ग्लेशियर पिघलने से बढ़ सकता है भूकंप का खतरा? IIT कानपुर के विशेषज्ञ ने समझाया हिमालय का बदलता संतुलन

Glacier Melt & Earthquake Risk: IIT कानपुर के विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और भूमिगत जल में बदलाव से क्षेत्र का संतुलन प्रभावित

नेपाल में ग्लेशियर टूटने से हुई तबाही के बीच आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंसेज विभाग ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते भूकंप के खतरे को लेकर चिंता जताई है। प्रोफेसर जावेद एन. मलिक के मुताबिक, ग्लेशियरों के पिघलने या टूटने की घटनाएं बढ़ने से पहाड़ों का भूगर्भीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।

नई दिल्ली: हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और उनके पीछे हटने को लेकर वैज्ञानिक चिंता लगातार बढ़ रही है। इसका असर केवल जल स्रोतों और पर्वतीय पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि भूगर्भीय गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंसेज विभाग के प्रोफेसर जावेद एन. मलिक के अनुसार, ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय में चट्टानों और टेक्टोनिक प्लेटों पर पड़ने वाला दबाव बदल सकता है, जिससे कुछ परिस्थितियों में भूकंपीय गतिविधियों का जोखिम प्रभावित हो सकता है।

नेपाल में हालिया ग्लेशियर टूटने की घटनाओं के संदर्भ में हिमालय के भूगर्भीय संतुलन को लेकर यह चर्चा महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि, किसी विशेष भूकंप को केवल ग्लेशियर पिघलने से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सावधानी की मांग करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालय पहले से ही सक्रिय टेक्टोनिक क्षेत्र है, जहां भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है और लगातार तनाव जमा होता रहता है।

ग्लेशियर पिघलने से कैसे बदल सकता है भूगर्भीय संतुलन?

प्रोफेसर जावेद एन. मलिक के मुताबिक, हिमालयी ग्लेशियरों पर मौजूद बर्फ का भारी भार नीचे की चट्टानों पर दबाव डालता है। जब तापमान बढ़ने के कारण बर्फ की मात्रा कम होती है और ग्लेशियर पीछे हटते हैं, तो इस भार में कमी आती है। भूगर्भ विज्ञान में इस प्रक्रिया को ‘अनलोडिंग’ कहा जाता है। ग्लेशियरों के पिघलने से पैदा हुआ पानी चट्टानों में मौजूद दरारों और कमजोर हिस्सों तक भी पहुंच सकता है। 

पानी के प्रवेश से कुछ परिस्थितियों में चट्टानों की मजबूती और घर्षण संबंधी स्थितियां बदल सकती हैं। इसके साथ ही बर्फ का भार कम होने पर पृथ्वी की सतह का संतुलन भी बदल सकता है। इस प्रक्रिया को ‘आइसोस्टेटिक बैलेंस’ या आइसोस्टेटिक समायोजन से जोड़ा जाता है। विशेषज्ञ का कहना है कि हिमालय में भूकंप की क्षमता काफी अधिक है और कुछ हिस्सों में 8.5 या उससे अधिक तीव्रता के बड़े भूकंप की संभावना पर लंबे समय से अध्ययन होता रहा है। ऐसे में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की दर और उससे होने वाले भूगर्भीय बदलावों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।

ग्लेशियर पिघलने से बढ़ सकता है भूकंप का खतरा? IIT कानपुर के विशेषज्ञ ने समझाया हिमालय का बदलता संतुलन

नेपाल के 2015 भूकंप को लेकर क्या कहा गया?

प्रोफेसर मलिक ने 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, उस घटना के बाद भी क्षेत्र में मौजूद सभी भूगर्भीय ऊर्जा पूरी तरह समाप्त हो गई हो, ऐसा मानना उचित नहीं है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधियां आगे भी जारी रह सकती हैं। कुछ अध्ययनों के आधार पर आने वाले दशकों में इस क्षेत्र में नए भूकंपों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। 

हालांकि, किसी भूकंप का सटीक समय, स्थान और तीव्रता पहले से बताना वर्तमान वैज्ञानिक क्षमता के बाहर है। हाल में नेपाल में आए मध्यम तीव्रता के भूकंप ने भी हिमालयी क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता को फिर चर्चा में ला दिया है।

भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन भी बढ़ा सकता है जमीन धंसने का जोखिम

हिमालय और गंगा के मैदानी इलाकों में भूगर्भीय बदलाव का एक अन्य पहलू भूजल का अत्यधिक दोहन है। कृषि और शहरी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर भूमिगत जल निकालने से जमीन के नीचे मौजूद मिट्टी और तलछट की संरचना प्रभावित हो सकती है। जब भूजल का स्तर लंबे समय तक नीचे जाता है, तो जमीन के नीचे मौजूद महीन कणों के बीच का दबाव बदल सकता है और परतों में ‘कॉम्पैक्शन’ हो सकता है। 

इसका परिणाम जमीन के धीरे-धीरे धंसने के रूप में सामने आ सकता है। उत्तर भारत के कई मैदानी क्षेत्रों में भूजल स्तर और भूमि की ऊंचाई में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए जीपीएस सहित आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार जमीन धंसने की हर घटना को भूजल दोहन से जोड़ना सही नहीं होगा। स्थानीय भूगर्भीय संरचना और अन्य प्राकृतिक कारण भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं।

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