बंटी और लंबी नाक की मुसीबत: झूठ बोलने की कीमत

बंटी और लंबी नाक की मुसीबत: झूठ बोलने की कीमत

यह कहानी 'बंटी' नाम के एक 8 साल के शरारती लड़के की है। बंटी दिल का बुरा नहीं था, लेकिन उसे हर छोटी-बड़ी बात पर झूठ बोलने और डींगें हांकने की बहुत बुरी आदत थी। एक दिन, एक अजीबोगरीब घटना के बाद, उसका यह झूठ बोलना उसके लिए एक बहुत बड़ी और शर्मनाक मुसीबत बन गया- बिल्कुल 'पिनोकियो' की तरह!

कहानी

बंटी को कहानियाँ बनाने में बहुत मज़ा आता था। अगर वह स्कूल देर से पहुँचता, तो कहता, 'रास्ते में एक हाथी आ गया था, मैं उससे लड़ रहा था।' अगर होमवर्क नहीं करता, तो कहता, 'अचानक तेज़ आँधी आई और मेरी कॉपी उड़कर दूसरे शहर चली गई।' उसके माता-पिता और दोस्त उसकी इन हरकतों से परेशान थे।

एक सप्ताहांत, बंटी अपने परिवार के साथ एक पुराने मेले में गया। वहाँ एक अजीब से दिखने वाले बूढ़े जादूगर का स्टॉल था। जादूगर के पास कई रंगीन शीशियाँ थीं। बंटी ने खेल-खेल में, बिना पूछे एक नीले रंग की शीशी उठाई और गटक गया। उसका स्वाद खट्टा-मीठा था।

जादूगर ने देख लिया और चिल्लाया, 'अरे लड़के! तुमने क्या किया? वह 'सत्य-जल' था! अब अगर तुम झूठ बोलोगे, तो तुम्हारी सच्चाई सबके सामने आ जाएगी।'

बंटी ने बात हँसी में उड़ा दी और घर आ गया।

अगली सुबह, नाश्ते की मेज पर, माँ ने पूछा, 'बंटी, क्या तुमने कल रात ब्रश किया था?' बंटी ने हमेशा की तरह झूठ बोला, 'हाँ माँ, दो बार किया था!'

जैसे ही उसने यह कहा, उसे अपनी नाक में अजीब सी खुजली महसूस हुई। 'सर्रर्र...' की हल्की आवाज़ के साथ, उसकी छोटी सी नाक अचानक एक इंच लंबी हो गई!

बंटी घबरा गया। वह आईने की तरफ दौड़ा। उसकी नाक सचमुच लंबी हो गई थी और लाल टमाटर जैसी दिख रही थी।

स्कूल में तो और बुरा हाल हुआ। टीचर ने पूछा, 'बंटी, तुम्हारा गणित का प्रोजेक्ट कहाँ है?' बंटी ने बहाना बनाया, 'मैम, वह तो मेरा छोटा भाई फाड़ गया।'

'सर्रर्र...' आवाज़ फिर आई। अब उसकी नाक एक गाजर जितनी लंबी हो गई थी। पूरी क्लास उसे देखकर हँसने लगी। उसके दोस्त, राजू ने पूछा, 'अरे, तुम्हारी नाक को क्या हुआ?'

शर्म के मारे बंटी ने फिर झूठ बोला, 'कुछ नहीं, बस मधुमक्खी ने काट लिया है।' 'सर्रर्र...' अब नाक इतनी लंबी हो गई कि वह उसके लंचबॉक्स से टकराने लगी।

बंटी की हालत ख़राब हो गई। वह अपनी लंबी नाक को छिपाने के लिए मुँह पर रुमाल रखकर घूमने लगा, लेकिन वह अजीब सी नुकीली चीज़ रुमाल से बाहर झाँकती रहती। उसे पानी पीने में भी दिक्कत होने लगी क्योंकि गिलास नाक से टकरा जाता था। दरवाज़े से निकलते समय उसकी नाक पहले बाहर निकलती, फिर उसका चेहरा।

शाम को वह पार्क में क्रिकेट खेल रहा था। गलती से उसकी बॉल पड़ोस के गुस्सैल शर्मा अंकल की खिड़की पर जा लगी। 'चटाक!' काँच टूट गया।

शर्मा अंकल गुस्से में बाहर आए। 'यह किसने किया?' वे चिल्लाए। बाकी बच्चे डर गए। बंटी की नाक पहले से ही एक फुट लंबी थी। वह जानता था कि अगर उसने एक और झूठ बोला, तो शायद नाक इतनी लंबी हो जाएगी कि वह चल भी नहीं पाएगा।

शर्मा अंकल ने बंटी के दोस्त राजू को डांटना शुरू कर दिया। राजू रोने लगा। बंटी से यह देखा नहीं गया। उसने गहरी साँस ली। सच बोलना बहुत मुश्किल लग रहा था, डर भी लग रहा था।

लेकिन उसने हिम्मत जुटाई और आगे बढ़कर बोला, 'अंकल, राजू ने नहीं, मैंने शीशा तोड़ा है। मुझसे गलती हो गई।'

जैसे ही बंटी ने सच बोला, एक चमत्कार हुआ। 'फुर्रर्र...' की आवाज़ के साथ उसकी लंबी नाक आधी छोटी हो गई! बंटी को राहत महसूस हुई।

घर जाकर उसने माँ-पापा को भी सब सच बता दिया- जादूगर वाली बात, ब्रश न करने वाली बात और स्कूल के झूठ भी। हर सच के साथ उसकी नाक छोटी होती गई और अंत में बिल्कुल सामान्य हो गई।

उस दिन बंटी को थोड़ी डांट तो पड़ी, लेकिन उसे जो सुकून मिला, वह अनमोल था। उसने सीख लिया था कि झूठ बोलने का बोझ उसकी नाक (और उसके मन) के लिए बहुत भारी था।

सीख 

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'झूठ के पाँव नहीं होते, लेकिन वह बंटी की नाक की तरह बढ़ता ज़रूर है। एक झूठ को छिपाने के लिए हमें सौ और झूठ बोलने पड़ते हैं, जिससे अंत में शर्मिंदगी और मुसीबत ही हाथ लगती है। सच बोलना शुरू में कड़वा या डरावना लग सकता है, लेकिन अंत में वही हमें आज़ाद करता है और निडर बनाता है।'

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