भारत में न्यूट्रास्युटिकल्स का बढ़ता ट्रेंड: क्या ये दवाओं से ज्यादा कारगर हो सकते हैं?

भारत में हर्बल और आयुर्वेदिक न्यूट्रास्युटिकल्स की मांग बढ़ रही है, सेहत, इम्यूनिटी और ऊर्जा बनाए रखने में मददगार।

न्यूट्रास्युटिकल्स (Nutraceuticals) भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, क्योंकि लोग बीमारी के बाद इलाज की बजाय सेहत बनाए रखने पर ध्यान दे रहे हैं। आयुर्वेदिक और हर्बल तत्वों वाले ये सप्लीमेंट्स रोजमर्रा की वेलनेस, इम्यूनिटी और ऊर्जा बढ़ाने में मदद करते हैं। बढ़ती आबादी, बदलती लाइफस्टाइल और सरकारी समर्थन ने इस उद्योग को मजबूत किया है।

न्यूट्रास्युटिकल्स ट्रेंड इंडिया: भारत में लोग अब स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए न्यूट्रास्युटिकल्स को अपनाने लगे हैं। ये पोषण और औषधीय गुणों वाले सप्लीमेंट्स विटामिन, प्रोबायोटिक्स और हर्बल तत्वों से तैयार किए जाते हैं। खासतौर पर मुंबई और अन्य बड़े शहरों में युवा और बुजुर्ग रोजमर्रा की वेलनेस के लिए इन्हें रोजाना इस्तेमाल कर रहे हैं। बदलती लाइफस्टाइल और बढ़ती उम्र की आबादी ने इस उद्योग की मांग को बढ़ाया है, जबकि सरकार का निवेश और वैश्विक व्यापार इसे और सशक्त बना रहा है।

न्यूट्रास्युटिकल्स क्या हैं और क्यों बढ़ रही मांग

न्यूट्रास्युटिकल प्रॉडक्ट्स ऐसे पोषण आधारित सप्लीमेंट्स हैं, जो स्वास्थ्य को बनाए रखने और बीमारियों को रोकने में मदद करते हैं। इनमें विटामिन सप्लीमेंट्स, प्रोबायोटिक्स और हर्बल प्रॉडक्ट्स शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में यह उद्योग तेजी से बढ़ रहा है और भविष्य में यह फार्मास्यूटिकल्स से भी दस गुना बड़ा हो सकता है। इसका कारण है कि दवाएं बीमारी के बाद ली जाती हैं, जबकि न्यूट्रास्युटिकल्स रोजाना सेहत बनाए रखने के लिए उपयोगी होते हैं।

बढ़ती आबादी और बदलती लाइफस्टाइल

इंफॉर्मा मार्केट्स के एमडी योगेश मुद्रास के मुताबिक, भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और युवाओं की लाइफस्टाइल भी बदल रही है। 2050 तक देश में बुजुर्गों की आबादी 347 मिलियन तक पहुंच सकती है। मध्यम वर्ग के लगभग 35% लोग अब अपनी रोजमर्रा की वेलनेस पर खर्च करने को तैयार हैं। इस बदलते नजरिए ने न्यूट्रास्युटिकल्स की मांग में तेज़ी लाने में मदद की है।

आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का मेल

हेल्थ फूड्स एंड डायटरी सप्लीमेंट्स एसोसिएशन के महासचिव कौशिक देसाई का कहना है कि भारत की जैव विविधता और आयुर्वेदिक विरासत इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत है। आयुर्वेदिक उत्पादों का बाजार 18.4% की रफ्तार से बढ़ रहा है और 2030 तक यह 22.37 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच सकता है। आज के उपभोक्ता क्लीन-लेबल और पौधों पर आधारित उत्पाद पसंद कर रहे हैं। गमीज, पेय पदार्थ और पर्सनलाइज्ड न्यूट्रिशन जैसी नए विकल्प युवा वर्ग में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।

सरकारी सहयोग और वैश्विक अवसर

भारत सरकार ने इस क्षेत्र को समर्थन देने के लिए 10,000 करोड़ रुपये बायोफार्मास्यूटिकल उद्योग में निवेश करने का निर्णय लिया है। अगले पांच वर्षों में यह निवेश नए शोध और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद करेगा। भारत न केवल घरेलू मांग पूरा कर रहा है, बल्कि यूके, यूएसए और यूएई जैसे देशों के साथ व्यापार समझौतों के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।

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