा है। दोनों नेताओं ने इस साल पहले भी मुलाकात की है और अब वॉशिंगटन में होने वाली बैठक दोनों देशों के रिश्तों को संभालने के प्रयासों का एक और महत्वपूर्ण चरण है। SBS के अनुसार, यह दूसरी ट्रंप-शी शिखर बैठक है जो इस साल हो रही है।

दोनों नेताओं के बीच बातचीत जारी रहने के बावजूद व्यापार, तकनीक, ताइवान और सुरक्षा से जुड़े मूलभूत मतभेद बने हुए हैं। इसलिए इस बैठक से किसी एक बड़े समझौते के बजाय अलग-अलग मुद्दों पर सीमित प्रगति की संभावना पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। ABC की रिपोर्ट में भी विशेषज्ञों के बीच संभावित परिणाम को लेकर अलग-अलग आकलन का उल्लेख किया गया है।

आगे APEC और G20 पर भी नजर

वॉशिंगटन बैठक के बाद भी दोनों नेताओं के बीच संभावित मुलाकातों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी रहेगी। नवंबर में चीन के शेनझेन में APEC बैठक और दिसंबर में अमेरिका के मियामी में G20 बैठक संभावित कूटनीतिक मंच हैं।

APEC के दौरान ट्रंप, शी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच संभावित त्रिपक्षीय संपर्क की चर्चा भी सामने आई है, हालांकि ऐसी बैठक की पुष्टि अलग से आवश्यक होगी।

भारत पर क्या हो सकता है असर?

अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं, इसलिए उनके बीच व्यापार और टैरिफ से जुड़े किसी भी बदलाव का वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है। अगर दोनों देशों के बीच व्यापार तनाव कम होता है, तो कंपनियों की उत्पादन और आपूर्ति रणनीतियों में बदलाव देखने को मिल सकता है।

रूस से ऊर्जा खरीद का मुद्दा भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। भारत और चीन दोनों रूसी ऊर्जा खरीदते हैं। ऐसे में अमेरिका की रूस से जुड़ी व्यापार और प्रतिबंध नीति में किसी बदलाव का प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और भारतीय आयात लागत पर पड़ सकता है।

AI और सेमीकंडक्टर क्षेत्र भी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच निर्यात नियंत्रण या आपूर्ति नियमों में बदलाव से AI चिप्स और अन्य उन्नत तकनीकों की वैश्विक उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। भारत की कंपनियां और टेक उद्योग इन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से जुड़े हैं।

हालांकि, भारत पर वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप और शी की बैठक में व्यापार, तकनीक, ऊर्जा और रणनीतिक मुद्दों पर कौन से ठोस फैसले लिए जाते हैं।

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