Assam Legislative Assembly: 17 विधायकों ने ली शपथ, पहली बार गूंजी संस्कृत भाषा

असम विधानसभा में 17 विधायकों ने शपथ ली और इस दौरान पहली बार संस्कृत भाषा की गूंज सुनाई दी। यह ऐतिहासिक क्षण राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बेहद खास माना

असम की राजनीति और सांस्कृतिक परंपरा में एक ऐतिहासिक क्षण दर्ज हुआ, जब 17 नवनिर्वाचित विधायकों ने असम विधानसभा में संस्कृत भाषा में शपथ ग्रहण की। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों ने प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत को शपथ की भाषा के रूप में चुना। 

नई दिल्ली: Assam Legislative Assembly में गुरुवार को एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब 17 नवनिर्वाचित विधायकों ने संस्कृत में शपथ ग्रहण की। यह पहली बार है जब विधानसभा के इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों ने संस्कृत को शपथ की भाषा के रूप में चुना। इस घटनाक्रम को सांस्कृतिक पुनर्जागरण के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि लंबे समय से ‘मृतप्राय’ मानी जाने वाली यह प्राचीन भाषा अब एक बार फिर सार्वजनिक और राजनीतिक मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।

असम विधानसभा में पहली बार संस्कृत की गूंज

गुरुवार को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह के दौरान षोडश असम विधानसभा में 17 विधायकों ने संस्कृत में शपथ ली। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि असम जैसे बहुभाषी राज्य में इतने बड़े स्तर पर संस्कृत का उपयोग एक प्रतीकात्मक सांस्कृतिक बदलाव का संकेत देता है। विधानसभा परिसर में इस दृश्य को देख उपस्थित लोग भी आश्चर्य और गर्व से भर गए।

किन विधायकों ने संस्कृत में ली शपथ?

संस्कृत में शपथ लेने वाले 17 विधायकों में विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिनिधि शामिल हैं। इनमें प्रमुख नाम हैं, विश्वजीत दैमारी, बिमल बोरा, जयंता मल्ल बरुआ, भवेश कलिता, पृथ्वीराज राभा, डॉ. परमानंद राजबंशी, संजय किशान, डॉ. मृदुल कुमार दत्ता, अमिय कांति दास, विजय कुमार गुप्ता, नीलिमा देवी, डॉ. मिलन दास, मयूर बरगोहाईं, विक्टर कुमार दास, कृष्ण कमल तांती, राजदीप ग्वाला और पवित्र राभा।

इनमें बोडो, राभा, कूच-राजबंशी, अहोम और चाय जनजाति समुदायों से आने वाले विधायक भी शामिल हैं, जो असम की विविध सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं।

संस्कृत को लेकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण की चर्चा

विशेषज्ञों और सांस्कृतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह केवल एक औपचारिक शपथ नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान का प्रतीक है। वैश्वीकरण और आधुनिक तकनीकी युग में जहां स्थानीय और पारंपरिक भाषाएं दबाव में हैं, वहीं इस तरह की पहल संस्कृत जैसी प्राचीन भाषा को नई पहचान दिला सकती है।

संस्कृत भारती जैसे संगठनों ने इस कदम का स्वागत किया है और इसे “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। संस्कृत भारती असम के संगठन मंत्री भवेन सैकिया ने बताया कि यह पहल अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे वर्षों से चल रहे प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम हैं। उन्होंने कहा कि संगठन ने लंबे समय से विधायकों और समाज के विभिन्न वर्गों में संस्कृत के प्रति रुचि बढ़ाने का काम किया है।

उन्होंने यह भी बताया कि कई जनप्रतिनिधियों ने पहले से ही संस्कृत सीखने की प्रक्रिया में भाग लिया था, जिसका परिणाम इस ऐतिहासिक शपथ ग्रहण में देखने को मिला।

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