फर्जी वसीयत तैयार करने वाले वकील की जमानत अर्जी खारिज: अलीगढ़ में एक्टर चंद्रचूड़ सिंह का संपत्ति विवाद, ADG कोर्ट ने ऐप्लिकेशन लौटाई

अलीगढ़ में एक्टर चंद्रचूड़ सिंह के पैतृक संपत्ति विवाद में फर्जी वसीयत के आरोपी वकील की जमानत अर्जी खारिज हुई। मामले में सात लोगों पर FIR दर्ज है।
फर्जी वसीयत तैयार करने वाले वकील की जमानत अर्जी खारिज: अलीगढ़ में एक्टर चंद्रचूड़ सिंह का संपत्ति विवाद, ADG कोर्ट ने ऐप्लिकेशन लौटाई
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अलीगढ़ में फिल्म अभिनेता चंद्रचूड़ सिंह के परिवार से जुड़ा पैतृक संपत्ति विवाद लगातार गंभीर होता जा रहा है। करोड़ों रुपये की जमीन और पुरानी पुश्तैनी हवेली से जुड़े इस मामले में अब कानूनी कार्रवाई का दायरा बढ़ गया है। कथित फर्जी वसीयत तैयार करने और उसके आधार पर पैतृक संपत्ति को हड़पने की साजिश में नामजद अधिवक्ता अजीत सिंह तोमर की जमानत अर्जी खारिज होने की जानकारी सामने आई है। आपके दिए अपडेट के मुताबिक, एडीजी कोर्ट में दाखिल की गई जमानत संबंधी एप्लिकेशन को वापस कर दिया गया। मामले में पहले ही अभिनेता चंद्रचूड़ सिंह के भाई एवं फिल्म निर्देशक अभिमन्यु सिंह की शिकायत पर सात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जा चुका है।

यह पूरा मामला अलीगढ़ के जलालपुर स्थित चंद्रचूड़ सिंह के परिवार की पुश्तैनी संपत्ति से जुड़ा है। पुलिस के पास दर्ज शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परिवार की करोड़ों रुपये की कृषि भूमि और पुरानी हवेली को कथित तौर पर एक फर्जी और अपंजीकृत वसीयत के जरिए अपने पक्ष में कराने की कोशिश की गई। शिकायतकर्ता अभिमन्यु सिंह का आरोप है कि उनके दादा हरेंद्र पाल सिंह गंभीर रूप से बीमार थे और उनकी मृत्यु से ठीक एक दिन पहले यानी 30 जनवरी 1997 को एक कथित वसीयत तैयार कराई गई। इसी दस्तावेज की वैधता और इसे तैयार करने की प्रक्रिया को लेकर पूरा विवाद खड़ा हुआ है।

शिकायत के मुताबिक, हरेंद्र पाल सिंह का निधन 31 जनवरी 1997 को दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में हुआ था। परिवार की ओर से सवाल उठाया गया है कि जब वह लंबे समय से गंभीर रूप से बीमार थे और कथित तौर पर लिखने-पढ़ने तथा लोगों को पहचानने की स्थिति में नहीं थे, तो उनकी मृत्यु से महज एक दिन पहले वसीयत कैसे तैयार हुई। परिवार ने इसी आधार पर कथित वसीयत को फर्जी बताते हुए उसकी जांच की मांग की है।

परिवार का यह भी दावा है कि इससे पहले वर्ष 1995 की एक पंजीकृत वसीयत मौजूद थी, जिसमें पैतृक संपत्ति को तीनों बेटों के बीच बराबर बांटे जाने की बात कही गई थी। इसके बाद 1997 में तैयार बताई जा रही दूसरी वसीयत को लेकर विवाद सामने आया। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि नई कथित वसीयत में संपत्ति का बड़ा हिस्सा परिवार के दूसरे सदस्यों के नाम किए जाने का दावा किया गया और बाद में इसी दस्तावेज के आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की प्रक्रिया कराई गई।

इस मामले में 14 अगस्त 2026 को अभिमन्यु सिंह की ओर से रोरावर थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया था। एफआईआर में गायत्री देवी, जय सिंह, अंजनी सिंह, राबिन एकसन, संदीप कुमार सिंह, शिव कुमार और अधिवक्ता अजीत सिंह तोमर को नामजद किया गया है। शिकायत में इन लोगों पर धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और आपराधिक साजिश के जरिए पैतृक संपत्ति को हड़पने का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने मुकदमा दर्ज करने के बाद मामले की जांच शुरू कर दी है।

अधिवक्ता अजीत सिंह तोमर की भूमिका को लेकर शिकायत में विशेष आरोप लगाए गए हैं। परिवार का आरोप है कि कथित फर्जी वसीयत तैयार करने की प्रक्रिया में उनकी भूमिका रही और इसी दस्तावेज के आधार पर संपत्ति से संबंधित कानूनी और राजस्व प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। किसी व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर में नाम होना अपने आप में आरोप सिद्ध होने के बराबर नहीं है और मामले में अदालत का अंतिम फैसला अभी बाकी है।

अब इस मामले में जमानत की कानूनी प्रक्रिया भी सामने आ गई है। आपके दिए ताजा अपडेट के मुताबिक, कथित फर्जी वसीयत तैयार करने के आरोपी अधिवक्ता की ओर से जमानत के लिए आवेदन किया गया था, जिसे एडीजी कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया और एप्लिकेशन वापस कर दी गई। इस घटनाक्रम के बाद मामले में कानूनी लड़ाई और आगे बढ़ने की संभावना है। जमानत संबंधी कार्रवाई के साथ-साथ पुलिस की जांच भी जारी रहेगी और जांच में सामने आने वाले दस्तावेज आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इस पूरे विवाद की जड़ कथित तौर पर 1997 की उस वसीयत को माना जा रहा है, जिसकी वैधता पर चंद्रचूड़ सिंह और उनके भाई ने सवाल उठाए हैं। परिवार का कहना है कि उनके दादा उस समय बेहद गंभीर हालत में थे। शिकायत में परिवार की सदस्य गिरजा कुमारी उर्फ गिरजा मनचंदानी के बयान का भी उल्लेख किया गया है। उनके मुताबिक ऐसी कोई वसीयत नहीं बनी थी और उस पर किए गए हस्ताक्षर भी कथित तौर पर फर्जी हैं। इन दावों की पुष्टि या खंडन दस्तावेजों की जांच और विशेषज्ञ परीक्षण के बाद ही संभव होगा।

विवाद केवल वसीयत तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि कथित वसीयत को आधार बनाकर राजस्व न्यायालय में नामांतरण कराया गया और इसके बाद पैतृक जमीनों को बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। परिवार की ओर से संपत्ति की कीमत करोड़ों रुपये बताई गई है। कुछ रिपोर्टों में शिकायतकर्ता पक्ष ने करीब 150 करोड़ रुपये की पैतृक संपत्ति पहले ही बेचे जाने का आरोप लगाया है। यह आंकड़ा परिवार के आरोप के रूप में ही सामने आया है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच का विषय है।

चंद्रचूड़ सिंह इस विवाद को लेकर पहले भी प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क कर चुके हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, अभिनेता और उनके परिवार की ओर से 2025 में नवंबर और दिसंबर के दौरान वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तथा जिलाधिकारी से शिकायत की गई थी। बाद में मामला पुलिस थाने तक पहुंचा और अगस्त 2026 में एफआईआर दर्ज होने के बाद जांच औपचारिक रूप से आगे बढ़ी।

29 अगस्त को चंद्रचूड़ सिंह और उनके भाई अभिमन्यु सिंह पुलिस जांच अधिकारी के सामने भी पेश हुए थे। दोनों से मामले को लेकर पूछताछ की गई और उन्होंने संपत्ति से जुड़े दस्तावेज जांच अधिकारी को सौंपे। पुलिस ने कहा था कि एक पक्ष से पूछताछ के बाद दूसरे पक्ष के लोगों से भी संपर्क किया जाएगा। इससे साफ है कि जांच को केवल शिकायतकर्ता के आरोपों तक सीमित रखने के बजाय दोनों पक्षों के बयान और दस्तावेज जुटाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

इस मामले में दूसरा पक्ष भी पहले आरोपों को खारिज कर चुका है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, गायत्री देवी ने पूर्व में चंद्रचूड़ सिंह की ओर से लगाए गए आरोपों को गलत बताया था और कथित वसीयत को सही बताया था। इसलिए जांच के दौरान दोनों पक्षों के दावों और उनके पास मौजूद दस्तावेजों का मिलान बेहद महत्वपूर्ण होगा।

पैतृक संपत्ति से जुड़े इस मामले में पुलिस के सामने कई अहम सवाल हैं। सबसे पहला सवाल कथित वसीयत की वास्तविकता को लेकर है। इसके बाद यह देखा जाएगा कि दस्तावेज कब और कहां तैयार हुआ, उस समय हरेंद्र पाल सिंह की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति क्या थी, वसीयत पर हस्ताक्षर किस परिस्थिति में हुए, इसमें शामिल बताए जा रहे गवाहों की भूमिका क्या थी और दस्तावेज के आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में किस तरह बदलाव कराया गया। इन सभी पहलुओं की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।

वसीयत के दस्तावेज की जांच इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। यदि जांच एजेंसी को दस्तावेज में प्रथम दृष्टया गड़बड़ी मिलती है तो हस्ताक्षर, दस्तावेज तैयार होने की तारीख, गवाहों के बयान और उसके आधार पर हुई राजस्व कार्रवाई की भी जांच हो सकती है। वहीं यदि दूसरे पक्ष के पास वसीयत को वैध साबित करने वाले दस्तावेज और साक्ष्य हैं तो उन्हें भी जांच में शामिल किया जाएगा।

चंद्रचूड़ सिंह का नाम इस मामले से जुड़ने के कारण विवाद को व्यापक सार्वजनिक चर्चा भी मिली है। अभिनेता ने 'माचिस', 'क्या कहना' और 'जोश' जैसी फिल्मों में काम किया है और लंबे समय तक फिल्म जगत में सक्रिय रहे हैं। अब उनके परिवार की पुश्तैनी संपत्ति से जुड़ा विवाद पुलिस और अदालत की प्रक्रिया तक पहुंचने के कारण चर्चा में है। हालांकि यह मामला मूल रूप से एक पारिवारिक संपत्ति और कथित दस्तावेजी फर्जीवाड़े का कानूनी विवाद है और इसका फैसला उपलब्ध साक्ष्यों तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

फर्जी वसीयत से जुड़े आरोपों में यदि जांच के दौरान दस्तावेजों की कूटरचना या धोखाधड़ी के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं तो नामजद लोगों की कानूनी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो आरोपित पक्ष को भी कानूनी राहत मिल सकती है। यही वजह है कि इस समय पूरे मामले में आरोप और तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

फिलहाल अलीगढ़ का यह चर्चित पैतृक संपत्ति विवाद पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बीच आगे बढ़ रहा है। सात लोगों के खिलाफ दर्ज मुकदमे, कथित फर्जी वसीयत, राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण, करोड़ों की जमीन और अब आरोपी अधिवक्ता की जमानत अर्जी से जुड़े घटनाक्रम ने मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है। आगे पुलिस की जांच, दस्तावेजों की पड़ताल और अदालत में होने वाली कार्रवाई से यह तय होगा कि कथित वसीयत की वास्तविक स्थिति क्या थी और पैतृक संपत्ति को लेकर लगाए गए आरोप कितने सही साबित होते हैं।

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